चौराहे पर खड़ी कांग्रेस: राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे हैं या पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं? चार विकल्प हैं

कांग्रेस नेतृत्व संकट, वैचारिक भ्रम और संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही है। राहुल गांधी के आक्रामक तेवर सुर्खियां तो बटोरते हैं, लेकिन मजबूत जमीनी ढांचा नहीं बना पा रहे। पार्टी के सामने पुनर्निर्माण, बिखराव, सीमित क्षेत्रीय अस्तित्व या स्थायी विपक्ष बनने जैसे चार रास्ते हैं। कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई चुनाव नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और नेतृत्व की विश्वसनीयता है।

May 24, 2026 - 12:10
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चौराहे पर खड़ी कांग्रेस: राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे हैं या पार्टी को गर्त में धकेल रहे हैं? चार विकल्प हैं

-बृज खंडेलवाल-

कांग्रेस की राजनीति आज जंगल में भटकते कारवां जैसी लगती है। रास्ता भी धुंधला। रहबर भी असमंजस में। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी बार-बार ऐसी राजनीतिक “कौवा-भोज” करती दिखती है, जहां हर अधूरा बयान, हर जल्दबाजी और हर कमजोर रणनीति उसकी साख को थोड़ा और खोखला कर देती है।

देश मजबूत विपक्ष चाहता है, मगर कांग्रेस अक्सर घायल मुसाफिर जैसी नजर आती है, जो मंजिल से ज्यादा बहानों की तलाश में है।

सबसे बड़ा संकट नेतृत्व का नहीं, भरोसे का है। कांग्रेस के पास अब वैसी दमदार, ईमानदार और ज़मीनी क्षेत्रीय फौज नहीं बची, जो अपने बूते जनाधार खड़ा कर सके। पुराने चेहरे थक चुके हैं। नए चेहरों को उभरने नहीं दिया जाता। अंदरूनी लोकतंत्र बंद कमरे में कैद है। परिवारवाद की धूल इतनी मोटी जम चुकी है कि प्रतिभा की पौध धूप तक नहीं देख पाती। शशि थरूर काबिल होते हुए भी, आज तक कोई खास जिम्मेदारी नहीं निभा पाए हैं!

कांग्रेस की मौजूदा राजनीति भी अजीब प्रतीक्षा में फंसी है। कभी उम्मीद करती है कि सरकार किसी संकट में फंस जाए। कभी आस कि महंगाई जनता को भड़का दे। कभी भरोसा कि विदेश नीति की उलझनें सत्ता को कमजोर कर देंगी। लेकिन राजनीति केवल विरोध का खेल नहीं है। जनता विकल्प चाहती है। विजन चाहती है। भरोसा चाहती है।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि राहुल गांधी के आक्रामक बयान सुर्खियां जरूर बटोरते हैं, लेकिन बिना मजबूत संगठन, बिना बूथ नेटवर्क और बिना स्पष्ट आर्थिक सोच के वे हवा में छोड़े गए तीर लगते हैं। कांग्रेस आज तक तय नहीं कर पाई कि वह गरीबों की पार्टी है, उदार बाजार की समर्थक है या सिर्फ भाजपा विरोध का मंच।

अगर पार्टी ने जल्द नेतृत्व संस्कृति नहीं बदली, साफ छवि वाले युवा नेताओं को आगे नहीं लाया और नई आर्थिक तथा संघीय सोच पेश नहीं की, तो उसका राष्ट्रीय आधार और सिकुड़ जाएगा। कुछ राज्यों में छिटपुट जीत मिल सकती है, मगर राष्ट्रीय राजनीति में उसकी जगह क्षेत्रीय दल तेजी से भर देंगे।

साल 2026 आते-आते खतरे की घंटियां अब धीमे नहीं बज रहीं। वे किसी जलती इमारत के फायर अलार्म की तरह चीख रही हैं। जिस पार्टी ने दशकों तक भारतीय राजनीति पर राज किया, वही आज थके हुए हाथी जैसी दिखती है, जो चढ़ाई पर हांफ रही है, जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी तेज रफ्तार घोड़ों की तरह आगे निकल चुके हैं।

पश्चिम बंगाल चुनावों ने कांग्रेस की हालत को और बेरहमी से उजागर कर दिया। भाजपा ने मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि कांग्रेस तस्वीर से लगभग गायब रही। कभी कांग्रेस भारतीय राजनीति का बरगद थी। आज कई राज्यों में वह धूल खाए पुराने साइनबोर्ड जैसी लगती है, जिसे लोग देखते तो हैं, मगर पढ़ते नहीं।

कांग्रेस के सामने फिलहाल चार रास्ते दिखाई देते हैं।

पहला रास्ता है धीरे-धीरे क्षेत्रीय अप्रासंगिकता की ओर फिसलना। पार्टी खत्म नहीं होगी, मगर लगातार सिमटती जाएगी। कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना या केरल जैसे कुछ जेबनुमा इलाकों तक सीमित रह सकती है। बाकी राज्यों में उसे क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों पर चलना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली में कांग्रेस पहले ही दर्शक दीर्घा की पार्टी बनती जा रही है।

दूसरा रास्ता पुनर्निर्माण का है। कठिन, मगर संभव। इसके लिए गांधी परिवार को रोजमर्रा की पकड़ ढीली करनी होगी। पार्टी में वास्तविक लोकतंत्र लाना होगा। राज्यों के नेताओं को ताकत देनी होगी। गैर वंशवादी युवा चेहरों को आगे बढ़ाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण, कांग्रेस को अपनी वैचारिक पहचान साफ करनी होगी। फिलहाल उसका संदेश कभी इधर, कभी उधर झूलते पुराने रेडियो जैसा लगता है।

भाजपा ने हिंदू पहचान और कल्याणकारी राष्ट्रवाद को एक साथ जोड़ दिया है। कांग्रेस उसके मुकाबले कोई भावनात्मक और विश्वसनीय कथा खड़ी नहीं कर पाई। केवल सेक्युलरिज्म अब चुनावी जादू नहीं पैदा करता। केवल कल्याणकारी वादे भी काफी नहीं। आज का मतदाता पहचान, राष्ट्रवाद, विकास और आकांक्षा सब कुछ एक ही पैकेज में चाहता है।

तीसरा रास्ता सबसे खतरनाक है। आंतरिक टूट और बिखराव। इतिहास इसके संकेत पहले ही दे चुका है। तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियां कांग्रेस से टूटकर निकलीं। राज्यों में कई नेताओं को लगता है कि दिल्ली का हाईकमान उनकी राजनीतिक सांसें रोक रहा है। जब योग्यता से ज्यादा वफादारी मायने रखने लगे, तो असंतोष धीरे-धीरे विस्फोट बन जाता है।

अगर हार का सिलसिला जारी रहा, तो और नेता भाजपा या क्षेत्रीय दलों की ओर जा सकते हैं। राजनीति डूबते जहाज पर ज्यादा देर खड़े रहने का खेल नहीं है। कार्यकर्ता सत्ता की तरफ भागते हैं। नेता अवसर की तरफ। विचारधारा अक्सर बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में आती है।

चौथा रास्ता है लंबी मगर फीकी राजनीतिक जिंदगी। इस स्थिति में कांग्रेस खत्म नहीं होगी, मगर दोबारा शिखर पर भी नहीं पहुंचेगी। वह विपक्षी गठबंधनों की धुरी बनी रहेगी। संसद में इतनी सीटें लाती रहेगी कि उसकी उपयोगिता बनी रहे। कुछ राज्यों में सरकारें भी बना सकती है। कभी-कभी गठबंधन राजनीति में किंगमेकर भी बन सकती है। शायद यही सबसे यथार्थवादी संभावना है। लेकिन केवल जीवित रहना किसी राजनीतिक आंदोलन को प्रेरित नहीं करता।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, "आज कांग्रेस उस पुराने थिएटर समूह जैसी लगती है, जो अब भी पुराने नाटक खेल रहा है, जबकि दर्शक डिजिटल मंचों पर जा चुके हैं। युवा मतदाता कांग्रेस को उसके वर्तमान कामों से कम, सोशल मीडिया के मजाक, पुराने घोटालों और वंशवाद की बहसों से ज्यादा पहचानते हैं। यह बेहद खतरनाक संकेत है।"

फिर भी कांग्रेस को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति में कई बार मृत घोषित खिलाड़ी वापसी कर चुके हैं। लेकिन वापसी विरासत के सहारे नहीं होती। वापसी भूख, अनुशासन, विनम्रता और पुनर्निर्माण से होती है, दक्षिण भारत की राजनीति के विश्लेषक वेंकट सुब्रमनियन ने कहा।

आखिरकार कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई चुनावी नहीं, मानसिक है। क्या पार्टी अब भी खुद को भारत का नेतृत्व करने योग्य मानती है? या उसने भीतर ही भीतर स्थायी विपक्ष बनने को स्वीकार कर लिया है?

सच में, जिस राजनीतिक दल के भीतर विश्वास ही खत्म हो जाए, वह बिना हवा की पतंग बन जाता है। कुछ देर आसमान में जरूर दिखता है, मगर अंत में गुरुत्वाकर्षण ही जीतता है।

SP_Singh AURGURU Editor