इन्सब्रुक: जहां पहाड़ों ने बजाया बिगुल, नदी ने गाया गीत और आल्प्स ने जमकर ठुमके लगाए!

इन्सब्रुक की यात्रा में आल्प्स की भव्य चोटियों, इन्स नदी की रवानी, रंगीन ऐतिहासिक गलियों और व्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन के साथ टायरोल की जीवंत लोक संस्कृति का अनुभव हुआ। गुंडोल्फ परिवार के ‘टायरोलर आबेंड’ कार्यक्रम में पारंपरिक संगीत, योडलिंग, नृत्य और जूते थपथपाने की प्रस्तुति ने यात्रा को खास बना दिया। प्रकृति, इतिहास, अनुशासन और लोक उत्सव के अनूठे मेल ने इन्सब्रुक की यादों को लंबे समय तक जीवंत रखने वाला बना दिया।

Sep 24, 2026 - 21:10
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इन्सब्रुक: जहां पहाड़ों ने बजाया बिगुल, नदी ने गाया गीत और आल्प्स ने जमकर ठुमके लगाए!

-इन्सब्रुक, ऑस्ट्रिया से बृज खंडेलवाल-

पहाड़ों ने पहले ही हमारी साँसें रोक रखी थीं, लेकिन इन्सब्रुक ने तो दिल ही लूट लिया। चारों तरफ आसमान को छूती आल्प्स की चोटियाँ, बीच शहर से गुजरती इन्स नदी, रंग-बिरंगी इमारतें और सलीके से चलती ट्रामें, और फिर शाम होते ही ऐसा धमाल कि लगा, पहाड़ अपनी बर्फीली चादर उतारकर नाचने के लिए नीचे उतर आए हैं!

मर्द चमड़े की निकर में जूते थपथपा रहे थे, महिलाएँ चटख रंगों की पारंपरिक पोशाकों में घूम रही थीं, पीतल के बाजे गरज रहे थे और वीणा जैसी मधुर धुनों वाला हार्प माहौल में मिठास घोल रहा था। इन्सब्रुक ने मानो ऐलान कर दिया था—सिर्फ पहाड़ देखना काफी नहीं, मेहमानों को थोड़ा नचाना भी जरूरी है!

हम पहाड़ देखने आए थे। लौटे तो लोकगीत सिर में और मुस्कान चेहरे पर थी।

ऑस्ट्रिया के टायरोल क्षेत्र में बसा इन्सब्रुक एक ऐसा खूबसूरत शहर है, जिसे प्रकृति ने पहाड़ों के विशाल रंगमंच के बीच सजाया है। चारों ओर ऊँची-ऊँची आल्प्स की चोटियाँ खड़ी हैं। ऐसा लगता है, सदियों से ये पहाड़ सम्राटों का आना-जाना, राजवंशों का उत्थान-पतन और पर्यटकों का कैमरा तानना चुपचाप देखते आ रहे हैं।

शहर के बीचोंबीच बहती है इन्स नदी (River Inn)। धूप की किरणें जब इसके पानी पर पड़ती हैं, तो नदी चाँदी की लकीर जैसी चमक उठती है। पानी का बहाव शहर को एक शांत, मगर जीवंत धड़कन देता है।

नदी को देखकर मन में एक शेरनुमा खयाल आया:

बादशाह आए, बादशाह गए, तख्त बदले हजार,

नदी बोली, मैं तो बहती रहूँगी, मेरा क्या है दरबार!

इन्सब्रुक का नाम भी इसी नदी से जुड़ा है। इसका अर्थ है—इन्स नदी पर बना पुल। यानी नदी यहाँ केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि शहर की पहचान, इतिहास और जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

एक ओर प्रकृति का रौद्र और भव्य रूप, दूसरी ओर इंसानी व्यवस्था का नफासत भरा नमूना। ऊँचे पहाड़ ऐसे लगते हैं जैसे किसी बेपरवाह कलाकार ने अपनी पूरी कल्पना उँडेल दी हो। शहर, इसके विपरीत, किसी बेहद अनुशासित नगर-नियोजक की कृति लगता है।

हमारी मार्गदर्शक और अब तक की यात्रा की दार्शनिक साथी लेडी मार्था ने शहर की रूह को खूब पकड़ा:

"इन्सब्रुक आपको सिर्फ पहाड़ दिखाता नहीं, बल्कि उन्हें नाचने के लिए नीचे बुलाता है।"

और सच कहें तो शाम तक ऐसा ही महसूस हुआ।

लाल बसें और चमचमाती ट्रामें ऐतिहासिक गलियों से होकर बिना किसी हड़बड़ी के गुजर रही थीं। पुराने भवनों की रंगीन दीवारें, छोटे कैफे, दुकानें और आधुनिक जीवन, सब एक-दूसरे के साथ ऐसे घुले-मिले थे, जैसे सदियों से पड़ोसी हों।

साथी यात्री पद्मिनी अय्यर ने बिल्कुल दुरुस्त फरमाया:

"हम उन चौकों और पुराने बाजारों में घूमे, जहाँ इतिहास किसी संग्रहालय की प्रदर्शनी जैसा नहीं, बल्कि ऐसे पड़ोसी जैसा लगता है, जिसने घर खाली करने से साफ इनकार कर दिया हो।"

क्या खूब बात कही! इन्सब्रुक में इतिहास किसी शीशे के बक्से में बंद होकर चुप रहने को मजबूर नहीं है। वह कैफे में बैठता है, दुकानों के सामने से गुजरता है और ट्रामों को अपनी आँखों के सामने दौड़ता देखता है।

यह शहर अतीत को सँभालकर रखता है, मगर उसमें कैद नहीं होता। पुराना और नया यहाँ एक-दूसरे से झगड़ते नहीं, बल्कि मिल-बाँटकर जिंदगी चलाते हैं।

इन्सब्रुक की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए एक अलग से तालियाँ बनती हैं।

बसें और ट्रामें समय की पाबंद, व्यवस्थित और बेहद तहजीबदार। न हॉर्न का कोलाहल, न सड़क के हर इंच पर कब्जा जमाने की होड़, न हर मोड़ पर ऐसा संघर्ष जैसे किसी ने सड़क की जागीर लिख दी हो।

भारत में कभी-कभी पीछे से आने वाला वाहन ऐसा व्यवहार करता है, जैसे उसे आपके जीवन की सारी प्राथमिकताएँ बदलने का ठेका मिला हो। इन्सब्रुक में गाड़ियाँ एक सरल सिद्धांत पर चलती दिखीं—नियम मानो, समय पर पहुँचो और दूसरों को भी चैन से पहुँचने दो।

मजेदार विडंबना है। चारों तरफ पहाड़ इतने विराट कि उनके सामने आदमी खुद को चींटी समझे, लेकिन शहर का रोजमर्रा का जीवन बेहद संयमित और सलीकेदार।

आल्प्स तमाशा दिखाते हैं, ट्रामें व्यवस्था संभालती हैं।

शाम ढलते-ढलते तापमान अचानक गिर गया। पारा 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे पहुँच गया और ठंडी हवा ने दिनभर की थकान को कुछ और मुखर कर दिया।

बस हमें होटल से कुछ दूरी पर उतार गई। आगे था खड़ी चढ़ाई वाला रास्ता। दिनभर घूमने के बाद अब पैरों को लगा कि पर्यटन विभाग ने हमारे लिए एक अतिरिक्त परीक्षा रख छोड़ी है।

चढ़ाई कठिन थी। पैर जवाब देने लगे। सामान का वजन अचानक दोगुना महसूस होने लगा। यहाँ तक कि हैंडबैग भी ऐसे लगने लगे जैसे उनमें कपड़ों की जगह ईंटें भर दी गई हों।

हमारा होटल पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक पुराने किले में बना था, जिसे बड़े सलीके से आरामदेह आवास में तब्दील किया गया था। इमारत में इतिहास की वह खास आभा अब भी मौजूद थी, जो पुराने यूरोपीय भवनों में अक्सर दिखाई देती है।

लेकिन वहाँ तक पहुँचना अपने आप में एक अभियान था।

कुछ देर पहले तक हम पर्यटक थे, जो किले की रोमांटिक खूबसूरती निहार रहे थे। अब हम थके हुए यात्री थे, जो पहाड़ी रास्ते पर अपने पैरों और सामान के बीच समझौता कराने में जुटे थे।

प्रवेश द्वार के पास रखा एक पुराना-सा खिलौना रेल इंजन मेरी नजर में आया। किले के गंभीर माहौल में वह कुछ बेमेल-सा लगा।

पद्मिनी की भी अपनी राय थी। उन्हें लगा कि यह ट्रेन किसी दूसरी कहानी से उठाकर यहाँ रख दी गई है।

शायद होटल हमें संदेश दे रहा था—इतिहास आँखों के लिए है और खिलौना ट्रेन कल्पना के लिए।

लेकिन असली जलवा तो रात में सामने आया।

हमने गुंडोल्फ परिवार के साथ लगभग डेढ़ घंटे का यादगार कार्यक्रम देखा, जिसे टायरोलर आबेंड (Tiroler Abend) कहा जाता है। यह पारंपरिक टायरोलियन सांस्कृतिक कार्यक्रम इन्सब्रुक में 1967 से प्रस्तुत किया जा रहा है। वर्षों से गुंडोल्फ परिवार इस क्षेत्र के संगीत, नृत्य और लोक परंपराओं का प्रतिनिधि बना हुआ है।

यह कोई औपचारिक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, जहाँ कलाकार मुस्कराएँ, दर्शक शिष्टाचारवश तालियाँ बजाएँ और सब अपने-अपने घर चले जाएँ।

यह था जोश, रंग, संगीत और मस्ती से भरा टायरोल का उत्सव!

कलाकार पारंपरिक पोशाकों में मंच पर आए। पुरुषों ने सफेद कमीजें, कढ़ाईदार वेस्टकोट और चमड़े की निकर पहन रखी थीं। महिलाओं के चमकीले, रंग-बिरंगे परिधान ऐसे लग रहे थे, जैसे पहाड़ी घास के मैदानों के सारे रंग कपड़ों में समा गए हों।

फिर संगीत शुरू हुआ।

हार्प की मधुर धुन, अकॉर्डियन, पीतल के बाजे और लोकगीतों की लय ने वातावरण को जीवंत कर दिया। शुरुआत में संगीत इतना कोमल था कि लगा, कोई शांत पहाड़ी चरागाह से गीत हवा में बहाकर ला रहा है।

लेकिन कुछ ही पलों में माहौल बदल गया।

पीतल के बाजे गरजे। पैर थिरकने लगे। आवाजें ऊँची हुईं। कलाकारों ने इतनी ऊर्जा से नृत्य किया कि मंच देखते-देखते रंगमंच से व्यायामशाला में तब्दील होता दिखाई देने लगा।

योडलिंग की आवाजें गूँजीं और फिर शुरू हुआ मशहूर जूते थपथपाने वाला नृत्य। हाथ, पैर और शरीर की गति में ऐसा तालमेल था कि दर्शक तय ही नहीं कर पा रहे थे कि इसे नृत्य कहें, करतब कहें या सामूहिक कसरत!

कलाकार अपने जूतों और पैरों पर जिस फुर्ती से थपकी दे रहे थे, उसे देखकर लगा कि शायद उन्होंने किसी पेशेवर तबला वादक से प्रशिक्षण लिया है।

वे नाच रहे थे। हम देख रहे थे। और हमारे घुटने इस व्यवस्था से बेहद खुश थे!

हॉल में बीयर, ठहाकों और संगीत की गूँज थी। माहौल में ऐसी गर्मजोशी थी कि बाहर की कड़कड़ाती ठंड कुछ देर के लिए याद ही नहीं रही।

कार्यक्रम को समझने के लिए किसी अनुवादक की जरूरत नहीं पड़ी। संगीत ने भाषा की दीवार पार कर ली। रंगीन पोशाकों ने अपनी कहानी खुद सुनाई। लय ने उत्साह पहुँचा दिया और कलाकारों की मुस्कान ने बाकी काम पूरा कर दिया।

कार्यक्रम के संचालक और गुंडोल्फ परिवार के नेता मार्टिन ने अपने अंदाज में हास्य और चुटीलेपन का तड़का लगाया। उनकी प्रस्तुति में जानकारी भी थी, मस्ती भी और दर्शकों को बाँधे रखने का हुनर भी।

इस कार्यक्रम ने हमें केवल टायरोल की परंपराओं की झलक नहीं दिखाई। उसने यह भी बताया कि सांस्कृतिक विरासत तब ज्यादा जिंदा रहती है, जब उसे प्यार, ऊर्जा और थोड़ी शरारत के साथ प्रस्तुत किया जाए।

परंपरा को हमेशा गंभीर चेहरा बनाकर कुर्सी पर बैठने की जरूरत नहीं। कभी-कभी उसे जूते थपथपाने, पैर पटकने और दर्शकों को हँसाने की भी इजाजत होनी चाहिए।

गुंडोल्फ परिवार ने यह बात बखूबी समझ रखी है।

### इन्सब्रुक: एक शहर, जिसकी अपनी रवानी है

हमारी छोटी-सी यात्रा समाप्त हुई, लेकिन इन्सब्रुक कई खूबसूरत यादें छोड़ गया।

नदी ने सुकून दिया। पहाड़ों ने विस्मय जगाया। पुराने चौकों ने इतिहास की झलक दिखाई। ट्रामों ने भरोसा दिलाया कि आल्प्स के बीच भी बसें वक्त की पाबंद हो सकती हैं।

और गुंडोल्फ परिवार की शाम ने इस यात्रा को एक यादगार संगीत दे दिया।

इन्सब्रुक में प्रकृति की बेतहाशा खूबसूरती, शहर की अनुशासित व्यवस्था, ऐतिहासिक आकर्षण और लोक संस्कृति की गर्मजोशी एक साथ दिखाई देती है। नदी अपनी धुन में बहती रही। पहाड़ अपनी बुलंदी पर अडिग रहे। ट्रामें अपने वक्त पर चलती रहीं। और लोक कलाकारों ने याद दिलाया कि जिंदगी केवल देखने के लिए नहीं, जश्न मनाने के लिए भी है।

हम पहाड़ों और शहर को देखने आए थे।

लौटे तो लोकगीतों की धुनें कानों में थीं, टायरोलियन पोशाकों के रंग आँखों में बसे थे और मन में एक खुशनुमा एहसास था।

एक शाम के लिए आल्प्स अपनी ऊँचाइयों से नीचे उतरे, नाचने वाले जूते पहने और हम सबके साथ खुशी बाँटने लगे।

और अगर पहाड़ नाच सकते हैं, तो शायद दुनिया को हमेशा इतना गंभीर होकर जीने की जरूरत नहीं।

कभी नदी की रवानी सुनिए, कभी पहाड़ों की खामोशी। और मौका मिले तो टायरोलियन संगीत पर थोड़ा ठुमक भी लीजिये, आखिर जिंदगी का असली मजा सिर्फ मंजिल में नहीं, उसकी मस्ती भरी राह में भी है!

SP_Singh AURGURU Editor