2027 की सियासी बिसात बिछाने ब्रज आ रहे जयंत चौधरी, आगरा में रालोद को पुराने दबदबे की तलाश
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राष्ट्रीय लोकदल 12 अक्टूबर को फतेहपुर सीकरी के जैंगारा गांव में जयंत चौधरी की मौजूदगी में स्वाभिमान सभा आयोजित कर रहा है। पार्टी आगरा समेत ब्रज और आसपास के जिलों से भीड़ जुटाने में लगी है। 2002 में आगरा की दो सीटें जीतने वाला रालोद 2022 में फतेहपुर सीकरी में 64,826 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहा था। अब पार्टी के सामने अपने पुराने जनाधार को मजबूत करने और उसे चुनावी जीत में बदलने की चुनौती है।
12 अक्टूबर को जैंगारा में स्वाभिमान सभा से शक्ति प्रदर्शन की तैयारी, 2002 में दो सीटें जीतने वाली पार्टी 2022 में फतेहपुर सीकरी में दूसरे स्थान पर रही थी, अब जनाधार को जीत में बदलने की चुनौती
आगरा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ब्रज की राजनीति में हलचल तेज होने लगी है। सभी राजनीतिक दल अपने जनाधार को मजबूत करने और चुनावी समीकरण साधने में जुटे हैं। इसी कड़ी में राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) भी ब्रज में अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन करने की तैयारी में है। 12 अक्टूबर को फतेहपुर सीकरी विधानसभा क्षेत्र के जैंगारा गांव में आयोजित होने वाली ‘स्वाभिमान सभा’ को पार्टी की इसी रणनीति के अहम हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। रालोद अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी सभा को संबोधित करेंगे। जैंगारा की स्वाभिमान सभा रालोद के लिए शक्ति प्रदर्शन के साथ-साथ अपने पुराने राजनीतिक आधार को परखने का अवसर भी है। 2027 में आगरा की विधानसभा राजनीति में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए पार्टी को सभा की भीड़ को संगठन की मजबूती और चुनावी समर्थन में बदलना होगा।
इस आयोजन का मकसद केवल भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि ब्रज में रालोद के परंपरागत जनाधार को फिर से सक्रिय करना और आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक मौजूदगी का संदेश देना भी है। पार्टी आगरा के साथ मथुरा, हाथरस, फिरोजाबाद, अलीगढ़ और राजस्थान के भरतपुर क्षेत्र से भी लोगों को जुटाने की तैयारी कर रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलाध्यक्षों और पदाधिकारियों को सभा की सफलता की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता मनवीर चिकारा के साथ ही स्थानीय टीम तैयारियों में जुटी है। रालोद कार्यकर्ता गांव-गांव और घर-घर पहुंचकर लोगों से सभा में शामिल होने की अपील कर रहे हैं। अब इस आयोजन के जरिए पार्टी कितनी बड़ी भीड़ जुटा पाती है और उसका राजनीतिक संदेश कितना प्रभावी रहता है, इस पर सबकी निगाहें रहेंगी।
2027 की तैयारी या पुराने जनाधार की वापसी की कोशिश?
रालोद की राजनीति का पारंपरिक केंद्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश और ब्रज का ग्रामीण क्षेत्र रहा है। किसान, ग्रामीण मतदाता और जाट बहुल इलाकों में पार्टी का प्रभाव उसकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। आगरा जिले में भी रालोद ने अतीत में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। हालांकि, विधानसभा चुनावों में लगातार सीटें जीतने में नाकाम रहने के कारण पार्टी के सामने अपने पुराने प्रभाव को दोबारा स्थापित करने की चुनौती है। जैंगारा की स्वाभिमान सभा को इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। जयंत चौधरी की मौजूदगी के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने, स्थानीय नेताओं को सक्रिय करने और ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास करेगी। आगरा जिले की फतेहपुर सीकरी, खेरागढ़ और आगरा ग्रामीण जैसी सीटें रालोद की रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण रही हैं। पार्टी की कोशिश इन क्षेत्रों में अपने पुराने समर्थकों को फिर से एकजुट करने और नए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की होगी।
जयंत के सामने विरासत बचाने की चुनौती
आगरा में रालोद की राजनीतिक जमीन मजबूत करने में पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके नेतृत्व में पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई और कुछ विधानसभा सीटों पर निर्णायक प्रभाव भी स्थापित किया। चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद जयंत चौधरी पार्टी का नेतृत्व संभाल रहे हैं। जयंत का ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ाव रालोद के लिए अहम माना जाता है। अब उनके सामने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के साथ-साथ बदलते चुनावी समीकरणों में पार्टी की प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती भी है। जैंगारा की सभा इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि इसके जरिए पार्टी नेतृत्व स्थानीय संगठन की सक्रियता और अपने समर्थक वर्ग की एकजुटता का आकलन कर सकेगा।
2002 में दो सीटें जीतकर रालोद ने दर्ज की थी बड़ी कामयाबी
आगरा जिले में रालोद का सबसे उल्लेखनीय विधानसभा प्रदर्शन वर्ष 2002 में रहा था। उस चुनाव में पार्टी ने जिन दो सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, दोनों पर जीत दर्ज की। एत्मादपुर विधानसभा सीट से गंगा प्रसाद पुष्कर ने 38,317 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। उनकी जीत का अंतर 4,814 वोट रहा। वहीं, फतेहपुर सीकरी सीट से चौधरी बाबूलाल ने 50,073 वोट प्राप्त किए और 19,103 वोटों के अंतर से विजयी हुए। इन नतीजों ने उस समय आगरा जिले में रालोद की मजबूत राजनीतिक पकड़ का संकेत दिया था। दो सीटों पर चुनाव लड़कर दोनों जीतना पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद हालांकि पार्टी इस प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी।
2007 से 2022 तक जीत का इंतजार, फतेहपुर सीकरी बनी उम्मीद
2002 की सफलता के बाद आगरा में रालोद के लिए विधानसभा चुनावों का सफर चुनौतीपूर्ण रहा। पार्टी चुनावी मैदान में बनी रही, लेकिन 2007 से 2022 तक जिले में कोई विधानसभा सीट नहीं जीत सकी। इसके बावजूद फतेहपुर सीकरी सीट रालोद के लिए संभावनाओं वाला क्षेत्र बनी रही। उपलब्ध चुनावी आंकड़े बताते हैं कि यहां पार्टी का प्रदर्शन लगातार चर्चा में रहा। वर्ष 2002 में जीत के बाद 2007, 2012 और 2017 के चुनावों में पार्टी तीसरे स्थान पर रही, जबकि 2022 में उसने दूसरा स्थान हासिल किया। इस क्रम से स्पष्ट है कि फतेहपुर सीकरी में रालोद अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने में सफल रही है, हालांकि उसे जीत में बदलना अब भी बड़ी चुनौती है।
2022 में फतेहपुर सीकरी और आगरा ग्रामीण में भी मजबूत प्रदर्शन
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था। आगरा जिले में गठबंधन के तहत पार्टी को तीन सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर मिला। फतेहपुर सीकरी में रालोद प्रत्याशी बृजेश कुमार को 64,826 वोट मिले थे। वे 26.87 प्रतिशत मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहे। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वे भाजपा प्रत्याशी से 47,269 वोट पीछे रहे और बसपा प्रत्याशी को पीछे छोड़ने में सफल रहे। आगरा ग्रामीण पर रालोद प्रत्याशी महेश कुमार को 52,731 वोट मिले थे। उन्हें 20.30 प्रतिशत मत प्राप्त हुए और वे तीसरे स्थान पर रहे थे। खेरागढ़ सीट पर रालोद प्रत्याशी रोहतन को 14,133 वोट मिले थे और वे चौथे स्थान पर रहे। इन परिणामों से पता चलता है कि 2022 में फतेहपुर सीकरी और आगरा ग्रामीण में रालोद का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा। हालांकि, गठबंधन के तहत मिले वोटों को पूरी तरह रालोद का स्वतंत्र जनाधार मानना उचित नहीं होगा। आगामी चुनाव में पार्टी की वास्तविक ताकत इस बात से भी तय होगी कि गठबंधन की परिस्थितियों से अलग उसका अपना संगठन और मतदाता आधार कितना मजबूत है।
गठबंधन की राजनीति भी तय करेगी रालोद की राह
आगरा में रालोद की आगामी रणनीति केवल जनसभाओं और संगठन विस्तार तक सीमित नहीं रहने वाली। विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन का स्वरूप, सीटों का बंटवारा और स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों की स्वीकार्यता भी पार्टी की संभावनाओं को प्रभावित करेगी। 2022 में सपा के साथ गठबंधन ने रालोद को कुछ सीटों पर प्रतिस्पर्धी स्थिति में पहुंचाया था। अब 2027 से पहले पार्टी के सामने यह सवाल अहम रहेगा कि वह गठबंधन की राजनीति के सहारे आगे बढ़ेगी या अपने स्वतंत्र जनाधार को और विस्तार देने पर जोर देगी। जयंत चौधरी की स्वाभिमान सभा को इस दिशा में एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, सभा के बाद पार्टी की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
भीड़ से आगे संगठन और वोट में बदलाव की होगी असली परीक्षा
राजनीतिक सभाओं में जुटने वाली भीड़ किसी पार्टी की सक्रियता और समर्थकों के उत्साह का संकेत दे सकती है, लेकिन चुनावी सफलता के लिए इसे वोटों में बदलना जरूरी होता है। रालोद के लिए भी जैंगारा की सभा की असली अहमियत इस बात में होगी कि इसके बाद गांवों और बूथ स्तर पर संगठन कितना सक्रिय रहता है। पार्टी के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां होंगी—परंपरागत समर्थकों को दोबारा एकजुट करना, युवाओं और नए मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाना तथा स्थानीय स्तर पर मजबूत चुनावी संगठन तैयार करना।
2002 की दो सीटों की जीत से लेकर 2022 में फतेहपुर सीकरी में दूसरे स्थान तक का सफर रालोद की संभावनाओं और सीमाओं, दोनों को सामने रखता है। अब 12 अक्टूबर की स्वाभिमान सभा के जरिए जयंत चौधरी ब्रज में पार्टी को कितना राजनीतिक संबल दे पाते हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।