जन औषधि दिवस पर बड़ा सवाल: जब कानून कहता है जेनेरिक दवा लिखो, तो फिर मरीज क्यों खरीद रहा महंगी ब्रांडेड दवाएं? सुप्रीम कोर्ट में लंबित जनहित याचिका पर अगले माह सुनवाई

आगरा। देश में आज (07 मार्च को) आठवां जन औषधि दिवस मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य सस्ती और गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत देशभर में हजारों जन औषधि केंद्र स्थापित किए गए हैं, जहां ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि अधिकांश मरीज अब भी महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। सवाल उठता है कि जब कानून स्वयं चिकित्सकों को दवाएं जेनेरिक नाम से लिखने के लिए बाध्य करता है, तब आम नागरिक आज भी महंगी दवाओं का आर्थिक बोझ क्यों उठा रहा है।

Mar 7, 2026 - 21:27
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जन औषधि दिवस पर बड़ा सवाल: जब कानून कहता है जेनेरिक दवा लिखो, तो फिर मरीज क्यों खरीद रहा महंगी ब्रांडेड दवाएं? सुप्रीम कोर्ट में लंबित जनहित याचिका पर अगले माह सुनवाई

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2025 तक देश में 17,990 जन औषधि केंद्र संचालित हो रहे थे, जहां जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इन दवाओं की कीमत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में काफी कम होती है, फिर भी बड़ी संख्या में मरीज इनका लाभ नहीं ले पाते क्योंकि अधिकांश चिकित्सक अपने पर्चों में दवाएं ब्रांड नाम से लिखते हैं।

इस स्थिति को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन ने वर्ष 2023 में सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका संख्या 794/2023 दायर की है, जिसमें मौजूदा कानूनी प्रावधानों के प्रभावी अनुपालन की मांग की गई है। इस याचिका में केंद्र सरकार, नेशनल मेडिकल काउंसिल और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) सहित कई संस्थाओं को पक्षकार बनाया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सभी पक्षकारों को नोटिस जारी किया है और उनके जवाब भी दाखिल हो चुके हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 14 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

एडवोकेट केसी जैन कहते हैं, विधिक दृष्टि से जेनेरिक दवा लिखना कोई विकल्प नहीं बल्कि चिकित्सकों का दायित्व है। वर्ष 2002 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाए गए व्यावसायिक आचरण संबंधी नियमों की धारा 1.5 में स्पष्ट किया गया कि प्रत्येक पंजीकृत चिकित्सक दवा को उसके जेनेरिक नाम से लिखे। 21 सितंबर 2016 को किए गए संशोधन में यह और स्पष्ट कर दिया गया कि दवाएं जेनेरिक नाम से, स्पष्ट और पठनीय अक्षरों में लिखी जानी चाहिए।

इसके बाद 25 सितंबर 2020 को नेशनल मेडिकल कमीशन अधिनियम लागू हुआ, जिसकी धाराएं 60 और 61 इन नियमों को प्रभावी बनाए रखती हैं। अधिनियम की धारा 30 के अनुसार इन नियमों का उल्लंघन व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में आता है। 23 अगस्त 2023 को जारी अधिसूचना में भी यह पुनः स्पष्ट किया गया कि 2002 के नियम पूर्ण रूप से लागू और बाध्यकारी हैं। इस प्रकार विधिक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है कि चिकित्सकों को दवाएं जेनेरिक नाम से ही लिखनी चाहिए।

श्री जैन के अनुसार, संसदीय उत्तरों में भी यह स्वीकार किया जा चुका है कि जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं। उदाहरण के तौर पर यदि किसी मरीज को प्रतिमाह लगभग 2000 रुपये की ब्रांडेड दवा लिखी जाती है, तो वही दवा जेनेरिक रूप में 500 से 700 रुपये में उपलब्ध हो सकती है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग या कैंसर जैसे दीर्घकालिक रोगों में यह अंतर वर्षों में लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। सरकारी उत्तरों में यह भी उल्लेख किया गया है कि जन औषधि योजना के माध्यम से नागरिकों को हजारों करोड़ रुपये की बचत हुई है, जो यह दर्शाता है कि मूल्य का अंतर वास्तविक और व्यापक प्रभाव वाला है।

महंगी दवाओं का सबसे अधिक असर समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है। दिहाड़ी मजदूर, सीमांत किसान, वृद्ध पेंशनभोगी, विधवा महिलाएं और ग्रामीण क्षेत्रों के परिवार इस आर्थिक बोझ से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। जब दवाएं महंगी लिखी जाती हैं तो कई परिवार इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं, कई मरीज आधी दवा खरीदते हैं और कई को कर्ज लेकर दवा खरीदनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य का अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। यदि सस्ती दवा उपलब्ध है और कानून भी उसका निर्देश देता है, तो उसका पालन न होना सामाजिक असमानता को और गहरा करता है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि जेनेरिक दवा न लिखने के मामलों का कोई समेकित केंद्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। नियामक संस्थाओं में कई पद रिक्त होने से प्रवर्तन क्षमता भी प्रभावित होती है। यद्यपि प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट के दिशा-निर्देश मौजूद हैं, लेकिन उनका व्यापक और अनिवार्य क्रियान्वयन दिखाई नहीं देता। जब निगरानी और अनुशासनात्मक तंत्र सक्रिय न हो, तो कानूनी प्रावधान व्यवहार में कमजोर पड़ जाते हैं।

इस स्थिति को सुधारने के लिए याचिका में कई सुधारात्मक उपाय सुझाए गए हैं। इनमें जेनेरिक प्रिस्क्रिप्शन का सख्त प्रवर्तन, नियमित और संरचित प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट, स्पष्ट और डिजिटल पर्ची प्रणाली, दवा के जेनेरिक नाम, मात्रा और अवधि का स्पष्ट उल्लेख तथा नियामक संस्थाओं में रिक्त पदों की शीघ्र पूर्ति जैसे सुझाव शामिल हैं। इन उपायों से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि मरीजों को सस्ती और विश्वसनीय चिकित्सा भी मिल सकेगी।

जन औषधि दिवस के संदर्भ में यह भी सामने आया है कि कई जन औषधि केंद्रों पर सभी आवश्यक दवाएं नियमित रूप से उपलब्ध नहीं रहतीं। यदि इन दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और आवश्यकता पड़ने पर कोरियर व्यवस्था के माध्यम से मरीजों तक दवाएं पहुंचाने की प्रणाली विकसित की जाए तो यह आम नागरिकों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है।

इस पूरे मुद्दे पर वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता के.सी. जैन का कहना है कि जन औषधि दिवस का वास्तविक महत्व तभी होगा जब चिकित्सक जेनेरिक दवाएं लिखना शुरू करें। उनका कहना है कि जब कानून स्पष्ट रूप से यह कहता है कि दवाएं जेनेरिक नाम से लिखी जानी चाहिए और संसद में भी स्वीकार किया जा चुका है कि जेनेरिक दवाएं 50 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं, तब इस व्यवस्था का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना केवल कानूनी ही नहीं बल्कि नैतिक और मानवीय जिम्मेदारी भी है।

उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवा सेवा है, व्यापार नहीं। संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवन का अधिकार नहीं देता बल्कि सम्मानजनक और वहनीय उपचार का अधिकार भी सुनिश्चित करता है। उनका उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से पहले से मौजूद कानूनों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित कराना है, ताकि देश का कोई भी गरीब नागरिक केवल महंगी दवाओं के कारण उपचार से वंचित न रह जाए।

SP_Singh AURGURU Editor