‘पर्यटन’ नहीं, ‘तीर्थयात्रा’ कहिए: अयोध्या-काशी-मथुरा जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा को सैर-सपाटा नहीं, आस्था और आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से पहचान देने का समय
अयोध्या, काशी, मथुरा-वृन्दावन और प्रयागराज जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा को धार्मिक पर्यटन कहना भारतीय परंपरा और श्रद्धालुओं की भावनाओं के अनुरूप नहीं है। इन स्थलों पर आने वाले लोग मनोरंजन या सैर-सपाटे के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति, साधना और आत्मिक शांति की खोज के लिए आते हैं। इसलिए इन यात्राओं को तीर्थयात्रा, आस्था यात्रा या तीर्थ दर्शन जैसे शब्दों से पहचान देना अधिक उचित होगा।
-केसी जैन-
अयोध्या, काशी, मथुरा-वृन्दावन और प्रयागराज जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा केवल सैर-सपाटा नहीं बल्कि श्रद्धा, साधना और आत्मिक शांति की खोज का माध्यम है। इसलिए इन यात्राओं को धार्मिक पर्यटन कहना भारतीय परंपरा और श्रद्धालुओं की भावना को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता। इन पवित्र यात्राओं के लिए तीर्थयात्रा, आस्था यात्रा या तीर्थ दर्शन जैसे शब्द अधिक उपयुक्त हैं। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को यह सुझाव दिया गया है कि आध्यात्मिक यात्राओं की सही पहचान और सांस्कृतिक गरिमा बनाए रखने के लिए शब्दों के प्रयोग पर पुनर्विचार किया जाए।
धर्मस्थलों की यात्रा आस्था का विषय, मनोरंजन नहीं
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में धर्मस्थलों की यात्रा को सदैव एक पवित्र साधना माना गया है। जब कोई श्रद्धालु अयोध्या, काशी, मथुरा, वृन्दावन या प्रयागराज जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा करता है, तो उसका उद्देश्य केवल घूमना-फिरना या मनोरंजन करना नहीं होता। वह वहाँ श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक अनुभव की तलाश में जाता है।
आज के समय में इन यात्राओं को अक्सर “धार्मिक पर्यटन” कहा जाने लगा है, जबकि यह शब्द इन यात्राओं की वास्तविक भावना को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता।
उत्तर प्रदेश – भारत की आध्यात्मिक धुरी
उत्तर प्रदेश भारत की आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख केंद्र है। अयोध्या, काशी, मथुरा-वृन्दावन, प्रयागराज और कुंभ जैसे विश्वविख्यात तीर्थस्थल यहाँ स्थित हैं।
पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश सरकार द्वारा इन स्थलों का व्यापक विकास किया गया है। घाटों का सौंदर्यीकरण, श्रद्धालुओं के लिए बेहतर आधारभूत सुविधाएं और विशाल धार्मिक आयोजनों की उत्कृष्ट व्यवस्था ने उत्तर प्रदेश को वैश्विक आध्यात्मिक मानचित्र पर और अधिक प्रतिष्ठित किया है।
इन प्रयासों के कारण देश-विदेश से आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को सुविधा मिली है और प्रदेश की आध्यात्मिक पहचान और मजबूत हुई है।
‘पर्यटन’ शब्द क्यों नहीं है पर्याप्त
सामान्यतः पर्यटन शब्द का प्रयोग उन यात्राओं के लिए किया जाता है जिनका उद्देश्य मनोरंजन, अवकाश या प्राकृतिक-ऐतिहासिक स्थलों का आनंद लेना होता है।
इसके विपरीत तीर्थस्थलों की यात्रा का मूल उद्देश्य श्रद्धा, दर्शन, साधना और आत्मिक उन्नति होता है। भारत की प्राचीन परंपरा में ऐसी यात्राओं को सदैव तीर्थयात्रा कहा गया है।
उत्तर प्रदेश जैसे आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य में प्रतिवर्ष करोड़ों श्रद्धालु केवल आस्था और दर्शन के भाव से आते हैं। इसलिए इन यात्राओं को “धार्मिक पर्यटन” कहना उनके वास्तविक उद्देश्य को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता।
भारतीय परंपरा का संदेश
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में श्रद्धा को ज्ञान और आत्मिक उन्नति का आधार माना गया है। भगवद्गीता का प्रसिद्ध सूत्र भी यही कहता है- ‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।‘ अर्थात श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति ही सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है।
इसी भावना को एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कथन भी स्पष्ट करता है- Tourists seek pleasure, pilgrims seek purpose. अर्थात पर्यटक आनंद की खोज में जाते हैं, जबकि तीर्थयात्री जीवन के उद्देश्य और आध्यात्मिक अर्थ की तलाश में निकलते हैं।
शब्द बदलने से भावनाओं का सम्मान
उत्तर प्रदेश भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है। यहाँ आने वाले लोग केवल घूमने के लिए नहीं बल्कि श्रद्धा और भक्ति के साथ दर्शन के लिए आते हैं।
ऐसे में यदि धार्मिक पर्यटन के स्थान पर तीर्थयात्रा, आस्था यात्रा या तीर्थ दर्शन जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाए तो यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं के अधिक अनुरूप होगा।
यह केवल शब्द परिवर्तन नहीं बल्कि आस्था की उस परंपरा का सम्मान है जो सदियों से भारत की सांस्कृतिक पहचान का आधार रही है।
(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं)