सुप्रीम कोर्ट का सवाल- कैंसर की दवाओं पर ही राहत क्यों, दूसरी दवाओं और मेडिकल उपकरणों पर मनमानी कीमतों का क्या?, न्यायमूर्ति संदीप मेहता बोले- देश की जनता के लिए इस मामले से अधिक महत्वपूर्ण कोई मामला नहीं हो सकता, 5,000 रुपये के स्टेंट की 25,000 रुपये एमआरपी और सलाइन ड्रिप लाइन की कीमतों के अंतर पर भी उठाए सवाल

नई दिल्ली-आगरा। दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में भारी अंतर तथा अत्यधिक व्यापारिक मुनाफे का मुद्दा सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में प्रमुखता से उठा। कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत तक सीमित करने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल किया कि जब दूसरी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों में भी अत्यधिक मुनाफे की समस्या है, तो राहत केवल कैंसर की दवाओं तक ही क्यों सीमित रखी जा रही है।

Oct 12, 2026 - 21:04
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सुप्रीम कोर्ट का सवाल- कैंसर की दवाओं पर ही राहत क्यों, दूसरी दवाओं और मेडिकल उपकरणों पर मनमानी कीमतों का क्या?, न्यायमूर्ति संदीप मेहता बोले- देश की जनता के लिए इस मामले से अधिक महत्वपूर्ण कोई मामला नहीं हो सकता, 5,000 रुपये के स्टेंट की 25,000 रुपये एमआरपी और सलाइन ड्रिप लाइन की कीमतों के अंतर पर भी उठाए सवाल

न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने मामले के व्यापक जनहित को रेखांकित करते हुए कहा, देश की जनता के लिए इस मामले से अधिक महत्वपूर्ण कोई मामला नहीं हो सकता। आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर हुई सुनवाई में अदालत ने स्टेंट और सलाइन ड्रिप लाइन की कीमतों में बड़े अंतर का उदाहरण देते हुए मरीजों को किफायती इलाज उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी मूल्य नियंत्रण की जरूरत पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष ये जनहित याचिकाएं विचाराधीन हैं। इनमें दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों, जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता तथा मरीजों को उचित और किफायती दरों पर उपचार उपलब्ध कराने से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। याचिकाओं के माध्यम से दवा और चिकित्सा उपकरण बाजार में कीमतों के निर्धारण तथा मरीजों से वसूली जाने वाली रकम पर नियंत्रण की आवश्यकता को सामने रखा गया है।

कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत मार्जिन तय करने का फैसला

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से बताया कि कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी के 30 प्रतिशत तक सीमित करने का निर्णय लिया गया है। इस व्यवस्था के दायरे में आने वाली दवाओं की सूची जारी की जाएगी और जरूरत के अनुसार समय-समय पर उसमें नई दवाएं भी शामिल की जाएंगी।

हालांकि, अदालत ने इस कदम के दायरे को लेकर सवाल उठाया। पीठ का प्रश्न था कि जब अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन की समस्या केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है और दूसरी दवाओं तथा चिकित्सा उपकरणों में भी कीमतों का बड़ा अंतर सामने आता है, तो व्यापक स्तर पर नियंत्रण के उपाय क्यों नहीं किए जा रहे हैं। अदालत की इस टिप्पणी ने दवा मूल्य निर्धारण की मौजूदा व्यवस्था और उसके दायरे पर बहस को फिर केंद्र में ला दिया है।

दवाओं की कीमतों में 20 से 70 प्रतिशत तक कमी का अनुमान

केंद्र सरकार के औषध विभाग के हलफनामे के अनुसार, कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन सीमित करने का निर्णय राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की 8 अक्टूबर को हुई बैठक में लिया गया। सरकार का अनुमान है कि प्रस्तावित व्यवस्था से संबंधित दवाओं की एमआरपी में 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इससे मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की संभावना जताई गई है।

इन दवाओं की पहचान और सूची तैयार करने के लिए स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित की गई है। समिति को 10 से 15 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशें देनी हैं। इसके बाद यह स्पष्ट होगा कि किन दवाओं को इस व्यवस्था में शामिल किया जाएगा और मरीजों को वास्तविक रूप से कितनी राहत मिल सकेगी।

5,000 रुपये का स्टेंट, एमआरपी 25,000 रुपये कैसे?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने भारतीय निर्मित एक सामान्य हृदय स्टेंट का उदाहरण देते हुए कीमतों में बड़े अंतर पर सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि जिस स्टेंट के लिए खुदरा विक्रेता को 5,000 रुपये चुकाने पड़ते हैं, उसकी अधिकतम खुदरा कीमत 25,000 रुपये कैसे निर्धारित की जा सकती है। अदालत ने सलाइन चढ़ाने में इस्तेमाल होने वाली ड्रिप लाइन का उदाहरण भी दिया, जिसकी कीमतों में 11 रुपये और 270 रुपये का अंतर बताया गया।

इन उदाहरणों के जरिए अदालत ने यह जानना चाहा कि निर्माता और आपूर्तिकर्ता किसी उत्पाद की वास्तविक आपूर्ति कीमत की तुलना में कई गुना अधिक एमआरपी किस आधार पर तय करते हैं। चिकित्सा उपकरणों की कीमतों में इस तरह का अंतर मरीजों पर उपचार का आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है। अदालत की चिंता का केंद्र यही था कि कीमत तय करने की प्रक्रिया में मरीजों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा किस तरह सुनिश्चित की जा सकती है।

सरकार के हलफनामे में भी अत्यधिक मार्जिन का उल्लेख

केंद्र सरकार के हलफनामे में दवाओं और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चिकित्सा सामग्री पर अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन की समस्या स्वीकार की गई है। हलफनामे के अनुसार, कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन 170 से 700 प्रतिशत अथवा इससे भी अधिक हो सकता है। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली उपभोग्य चिकित्सा सामग्री के मामले में यह मार्जिन 100 से 1,000 प्रतिशत अथवा उससे अधिक होने की बात कही गई है।

हलफनामे में अस्पतालों की खरीद संबंधी प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, अस्पताल कई बार उन निर्माताओं की दवाएं खरीदते हैं जो अधिक व्यापारिक मार्जिन देते हैं और फिर मरीजों को उन्हें एमआरपी पर बेचते हैं। इससे दवाओं और चिकित्सा सामग्री की खरीद तथा मरीजों को उनकी बिक्री के बीच कीमतों के अंतर का सवाल और गंभीर हो जाता है।

सरकार ने उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका जताई

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत में कहा कि दवाओं की कीमतों, उनकी उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने आशंका जताई कि अत्यधिक मूल्य नियंत्रण से कुछ दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

इस पर पीठ ने मौजूदा औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) की व्यवस्था का हवाला देते हुए सवाल किया कि जिन दवाओं की कीमतें 16 प्रतिशत खुदरा मार्जिन के आधार पर नियंत्रित की जाती हैं, क्या वे उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचतीं? अदालत के इस सवाल ने सरकार के सामने यह स्पष्ट करने की चुनौती रखी कि मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने और बाजार में उनकी आपूर्ति बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है।

अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को

दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमतों पर नियंत्रण से जुड़ा यह मामला अब केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित राहत का नहीं रह गया है। सुनवाई के दौरान सामने आए सवालों ने यह मुद्दा उठाया है कि जब चिकित्सा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले कई उत्पादों की आपूर्ति कीमत और एमआरपी के बीच बड़ा अंतर हो सकता है, तो मरीजों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने के लिए व्यापक और प्रभावी व्यवस्था क्यों न बनाई जाए।

आगरा के अधिवक्ता के.सी. जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि केंद्र सरकार की ओर से दवाओं की कीमतों में कमी के लिए उठाए गए कदमों का दायरा कितना बढ़ता है और अदालत के सवालों के जवाब में दूसरी दवाओं तथा चिकित्सा उपकरणों के मूल्य निर्धारण पर क्या रुख सामने आता है।

SP_Singh AURGURU Editor