उन्नाव के पास भीषण बस हादसे में सात मौतों के बाद फिर उठे गंभीर सवाल—क्या आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे ‘स्पीड कॉरिडोर’ बनकर रह गया है या लगातार बढ़ते हादसों के बीच यह अब ‘मौत का गलियारा’ साबित हो रहा है, जहां रात्रिकालीन थकान, झपकी और अधूरी सुरक्षा व्यवस्था जिम्मेदार बन रही है?
आगरा/लखनऊः उन्नाव जनपद के निकट आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर हुए भीषण सड़क हादसे में सात लोगों की मौत और लगभग 20 लोगों के घायल होने की घटना ने एक बार फिर एक्सप्रेसवे की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां लगातार हो रही दुर्घटनाएं, रात्रिकालीन झपकी और कथित प्रशासनिक लापरवाही अब राष्ट्रीय चिंता का विषय बनती जा रही हैं।
इस दुर्घटना की प्रारंभिक जांच में हादसे का कारण चालक को झपकी आना, अत्यधिक थकान और तेज रफ्तार बताया जा रहा है।
लगातार हादसों से सवालों के घेरे में एक्सप्रेसवे
यह कोई पहली घटना नहीं है। आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे पर पिछले कई वर्षों से लगातार सड़क दुर्घटनाएं सामने आ रही हैं। विशेषकर रात्रि 12 बजे से सुबह 8 बजे के बीच होने वाले हादसे अधिक चिंताजनक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण चलते वाहन में चालक को नींद आ जाना या अत्यधिक थकान है।
7,024 दुर्घटनाओं का डेटा - 54.7% थकान से जुड़े मामले
विभिन्न प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच इस एक्सप्रेसवे पर कुल 7,024 दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से 54.7 प्रतिशत मामलों में चालक की झपकी या थकान मुख्य कारण रही। इसके बावजूद रात के समय 120 किलोमीटर प्रति घंटा जैसी उच्च गति सीमा पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
10 नवंबर 2025 की बैठक और प्रस्तावित सुरक्षा उपाय
लखनऊ स्थित यूपीड़ा मुख्यालय में 10.11.2025 को आयोजित बैठक में मुख्य कार्यपालक अधिकारी की अध्यक्षता में सड़क सुरक्षा पर विस्तृत चर्चा हुई थी। इस बैठक में आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन द्वारा विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया गया था।
बैठक में कई महत्वपूर्ण सुझावों पर सहमति बनी थी, जिनमें शामिल थे- रात्रि गति सीमा 120 किमी/घंटा से घटाकर 75 किमी/घंटा की जाए। ड्रोन आधारित दुर्घटना निगरानी हो। रोड सेफ्टी ऑडिट के अलावा डेटा एनालिस्ट की नियुक्ति करना भी तय हुआ था। क्रैश बैरियर सुधार, ड्राइवर वेलनेस जोन, वे-साइड सुविधाएं, एआई आधारित ई-निगरानी प्रणाली और विश्राम क्षेत्र की स्थापना के फैसले भी हुए थे, लेकिन आज तक इन प्रस्तावों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
चलते वाहन में नींद सबसे बड़ी अदृश्य समस्या
एडवोकेट केसी जैन के अनुसार विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी दूरी के बस और ट्रक चालक लगातार ड्राइविंग, थकान और नींद की कमी के कारण व्हील पर सो जाने की स्थिति में पहुंच जाते हैं, जिससे हादसों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
प्रस्तावित योजना के अनुसार हर 40–50 किमी पर विश्राम स्थल, मुफ्त डॉरमिटरी सुविधा, सस्ते भोजन और चाय की व्यवस्था, ड्राइवर वेलनेस जोन और सुरक्षित पार्किंग सुविधा भी देनी थी, लेकिन जमीनी स्तर पर ये सुविधाएं अभी भी पर्याप्त नहीं हैं।
ई-निगरानी पर सवाल- केवल स्पीड कंट्रोल या समग्र सुरक्षा?
सर्वोच्च न्यायालय के 7 अक्टूबर 2025 के आदेश में लेन अनुशासन को अनिवार्य बताया गया था। इसके बावजूद वर्तमान निगरानी व्यवस्था मुख्यतः केवल ओवरस्पीडिंग तक सीमित मानी जा रही है।
नियम 167A के तहत अन्य महत्वपूर्ण उल्लंघनों पर भी निगरानी आवश्यक है। इसमें लेन अनुशासन, मोबाइल उपयोग, सीट बेल्ट, ओवरलोडिंग, हेलमेट नियम, वाहन फिटनेस और टायर स्थिति की निगरानी होनी है।
नया रोड सेफ्टी ऑडिट भी बना सवाल
एडवोकेट केसी जैन का कहना है कि वर्ष 2019 के बाद कोई स्वतंत्र रोड सेफ्टी ऑडिट नहीं कराया गया, जबकि वाहनों की संख्या में भारी वृद्धि हो चुकी है। विशेषज्ञों ने आईआईटी दिल्ली, सीआरआरआई या किसी स्वतंत्र एजेंसी से तत्काल ऑडिट की मांग की है।
स्पीड नहीं, सुरक्षा प्राथमिकता हो
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता के.सी. जैन ने कहा कि यदि आंकड़े स्पष्ट रूप से थकान को सबसे बड़ा कारण बता रहे हैं, तो केवल स्पीड लिमिट को विकास मानना बड़ी भूल होगी। उन्होंने कहा कि गति रुक सकती है, जीवन नहीं। आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे को स्पीड कॉरिडोर नहीं, बल्कि सेफ्टी कॉरिडोर बनाना समय की मांग है।