‘खामोश करवाया गया हूं, हारा नहीं’— राघव चड्ढा के तीखे पोस्ट ने खोली आम आदमी पार्टी की अंदरूनी दरार, क्या बढ़ेगा टकराव?
‘खामोश करवाया गया हूं, हारा नहीं… मेरी खामोशी को हार मत समझना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है।‘- राघव चड्ढा का यह ताजा पोस्ट महज भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष और शक्ति-संघर्ष का स्पष्ट संकेत बनकर सामने आया है।
-एसपी सिंह-
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी, जो कभी साफ राजनीति और आंतरिक लोकतंत्र के मॉडल के रूप में प्रस्तुत की जाती थी, अब उसी के भीतर नेतृत्व संघर्ष के संकेत दिखने लगे हैं। राघव चड्ढा को राज्यसभा के उपनेता पद से हटाया जाना केवल एक संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन में बदलाव का स्पष्ट संकेत है।
अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले चड्ढा का इस तरह किनारे होना यह बताता है कि पार्टी नेतृत्व अब उन नेताओं को लेकर अधिक सतर्क है, जो भविष्य में समानांतर शक्ति केंद्र बन सकते हैं। चड्ढा की पहचान केवल एक सांसद तक सीमित नहीं रही, बल्कि पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्य में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर का चेहरा बना दिया था।
यही वह बिंदु है जहां से असहजता शुरू होती है। किसी भी दल में जब एक नेता तेजी से उभरता है और संगठनात्मक पकड़ मजबूत करता है, तो शीर्ष नेतृत्व के लिए वह संभावित चुनौती के रूप में देखा जाने लगता है। हाल के दिनों में चड्ढा ने राज्यसभा में कुछ ऐसे मुददे उठाये, जिससे आम लोगों को राहत मिली। इससे भी जनता के बीच उनकी अच्छी छवि बनी।
संकट के समय जब शराब नीति प्रकरण में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया जैसे बड़े चेहरे घिरे हुए थे, उस दौरान राघव चड्ढा का अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहना नेतृत्व की नजर में राजनीतिक अनुपस्थिति के रूप में दर्ज हुआ। उस समय कई माह चड्ढा देश से लंदन में रहे थे। वे वहां अपनी आंख का इलाज कराने गये थे, लेकिन आंख के इलाज के नाम पर कई माह बाहर रहना किसी के गले नहीं उतर रहा था। शायद यही वह मोड़ माना जा रहा है, जिसने भरोसे की दरार को गहरा किया।
दूसरी ओर, चड्ढा का यह सार्वजनिक और आक्रामक पोस्ट यह दर्शाता है कि वे संगठन के भीतर दबे रहने की राजनीति नहीं करने वाले। उनका ‘दरिया से सैलाब’ वाला रूपक सीधा संकेत है कि यदि परिस्थितियां बनीं, तो वे खुलकर अपनी बात रख सकते हैं और यह स्थिति पार्टी के लिए असहज हो सकती है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो चड्ढा के पास दो बड़ी ताकतें हैं- पहली- संगठन के भीतर की गहरी जानकारी और दूसरी- युवा, शहरी और मीडिया फ्रेंडली छवि।
यदि यह असंतोष बढ़ता है, तो यह केवल व्यक्तिगत टकराव नहीं रहेगा, बल्कि पार्टी की रणनीतिक एकजुटता पर असर डाल सकता है, खासकर ऐसे समय में जब राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की कोशिशें जारी हैं।
अभी तक आम आदमी पार्टी में नेतृत्व का केंद्रीकरण स्पष्ट रहा है, लेकिन चड्ढा प्रकरण यह सवाल खड़ा करता है कि क्या पार्टी में उभरते नेताओं के लिए पर्याप्त राजनीतिक स्पेस है या नहीं।
राघव चड्ढा का ताजा पोस्ट एक चेतावनी भी है और संकेत भी। यह बताता है कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि चड्ढा की यह खामोशी सच में सैलाब बनती है या फिर संगठनात्मक अनुशासन इसे थाम लेता है।