कांग्रेस में कुर्सी बदली, मुश्किलें बरकरार! मोना के सामने संगठन को संभालने से लेकर अखिलेश से तालमेल तक की चुनौती

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी को नई दिशा देने की कोशिश की है, लेकिन उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। एक तरफ कांग्रेस को प्रदेश में अपने संगठन की खोई ताकत वापस हासिल करनी है, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी भी बढ़ानी है। इन दोनों मोर्चों के बीच सबसे बड़ी मुश्किल पार्टी के भीतर की गुटबाजी है, जिसने मोना के पदभार ग्रहण करने से पहले ही कांग्रेस मुख्यालय में हंगामे के रूप में सिर उठा दिया।

Oct 12, 2026 - 07:00
 0
कांग्रेस में कुर्सी बदली, मुश्किलें बरकरार! मोना के सामने संगठन को संभालने से लेकर अखिलेश से तालमेल तक की चुनौती

गुटबाजी पर लगाम, नेताओं को साथ लेकर चलना

मोना के सामने सबसे पहली परीक्षा कांग्रेस के भीतर अलग-अलग गुटों को एक साथ लाने की होगी। प्रदेश अध्यक्ष बदलने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अजय राय के नेतृत्व में सक्रिय रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं को नई व्यवस्था में कितनी जगह मिलती है। राय पिछले करीब तीन वर्षों से प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन के बाद उनके समर्थकों की राजनीतिक भूमिका और नई प्रदेश अध्यक्ष के साथ उनका तालमेल पार्टी की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

11 अक्टूबर को प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पदभार ग्रहण समारोह के दौरान हुआ विवाद इस चुनौती की गंभीरता बताने के लिए पर्याप्त है। अजय राय के समर्थकों और ममता चौधरी के समर्थकों के बीच कहासुनी के बाद धक्का-मुक्की और जूते चलने तक की नौबत आ गई। महिला कार्यकर्ताओं के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर भी आरोप लगाए गए। विवाद के बाद अजय राय नाराज होकर कार्यालय से बाहर चले गए। वरिष्ठ नेताओं को हस्तक्षेप कर स्थिति संभालनी पड़ी और अंततः पदभार ग्रहण की औपचारिकता पूरी हुई।

यह घटनाक्रम प्रदेश अध्यक्ष मोना के लिए महज एक दिन का विवाद नहीं, बल्कि संगठन के भीतर मौजूद तनाव को दूर करने की पहली बड़ी कसौटी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदेश अध्यक्ष बदलने का अर्थ किसी एक गुट का वर्चस्व स्थापित करना और दूसरे को हाशिये पर धकेलना न बन जाए। साथ ही, अनुशासनहीनता और आपसी टकराव पर कार्रवाई का ऐसा संदेश देना होगा, जिससे संगठन में जवाबदेही कायम हो और किसी पक्ष को राजनीतिक संरक्षण मिलने का आरोप लगाने का अवसर न मिले।

कांग्रेस को गठबंधन की पिछलग्गू पार्टी बनने से बचाने की चुनौती

कांग्रेस के सामने दूसरी बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल बनाए रखते हुए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में छह सीटों पर जीत मिली थी। इस प्रदर्शन ने पार्टी में नई उम्मीद जगाई और उसे विधानसभा चुनाव में भी गठबंधन से बेहतर परिणाम की संभावना दिखाई देने लगी। लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों को विधानसभा चुनाव में दोहराना आसान नहीं होगा।

सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों की अपेक्षाएं अलग-अलग हो सकती हैं। कांग्रेस अपने बेहतर प्रदर्शन के आधार पर गठबंधन में अधिक सीटें और सम्मानजनक राजनीतिक हिस्सेदारी चाह सकती है, जबकि सपा अपने संगठन और प्रदेश में व्यापक राजनीतिक आधार के अनुरूप सीटों पर दावा करेगी। ऐसे में मोना को दोहरी भूमिका निभानी होगी। उन्हें एक ओर सपा के साथ संवाद और समन्वय बनाए रखना होगा, दूसरी ओर अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि कांग्रेस केवल गठबंधन के सहारे चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं है।

सीटों की संख्या से आगे बढ़कर यह भी तय करना होगा कि कांग्रेस किन क्षेत्रों में अपने दम पर चुनावी मुकाबले की स्थिति में है और कहां सपा के संगठन का सहारा उसके लिए अधिक उपयोगी होगा। गठबंधन में अधिक सीटें हासिल करना तभी सार्थक होगा, जब कांग्रेस के पास उन सीटों पर मजबूत उम्मीदवार, सक्रिय संगठन और जीतने की व्यावहारिक संभावना भी हो।

इमरान मसूद के साथ संतुलन और पश्चिमी यूपी में विस्तार

प्रदेश संगठन में इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से कांग्रेस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने का संकेत दिया है। मोना और मसूद की जिम्मेदारियां भले अलग हों, लेकिन दोनों के बीच बेहतर तालमेल नई टीम की सफलता के लिए जरूरी होगा। मोना के सामने यह सुनिश्चित करने की चुनौती होगी कि प्रदेश संगठन में जिम्मेदारियों का बंटवारा स्पष्ट रहे और अलग-अलग नेताओं के प्रभाव क्षेत्र आपसी प्रतिस्पर्धा का कारण न बनें।

मसूद की सपा के साथ पहले हुई राजनीतिक बयानबाजी भी गठबंधन के स्तर पर संवेदनशील विषय बन सकती है। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व को पार्टी के भीतर और गठबंधन के सहयोगी दल के साथ संवाद की दोहरी प्रक्रिया चलानी होगी। यदि प्रदेश स्तर पर दिए जाने वाले राजनीतिक संदेशों में एकरूपता नहीं रही, तो उसका असर सीटों के बंटवारे और चुनावी तालमेल पर पड़ सकता है।

कांग्रेस की खोई जमीन वापस हासिल करना

उत्तर प्रदेश में कभी सत्ता की प्रमुख दावेदार रही कांग्रेस लंबे समय से अपने कमजोर होते संगठन और सीमित चुनावी प्रभाव से जूझ रही है। पार्टी के पास फिलहाल विधानसभा में केवल दो विधायक हैं। ऐसे में मोना के लिए प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी संभालना केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं, बल्कि कांग्रेस को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाने की जिम्मेदारी भी है।

उन्हें जिला, शहर, ब्लॉक और बूथ स्तर तक संगठन की सक्रियता बढ़ानी होगी। जिन क्षेत्रों में कांग्रेस का पुराना जनाधार रहा है, वहां कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करना होगा। नए सामाजिक समूहों और युवाओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने के साथ स्थानीय मुद्दों पर लगातार संघर्ष भी करना होगा। केवल बड़े नेताओं की सभाओं और चुनाव के समय होने वाली सक्रियता से संगठन मजबूत नहीं होगा।

कांग्रेस के सामने एक और सवाल है कि वह भाजपा के खिलाफ अपनी अलग राजनीतिक पहचान किस तरह स्थापित करेगी। इसके लिए संगठन में नियमित सक्रियता और स्पष्ट राजनीतिक रणनीति की जरूरत होगी।

जातीय और सामाजिक समीकरणों में अपनी जगह बनानी होगी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मोना को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने ब्राह्मण नेतृत्व को आगे किया है, जबकि इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर मुस्लिम नेतृत्व को भी प्रमुख भूमिका दी गई है। पार्टी के सामने इन नियुक्तियों को व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व में बदलने की चुनौती होगी।

केवल प्रमुख पदों पर अलग-अलग सामाजिक समूहों के नेताओं को बैठा देना पर्याप्त नहीं होगा। जिला और क्षेत्रीय स्तर पर भी प्रतिनिधित्व, नेतृत्व के अवसर और चुनावी टिकटों के वितरण में संतुलन बनाना होगा। कांग्रेस को यह भी तय करना होगा कि वह सपा के पारंपरिक सामाजिक आधार के बीच अपनी अलग जगह कैसे बनाएगी और उन वर्गों तक कैसे पहुंचेगी, जिनमें भाजपा या अन्य दलों का प्रभाव है।

मोना के सामने यह चुनौती इसलिए भी अहम है, क्योंकि गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस को अपने सहयोगी दल के मजबूत सामाजिक आधार पर निर्भर रहने और अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने के बीच संतुलन कायम करना होगा।

कम समय में चुनावी तैयारी और भरोसे की बहाली

2027 के विधानसभा चुनाव में अब बहुत अधिक समय नहीं बचा है। ऐसे में नई प्रदेश अध्यक्ष को संगठनात्मक बदलाव, संभावित उम्मीदवारों की पहचान, क्षेत्रवार चुनावी रणनीति और गठबंधन वार्ता जैसे काम समानांतर रूप से करने होंगे। पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन से पैदा हुई असमंजस की स्थिति को जल्दी समाप्त करना भी जरूरी होगा। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, नेताओं के बीच विश्वास बहाल करना और मतदाताओं के बीच पार्टी के प्रति उम्मीद जगाना भी उनके लिए बड़ी चुनौती है।

SP_Singh AURGURU Editor