सुप्रीम कोर्ट की यमुना पुनर्जीवन पहल का रिवर कनेक्ट अभियान ने किया स्वागत, अब कागजी नहीं कठोर कार्रवाई का समय, पूरी नदी प्रणाली को बचाने की निर्णायक घड़ी
आगरा। यमुना नदी के पुनर्जीवन और सफाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए ताजा कदम का रिवर कनेक्ट कैंपेन ने जोरदार स्वागत किया है। संस्था से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने इस निर्णय को लंबे समय से निष्क्रिय पड़े प्रशासनिक तंत्र के लिए चेतावनी और दिशा-निर्देश दोनों बताया है।
रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक बृज खंडेलवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार के गृह सचिव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति का गठन एक ऐतिहासिक और आवश्यक कदम है। उन्होंने कहा कि अदालत द्वारा यमुना को सीवेज नाले में बदल चुकी नदी कहना देश की पर्यावरणीय व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर करता है।
रिवर कनेक्ट कैंपेन की ओर से कहा गया कि यमुना केवल एक नदी नहीं बल्कि उत्तर भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक जीवनरेखा है, जो हिमालय से निकलकर दिल्ली, आगरा, मथुरा और प्रयागराज तक करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती है। लेकिन आज यह नदी औद्योगिक प्रदूषण, सीवर, रासायनिक कचरे और अतिक्रमणों के कारण अत्यंत संकटपूर्ण स्थिति में पहुंच चुकी है।
संस्था ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का भी समर्थन किया जिसमें विभिन्न विभागों को अलग-अलग खेमों में काम करने वाला बताया गया। रिवर कनेक्ट कैंपेन के अनुसार नगर निगम, जल संस्थान, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, सिंचाई विभाग और विकास प्राधिकरण वर्षों से समन्वय के अभाव में जिम्मेदारी टालते रहे, जिसके कारण नदी की स्थिति लगातार बिगड़ती गई।
संस्था ने स्पष्ट किया कि अब केवल योजनाओं और बैठकों से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर कठोर कार्रवाई जरूरी है। इसमें बाढ़ क्षेत्र और नदी किनारे से अतिक्रमण हटाना, अवैध उद्योगों पर रोक, बिना शोधन के गिर रहे सीवर को बंद करना और जल प्रवाह को सुनिश्चित करना प्रमुख कदम होने चाहिए।
रिवर कनेक्ट कैंपेन ने यह भी मांग की कि प्रस्तावित यमुना एक्शन प्लान को केवल दिल्ली तक सीमित न रखकर हिमालय से प्रयागराज तक पूरे यमुना बेसिन पर लागू किया जाए। विशेष रूप से आगरा और मथुरा क्षेत्र में घटते जलस्तर, प्रदूषण और रेत खनन जैसी समस्याओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
संस्था का कहना है कि इस पूरे अभियान की सफलता केवल सरकारी प्रयासों पर निर्भर नहीं हो सकती, बल्कि इसमें जनभागीदारी को केंद्र में रखना होगा। संत समाज, वैज्ञानिक, पर्यावरणविद, किसान, युवा और स्थानीय नागरिकों की सक्रिय भागीदारी के बिना यमुना का पुनर्जीवन संभव नहीं है।
अंत में संस्था ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तैयार होने वाली यह कार्ययोजना यमुना को पुनः निर्मल और अविरल बनाने की दिशा में निर्णायक सिद्ध होगी और आने वाली पीढ़ियों को एक जीवित नदी का उपहार देगी।