गैस संकट ने पलट दी तस्वीर: बरेली में घर-घर स्टोव-लालटेन की खोज, बाजारों में भी ढूंढे नहीं मिल रहे

-रमेश कुमार सिंह- बरेली। एलपीजी की किल्लत ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि लोग फिर से पुराने दौर की ओर लौटने को मजबूर हो गए हैं। घरों में स्टोव और लालटेन की तलाश तेज हो गई है, लेकिन विडंबना यह है कि जिन साधनों को आधुनिकता की दौड़ में भुला दिया गया था, वे अब बाजार और घर, दोनों जगहों से गायब हैं।

Mar 31, 2026 - 19:01
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गैस संकट ने पलट दी तस्वीर: बरेली में घर-घर स्टोव-लालटेन की खोज, बाजारों में भी ढूंढे नहीं मिल रहे

पिछले लगभग 20 दिनों से एलपीजी गैस की कमी ने बरेली के शहरी और ग्रामीण इलाकों में खाना बनाने की व्यवस्था को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि लोगों ने चूल्हे जलाने शुरू कर दिए हैं, वहीं बिजली से चलने वाले इंडक्शन भी चर्चा में आ गए हैं। इसी बीच सरकार द्वारा राशन की दुकानों (पीडीएस) के माध्यम से मिट्टी का तेल (केरोसिन) उपलब्ध कराने के निर्देश के बाद अचानक स्टोव और लालटेन की मांग भी बढ़ गई है।

दो दिनों से शहर और गांवों में लोग अपने घरों के कबाड़खानों में पुराने स्टोव और लालटेन खोज रहे हैं। पड़ोसियों से पूछताछ हो रही है कि अगर आपके पास स्टोव है तो कुछ दिन के लिए दे दीजिए। लेकिन ज्यादातर घरों में यह सामान अब मिलना मुश्किल हो गया है।

बरेली के अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) संतोष कुमार सिंह ने बताया कि उत्तर प्रदेश में केरोसिन की आपूर्ति अचानक बंद नहीं हुई थी, बल्कि 2015 से 2018 के बीच धीरे-धीरे इसे खत्म किया गया। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के बाद गैस कनेक्शन बढ़े और बिजली की उपलब्धता में सुधार हुआ, जिससे केरोसिन पर निर्भरता कम हो गई। इसी के साथ स्टोव और लालटेन का उपयोग भी लगभग समाप्त हो गया।

बरेली कॉलेज की सीनियर प्रोफेसर डॉ. वंदना शर्मा बताती हैं कि वह पिछले दो दिनों से बाजार में केरोसिन स्टोव तलाश रही हैं, लेकिन कहीं भी उपलब्ध नहीं है। दुकानदार एक सप्ताह का समय मांग रहे हैं। उनका कहना है कि एक समय घर में दो-दो स्टोव हुआ करते थे, लेकिन अब उनका कहीं पता नहीं है।

विकासखंड भुता के सतेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि पहले गांवों में हर घर में कई लालटेन होती थीं- आंगन, कमरा और दरवाजे पर। लेकिन अब बिजली आने के बाद लालटेन पूरी तरह गायब हो गई हैं। आज उनके गांव में एक भी घर में लालटेन नहीं बची है।

डा. अर्चना सिंह के अनुसार आज की नई पीढ़ी स्टोव से अनजान है। विश्वविद्यालय में छात्रों से जब स्टोव के बारे में पूछा गया तो उन्होंने उल्टा सवाल किया- स्टोव होता क्या है? उन्होंने बताया कि केरोसिन स्टोव का इतिहास 19वीं सदी से जुड़ा है और 1890 के दशक में स्वीडन के आविष्कारक फ्रांस विल्हेल्म लिंडक्विस्ट ने आधुनिक प्राइमस स्टोव विकसित किया था, जो पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुआ।

पशुपतिनाथ कालोनी के राजवीर सिंह गुर्जर बताते हैं कि गांव कपूरपुर में बिजली की कमी के कारण वह अपनी बुजुर्ग मां के लिए लालटेन ढूंढ रहे हैं, लेकिन बाजार में कहीं उपलब्ध नहीं है। दुकानदार गोदाम में तलाश करने की बात कह रहे हैं।

फरीदपुर के नवरत्न लाल गौड़ का कहना है कि उनके गांव में स्टोव तो है, लेकिन उसका पम्प वॉशर खराब है, जो बाजार में नहीं मिल रहा। वह जुगाड़ से वॉशर बनवाने की कोशिश कर रहे हैं।

एजाज नगर गोटिया के हसीन मियां ने बताया कि वह कई दुकानों पर जा चुके हैं, लेकिन नया या पुराना स्टोव कहीं नहीं मिल रहा। वहीं जगतपुर के मिस्त्री जफर बताते हैं कि अचानक स्टोव की मांग बढ़ गई है। उन्होंने कारीगर बुलाया है और दो-तीन दिन में स्टोव तैयार करने की बात कही है, हालांकि जरूरी पुर्जों की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

पंडित हरि शंकर, जो एक प्रेस में कंप्यूटर ऑपरेटर हैं, कहते हैं कि उनके बच्चे यह तक नहीं जानते कि स्टोव क्या होता है। यह स्थिति बताती है कि कैसे एक पूरी पीढ़ी पारंपरिक साधनों से कट चुकी है।

कुल मिलाकर बरेली में गैस संकट ने न सिर्फ लोगों की दिनचर्या बदल दी है, बल्कि यह भी उजागर कर दिया है कि आधुनिकता की दौड़ में हमने अपने पारंपरिक और वैकल्पिक साधनों को पूरी तरह भुला दिया है। अब जब संकट आया है, तो वही पुराने साधन सबसे ज्यादा याद आ रहे हैं, लेकिन वे अब न घरों में हैं, न बाजार में।

SP_Singh AURGURU Editor