रिश्तों का तनाव मन पर डाल रहा असर, मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें

आगरा के सिकंदरा-बोदला रोड स्थित फीलिंग माइंड्स संस्था में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया। संस्था की निदेशक डॉ. चिनू अग्रवाल ने कहा कि मानसिक तनाव, अवसाद, बेचैनी और पारिवारिक विवादों को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने रिश्तों में संवाद की कमी, भावनात्मक दूरी और पारिवारिक संघर्षों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में महिलाओं की भावनात्मक जरूरतों को समझने, दंपती परामर्श को बढ़ावा देने और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े भ्रम दूर करने की आवश्यकता भी बताई गई। संगोष्ठी का संदेश रहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान प्रभावित लोगों की आवाज सुनकर और उन्हें साथ लेकर किया जाना चाहिए।

Oct 10, 2026 - 16:22
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रिश्तों का तनाव मन पर डाल रहा असर, मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर फीलिंग माइंड्स में आयोजित संगोष्ठी में विचार व्यक्त करतीं डॉ. चिनू अग्रवाल।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर फीलिंग माइंड्स में संगोष्ठी, पारिवारिक तनाव और रिश्तों में टकराव को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़कर समझने पर जोर

आगरा। मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी व्यक्ति को भीतर ही भीतर तोड़ सकती है। कई लोग वर्षों तक मानसिक तनाव, अवसाद, बेचैनी और पारिवारिक संघर्षों से जूझते रहते हैं, लेकिन अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाते। उनकी नींद, भूख और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है, फिर भी वे अपनी मानसिक स्थिति के बारे में खुलकर बात करने से बचते हैं। मानसिक स्वास्थ्य को लेकर यही चुप्पी समस्या को गंभीर बना देती है। जरूरत इस बात की है कि मानसिक परेशानियों को कमजोरी या शर्म का विषय मानने के बजाय उन्हें समझा जाए और समय रहते विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाए।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 के अवसर पर शनिवार को विमल विहार, सिकंदरा-बोदला रोड स्थित फीलिंग माइंड्स संस्था के कार्यालय आयोजित संगोष्ठी में मनोवैज्ञानिक एवं मनोचिकित्सक डॉ. चिनू अग्रवाल ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए लोगों से अपनी मानसिक परेशानियां साझा करने की अपील की।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. प्रतीक अग्रवाल उपस्थित रहे।

डॉ. चिनू अग्रवाल, निदेशक, फीलिंग माइंड्स तथा अध्यक्ष, आईएसएमएचएए (अंतरराष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य पक्षसमर्थन एवं कार्रवाई संस्था) ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करने की कीमत व्यक्ति के साथ-साथ उसके पूरे परिवार को चुकानी पड़ती है। मानसिक परेशानी से गुजर रहे व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव, नींद और भूख में कमी, बेचैनी, चिड़चिड़ापन तथा निरंतर उदासी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसके बावजूद कई बार परिवार और आसपास के लोग उसकी स्थिति को समझ नहीं पाते। ऐसे में व्यक्ति अकेले ही संघर्ष करता रहता है और उसकी समस्या समय के साथ अधिक गंभीर हो सकती है।

डॉ. चिनू अग्रवाल ने कहा कि उनके अनुसार 30 प्रतिशत से अधिक आत्महत्याओं के पीछे पारिवारिक संबंधों से जुड़ी समस्याएं होती हैं। रिश्तों में तनाव, आपसी मतभेद, संवाद की कमी और लंबे समय तक चलने वाले पारिवारिक विवाद व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार लोग अपने संबंधों में चल रहे संघर्ष को वर्षों तक सहते रहते हैं, लेकिन किसी से मदद नहीं मांगते। ऐसी परिस्थितियों में समय रहते संवाद और मनोवैज्ञानिक परामर्श की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

उन्होंने बताया कि सकारात्मक बदलाव यह है कि अब धीरे-धीरे लोगों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। पारिवारिक विवादों को सुलझाने और आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए लोग मनोवैज्ञानिकों के पास पहुंच रहे हैं। पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी, बार-बार होने वाले विवाद और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याओं के समाधान के लिए दंपती परामर्श लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है।

कार्यक्रम में मन के मानसिक संघर्ष को स्वीकार करने और परिवार में उसकी भावनात्मक स्थिति को समझने पर भी जोर दिया गया। डॉ. चिनू अग्रवाल ने कहा कि परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए महिलाएं कई बार अपनी भावनाओं, इच्छाओं और परेशानियों को पीछे रख देती हैं। घर, बच्चों, रिश्तों और अन्य जिम्मेदारियों के बीच उनका अपना मानसिक संघर्ष अनदेखा रह जाता है। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि समाज में मन और मस्तिष्क से जुड़ी समस्याओं को लेकर आज भी अनेक भ्रम हैं। लोग मनोचिकित्सा और मनोवैज्ञानिक परामर्श के बीच के अंतर को ठीक से नहीं समझते, जिसके कारण कई बार वे सही समय पर उचित सहायता नहीं ले पाते।

कार्यक्रम का केंद्रीय विषय “प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले लोगों को केंद्र में लाना” रहा, जिसका आशय मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का प्रत्यक्ष अनुभव रखने वाले लोगों की आवाज को केंद्र में लाना है। कार्यक्रम का प्रमुख संदेश “केवल उनके लिए नहीं, बल्कि उनके साथ मिलकर निर्माण करना” रहा।