राखी गुलजार से राखी सावंत तक: सिनेमा का सफर- जहां कभी सितारे आसमान थे, अब बस चकाचौंध की क्षणिक फुलझड़ियां रह गई हैं
पहले के कलाकार सिर्फ अभिनेता नहीं, एक एहसास और प्रेरणा हुआ करते थे—जिनकी अदाकारी, संवाद और व्यक्तित्व लोगों के दिलों में बस जाते थे। आज के दौर में चमक तो है, लेकिन ठहराव और गहराई कम दिखती है। फिल्मों में शोर और तड़क-भड़क बढ़ी है, जबकि कहानी, संगीत और किरदारों की आत्मा कमजोर पड़ी है। इस बदलाव के लिए सिर्फ कलाकार नहीं, बल्कि दर्शकों की बदलती पसंद भी जिम्मेदार है।
-बृज खंडेलवाल-
धुरंधर देख कर लौट रहे एक शख्स से पूछा; फिल्म का कोई गीत या डायलॉग सुना दो, बाबू। कन्फ्यूजन की धुंध चीरते हुआ बोला: याद नहीं, बहुत शोर था!
एक वक्त था… जब हीरो सिर्फ परदे पर नहीं होता था। वो दिलों पर राज करता था। उसकी चाल में नज़ाकत होती थी, उसकी आवाज़ में वजन होता था, और उसके हर अंदाज़ में एक अलग ही कशिश होती थी। लोग उसे सिर्फ देखते नहीं थे, जीते थे। उसके जैसा बोलते थे, उसके जैसा पहनते थे, उसके जैसा बनने का ख्वाब देखते थे।
आज? चेहरे आते हैं। थोड़ी देर चमकते हैं। फिर भीड़ में कहीं खो जाते हैं। ना कोई अंदाज़ ठहरता है, ना कोई डायलॉग ज़हन में बसता है। सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं है।
पुराना बॉलीवुड सिर्फ एक दौर नहीं था, एक एहसास था। एक रूह थी, जो हर फिल्म में, हर किरदार में धड़कती थी। उस दौर के सितारे वाकई टाइटन थे। आसमान जितने बड़े। दिलों में बस जाने वाले। आज के सितारे? जैसे फुलझड़ियां। एक पल चमकती हैं, फिर अंधेरे में गुम।
ज़रा पीछे चलिए। उस सुनहरे ज़माने में। अशोक कुमार। नाम लेते ही एक सलीका याद आता है। “किस्मत” में उनकी सादगी ने ये सिखाया कि असली हीरो चिल्लाता नहीं, असर छोड़ जाता है।
सुनील दत्त। खामोश गहराई का नाम। “मदर इंडिया” में उनका दर्द और “प्यासा” में उनकी गंभीरता, नौजवानों को सोचने का सलीका सिखाती थी। उनका कुर्ता, उनका अंदाज़, एक पहचान बन गया था।
राज कपूर। शोमैन। आम आदमी का ख्वाब। “आवारा हूं…” सिर्फ एक गीत नहीं था, एक पूरी नस्ल की आवाज़ था। उनकी टोपी, उनकी मुस्कान, हर गली में दिखाई देती थी।
फिर आए शम्मी कपूर। एक बगावत, एक जुनून। “याहू!” की एक पुकार और पूरा मुल्क झूम उठा। उन्होंने जवानी को एक नई पहचान दी। बेफिक्र, बिंदास, ज़िंदा।
देव आनंद। झुकी हुई टोपी, आंखों में शरारत, होंठों पर मुस्कान। स्टाइल क्या होता है, उन्होंने बताया। उनका हर डायलॉग जैसे हवा में खुशबू छोड़ जाता था।
धर्मेंद्र। मिट्टी की महक। सीधी सादी मर्दानगी। “शोले” का वीरू आज भी दिलों में ज़िंदा है। गांव के लड़के उनकी तरह मूंछें रखने लगे थे।
और फिर… एक आवाज़ आई। गूंज बन गई। अमिताभ बच्चन। गुस्सा, दर्द, बगावत। “मेरे पास मां है…” ये सिर्फ डायलॉग नहीं था, एक एहसास था। हर दबे हुए नौजवान की आवाज़।
दिलीप कुमार। ट्रेजडी किंग। उनकी आंखों में दर्द था, उनके लफ्ज़ों में शायरी। “देवदास” हो या “मुग़ल-ए-आज़म”, वो किरदार नहीं निभाते थे, उसे जीते थे।
और ये कारवां यहीं नहीं रुका। बलराज साहनी ने हकीकत को आईना दिखाया। महमूद ने हंसी को इबादत बना दिया। प्राण ने खलनायकी को भी एक अलग ही शान दी। याद कीजिए: मनोज कुमार, राज कुमार, राजेश खन्ना, ऋषि, शशि कपूर, क्या जमाना था!
अब बात हीरोइनों की। वो सिर्फ खूबसूरत नहीं थीं। वो एक तहज़ीब थीं। मीना कुमारी। दर्द की तस्वीर। “पाकीज़ा” की हर अदा में शायरी थी। औरतें उनकी तरह साड़ी पहनती थीं, आंखों में वही काजल सजाती थीं। वहीदा रहमान। नफासत, सादगी, और गहराई। “गाइड” में उनका जादू आज भी ताज़ा है। हेमा मालिनी। ड्रीम गर्ल। मुस्कान ऐसी कि हर लड़की दुल्हन बनकर वैसा ही दिखना चाहे।
हेलन। जैसे आग का एक टुकड़ा। हर गाना, हर ठुमका, दिलों में बिजली गिरा देता था। माला सिन्हा, शर्मिला टैगोर राखी, माधुरी, एक लंबी कतार! जीनत अमान। आज़ादी की तस्वीर। एक नई सोच, एक नया अंदाज़।
वो फिल्में… वो गाने…
मुग़ल-ए-आज़म, शोले और पाकीज़ा- ये सिर्फ फिल्में नहीं हैं। ये यादें हैं। ये विरासत हैं। शादियों में, महफिलों में, सियासत के मंचों पर, उनके डायलॉग आज भी जिंदा हैं।
और आज? किसी नई फिल्म का एक भी डायलॉग याद है? आज के सितारे आज हैं, कल नहीं। ना कोई गहराई, ना कोई असर। शोर बहुत है, मगर सन्नाटा उससे भी ज्यादा गहरा है। राखी सावंत। शोर ज्यादा, असर कम। हुमा कुरैशी और नोरा फतेही। कुछ पलों की चमक, फिर खामोशी।
ओटीटी का दौर आया। हकीकत के नाम पर गाली, खून, और बेहूदगी परोसी जा रही है। कहानी कमजोर, किरदार खोखले, जज़्बात गायब।
संगीत भी जैसे अपनी रूह खो चुका है। ना वो सुर, ना वो लफ्ज़। बस बीट है, शोर है, और कुछ हफ्तों में भूल जाने वाले गाने।
पहले कपड़े पहचान बनते थे। साड़ी, सलवार, सूट एक ट्रेंड नहीं, एक तहज़ीब थे। आज? फटी जींस, जिम वियर। ना कोई पहचान, ना कोई असर। सच कड़वा है। मगर सच है। बॉलीवुड का वो सुनहरा दौर अब धुंध में खोता जा रहा है। जो स्टार सिस्टम कभी पत्थर की इमारत था, आज रेत का महल लगता है।
फिर भी…पुराना सोना है। उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती। “मुग़ल-ए-आज़म” आज भी देखी जाती है। “शोले” आज भी गूंजती है। “पाकीज़ा” आज भी आंखें नम कर देती है। कल के सितारों ने इस सिनेमा की रूह बनाई थी।
आज के सितारे? बस स्क्रीन किराए पर लेते हैं। मगर एक सवाल अब भी हवा में तैर रहा है। क्या गलती सिर्फ कलाकारों की है? या दर्शक भी बदल गए हैं?
जब तालियां हुनर से ज्यादा हंगामे को मिलने लगें, जब कंटेंट से ज्यादा कंट्रोवर्सी बिकने लगे, तो फिर असली सितारे कहां से जन्म लेंगे?
और दिल फिर वही गुनगुनाता है- वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन…।”
शायद वो दौर लौटकर कभी नहीं आएगा। मगर उसकी खुशबू…उसकी याद…हमेशा जिंदा रहेगी।