भले ही शादी रद्द हो जाए पर हक़ ज़िंदा रहेगा: पत्नी भरण-पोषण की हकदार, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देते हुए एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि किसी विवाह को कानूनन अमान्य या रद्द घोषित कर दिया जाता है, तब भी पत्नी अपने पति से स्थायी गुजारा भत्ता और मुकदमे के दौरान अंतरिम भरण-पोषण पाने की पूरी हकदार रहेगी। इस फैसले से हिंदू विवाह अधिनियम को लेकर वर्षों से चली आ रही कानूनी उलझनों और विरोधाभासी व्याख्याओं पर विराम लग गया है।

Jan 20, 2026 - 21:23
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भले ही शादी रद्द हो जाए पर हक़ ज़िंदा रहेगा: पत्नी भरण-पोषण की हकदार, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ, जस्टिस अभय एस. ओका, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने यह स्पष्ट किया कि विवाह की वैधता समाप्त हो जाने से पत्नी का आर्थिक संरक्षण समाप्त नहीं होता। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य किसी महिला को बेसहारा छोड़ना नहीं, बल्कि उसे सम्मानजनक जीवन का अधिकार देना है।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और धारा 25 की व्यापक और उद्देश्यपरक व्याख्या करते हुए दो अहम बिंदुओं पर स्थिति साफ की-

स्थायी गुजारा भत्ता (धारा 25)
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी विवाह को धारा 11 के तहत अमान्य घोषित किया गया है, तब भी प्रभावित जीवनसाथी धारा 25 के अंतर्गत स्थायी गुजारा भत्ता मांग सकता है। कानून में प्रयुक्त शब्द “कोई भी डिक्री” में विवाह को शून्य घोषित करने वाला आदेश भी शामिल है। हालांकि, भत्ता दिया जाए या नहीं, यह अदालत के विवेक, परिस्थितियों और दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करेगा।

मुकदमे के दौरान खर्च (धारा 24)
शीर्ष अदालत ने यह भी दो टूक कहा कि मुकदमा लंबित रहने के दौरान पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की मांग कर सकती है। भले ही प्रथम दृष्टया विवाह अवैध प्रतीत हो, लेकिन यदि पत्नी के पास पर्याप्त आय का साधन नहीं है तो अदालत धारा 24 के तहत राहत देने से इनकार नहीं कर सकती।

पति की दलीलें हुईं खारिज

मामले में पति की ओर से तर्क दिया गया कि अमान्य विवाह का कानून में कोई अस्तित्व नहीं होता, इसलिए पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ऐसी संकीर्ण व्याख्या कानून की आत्मा और महिलाओं के संरक्षण के उद्देश्य को कमजोर करती है।

वहीं पत्नी की ओर से दलील दी गई कि धारा 25 संविधान प्रदत्त सामाजिक न्याय और महिला सुरक्षा की भावना से जुड़ा प्रावधान है। केवल विवाह को अवैध ठहराकर महिला को भरण-पोषण से वंचित करना अन्यायपूर्ण होगा और सुप्रीम कोर्ट ने इसी तर्क को स्वीकार किया।

कानून की आत्मा पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि कानून को केवल तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण और सामाजिक यथार्थ के अनुरूप पढ़ा जाना चाहिए। विवाह चाहे वैध रहे या अमान्य ठहराया जाए, महिला की गरिमा और जीवनयापन का अधिकार सर्वोपरि है।

SP_Singh AURGURU Editor