यूपी की जेलों में ‘ई-मुलाकात’ का छलावा: डिजिटल दावे ऊंचे, ज़मीनी हकीकत में कैदियों के परिवार अब भी बेहाल

उत्तर प्रदेश की जेलों में ई-मुलाकात की सुविधा कागज़ों और सरकारी दावों में जितनी प्रभावशाली दिखती है, ज़मीन पर उतनी ही कमजोर और अव्यवस्थित नजर आती है। सवा लाख से अधिक बंदियों वाले प्रदेश में परिजनों को वीडियो कॉल के जरिए मुलाकात का अधिकार अब भी स्पष्ट नियमों, समयसीमा और पारदर्शिता के अभाव में अधर में लटका हुआ है, जिससे कैदियों के परिवार तकनीक के इस वादे के बावजूद दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

Apr 13, 2026 - 13:16
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यूपी की जेलों में ‘ई-मुलाकात’ का छलावा: डिजिटल दावे ऊंचे, ज़मीनी हकीकत में कैदियों के परिवार अब भी बेहाल

-के.सी जैन एडवोकेट-

उत्तर प्रदेश में डिजिटल इंडिया के बड़े-बड़े दावों के बीच जेलों में ई-मुलाकात व्यवस्था एक अधूरी हकीकत बनकर सामने आई है। एनआईसी के माध्यम से ePrisons पोर्टल पर शुरू की गई यह सुविधा कागज़ों में तो क्रांतिकारी दिखाई देती है, लेकिन आम कैदियों के परिजनों तक इसकी वास्तविक पहुंच बेहद सीमित है।

UP जेल मैनुअल 2022, जिसे 17 अगस्त 2022 को अधिसूचित किया गया और जो प्रिज़न्स एक्ट 1894 की धारा 59 के तहत लागू हुआ, जेल संचालन के लिए नया ढांचा प्रदान करता है। इसमें भौतिक मुलाकात के तहत सप्ताह में एक बार रिश्तेदारों से मिलने की अनुमति है, साथ ही सुरक्षा के लिए फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी अनिवार्य की गई है।

डिजिटल पहल के रूप में ऑडियो-विजुअल माध्यमों का जिक्र तो है, लेकिन ई-मुलाकात को लेकर कोई स्पष्ट, बाध्यकारी और विस्तृत प्रावधान नहीं दिए गए हैं। यही सबसे बड़ी खामी बनकर सामने आ रही है।

उत्तर प्रदेश में V-Mulakat प्रणाली के तहत परिजनों को पहले पुलिस स्टेशन या कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) पर आवेदन करना पड़ता है। इसके बाद आवेदन पुलिस मुख्यालय भेजा जाता है, जहां से जेल विभाग के साथ समन्वय कर समय तय होता है। अनुमति मिलने पर ही वीडियो कॉल संभव हो पाती है।

eprisons.nic.in पोर्टल के जरिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी उपलब्ध है, लेकिन अंतिम मंजूरी जेल अधीक्षक के विवेक पर निर्भर रहती है। यहीं से पूरी व्यवस्था में असमानता और मनमानी की शुरुआत होती है।

सबसे गंभीर समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश में ई-मुलाकात की आवृत्ति को लेकर कोई स्पष्ट नियम नहीं है। जबकि महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों में यह तय है कि विचाराधीन कैदी को महीने में चार और दोषी कैदी को दो मुलाकातें मिलेंगी, वहीं यूपी में सब कुछ जेल प्रशासन की इच्छा पर टिका है।

विदेश में रहने वाले परिजनों के लिए तो यह सुविधा लगभग शून्य है। नियमों के अनुसार केवल भारत में रहने वाले परिजन ही ई-मुलाकात कर सकते हैं, जिससे हजारों परिवार इस सुविधा से बाहर हो जाते हैं।

मंजूरी प्रक्रिया भी बेहद लंबी और जटिल है। हर मुलाकात के लिए पुलिस और जेल दोनों की अनुमति आवश्यक होती है, जिससे आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह एक थकाऊ और निराशाजनक प्रक्रिया बन जाती है।

प्रदेश में 75 से अधिक जेलें और सवा लाख से ज्यादा बंदी हैं। देश के कुल विचाराधीन कैदियों का 42 प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या के लिए एक स्पष्ट और मजबूत ई-मुलाकात प्रणाली का अभाव सीधे-सीधे न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि ई-मुलाकात को उन सभी कैदियों तक बढ़ाया जाना चाहिए जिनके परिजन दूर रहते हैं। लेकिन यूपी में यह सुविधा अब भी सीमित और असंगठित बनी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है। कैदी की सजा उसके परिवार को नहीं भुगतनी चाहिए, लेकिन वर्तमान व्यवस्था यही दर्शा रही है।

अब जरूरत है कि उत्तर प्रदेश सरकार एक स्पष्ट, पारदर्शी और बाध्यकारी मानक संचालन प्रक्रिया जारी करे, जिसमें ई-मुलाकात की संख्या, समय-सीमा, अवधि और प्रक्रिया स्पष्ट रूप से तय हो। साथ ही विदेश में रहने वाले परिजनों के लिए भी सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

जब तक यह नहीं होता, तब तक ई-मुलाकात सिर्फ एक सरकारी घोषणा बनी रहेगी और वह बुजुर्ग मां, जो अपने बेटे से सिर्फ एक वीडियो कॉल पर बात करना चाहती है, इंतजार करती रह जाएगी।

(लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)Top of Form

SP_Singh AURGURU Editor