आगरा नगर निगम में 200 करोड़ के ई-टेंडर घोटाले की आशंका, जांच हुई तो अफसर भी घेरे में

आगरा नगर निगम की ई-टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। चर्चाओं में संभावित गड़बड़ी का दायरा 100 से 200 करोड़ रुपये तक बताए जाने का दावा किया जा रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। एक आउटसोर्सिंग कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका, टेंडर की दरों में कथित बदलाव, आय से अधिक संपत्ति संबंधी शिकायतों और पटल परिवर्तन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। मामले की निष्पक्ष जांच, डिजिटल रिकॉर्ड के सत्यापन और संदिग्ध टेंडरों के ऑडिट से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

Oct 12, 2026 - 19:20
 0
आगरा नगर निगम में 200 करोड़ के ई-टेंडर घोटाले की आशंका, जांच हुई तो अफसर भी घेरे में

एक फाइल में गड़बड़ी सामने आने के बाद कई टेंडरों की गोपनीय जांच शुरू होने की चर्चा, कंप्यूटर ऑपरेटर का पटल बदला, लेकिन सेवाएं समाप्त न करने पर सवाल, शासन स्तर से एसआईटी जांच हुई तो खुल सकते हैं कई राज
 

आगरा। नगर निगम में ई-टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। टेंडरों की दरों में कथित हेरफेर के इस मामले में करोड़ों रुपये की अनियमितताओं की आशंका जताई जा रही है। नगर निगम के गलियारों में चर्चा है कि यदि शासन स्तर से विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर निष्पक्ष जांच कराई गई, तो कथित घोटाले का दायरा 100 से 200 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। हालांकि, इस संभावित रकम और कथित अनियमितताओं की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

मामले में एक आउटसोर्सिंग कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ कर्मचारियों और ठेकेदारों के कथित गठजोड़ के जरिए टेंडर की दरों में बदलाव कर मनपसंद ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया जाता रहा। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो इससे सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचने के साथ ही ई-टेंडर प्रणाली की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे।

एक फाइल में कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद नगर निगम में अन्य फाइलों की गोपनीय जांच शुरू किए जाने की चर्चा है। इसी बीच संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटरों के पटल बदले जाने की बात भी सामने आई है। अब सवाल यह है कि क्या यह कदम केवल व्यवस्था में बदलाव के लिए उठाया गया है या इसके पीछे कथित अनियमितताओं की जांच से जुड़ी कोई वजह है?

कर्मचारी के  लग्जरी गाड़ियों और महंगे शौक की चर्चा

नगर निगम में संबंधित आउटसोर्सिंग कंप्यूटर ऑपरेटर को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। बताया जा रहा है कि करीब 11 से 12 हजार रुपये मासिक वेतन पाने वाले इस कर्मचारी के पास महंगी गाड़ियां हैं और उसका रहन-सहन भी चर्चा का विषय बना हुआ है। उसकी कथित संपत्ति और आय के स्रोतों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। नगर निगम के गलियारों में यह भी चर्चा है कि शासन स्तर पर उसकी आय से अधिक संपत्ति को लेकर शिकायतें की गई हैं। हालांकि, इन शिकायतों, संपत्ति के वास्तविक मूल्य और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर संपत्ति के स्रोतों, संबंधित टेंडरों और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल करना महत्वपूर्ण होगा।

ऐसे बदल सकती हैं टेंडर की दरें

नगर निगम में विकास और निर्माण कार्यों के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत टेंडर आमंत्रित किए जाते हैं। संबंधित कंपनियां और ठेकेदार अपनी दरें ऑनलाइन दर्ज करते हैं। निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद निविदाओं का विवरण निकाला जाता है और स्वीकृति की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। आरोप है कि कथित खेल इसी प्रक्रिया के दौरान होता है। टेंडर का प्रिंट निकलने के बाद यदि किसी स्तर पर दरों में अनधिकृत बदलाव किया जाए और फाइल में संशोधित दरों को शामिल कर दिया जाए, तो इससे प्रतिस्पर्धा का पूरा उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। आरोपों के मुताबिक, कुछ कर्मचारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से ऐसी कथित हेराफेरी की जाती रही। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल प्रक्रिया संबंधी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सरकारी धन और ठेके आवंटित करने की व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मामला हो सकता है। इसकी पुष्टि के लिए मूल ई-टेंडर रिकॉर्ड, डिजिटल लॉग, समय-मुद्रित दस्तावेजों, फाइलों और स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी है।

उदाहरण से समझिए कथित खेल का पूरा गणित

मान लीजिए, नगर निगम किसी निर्माण कार्य के लिए टेंडर आमंत्रित करता है। तीन ठेकेदार अपनी दरें दर्ज करते हैं। पहला ठेकेदार निर्धारित लागत से 10 प्रतिशत कम, दूसरा 20 प्रतिशत कम और तीसरा 25 प्रतिशत कम दर पर काम करने की पेशकश करता है। ऐसी स्थिति में, यदि तीसरे ठेकेदार की निविदा सभी निर्धारित शर्तों के अनुसार वैध है और वह सबसे कम दर वाला पात्र बोलीदाता है, तो नियमानुसार उसकी निविदा पर विचार किया जा सकता है। लेकिन कथित आरोप के मुताबिक, यदि फाइल तैयार होने के बाद 25 प्रतिशत कम की दर को बदलकर केवल 5 प्रतिशत कम दिखा दिया जाए और उसी आधार पर निविदा को आगे बढ़ाया जाए, तो ठेकेदार को मिलने वाले भुगतान और सरकारी खर्च पर सीधा असर पड़ सकता है। यह उदाहरण केवल कथित हेरफेर को समझाने के लिए है। वास्तविक मामले में ऐसा हुआ या नहीं, यह संबंधित टेंडर के मूल रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।

वर्षों से कथित खेल की चर्चा, फिर भी कार्रवाई पर सवाल

नगर निगम में संबंधित कंप्यूटर ऑपरेटर को लेकर पहले भी शिकायतें होने और उसका नाम चर्चाओं में आने के दावे किए जा रहे हैं। इसके बावजूद यदि अनियमितताओं की पुष्टि के बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करेगा। अब संबंधित पटल बदले जाने की चर्चा है और उसकी जगह आए कर्मचारी की छवि साफ बताई जा रही है। लेकिन केवल पटल बदलने से कथित अनियमितताओं की जांच पूरी नहीं हो जाती। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि संबंधित कर्मचारी की भूमिका की औपचारिक जांच हुई या नहीं, शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई और जिन टेंडरों में गड़बड़ी की आशंका है, उनका सत्यापन किस स्तर पर किया जा रहा है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पटल परिवर्तन सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है या किसी जांच के मद्देनजर किया गया कदम। बिना आधिकारिक जानकारी के इसके पीछे किसी खास उद्देश्य का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

क्या केवल पटल बदलने से दब जाएगा मामला?

नगर निगम में उठ रहे सवालों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर शिकायतें हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जाती? क्या संबंधित टेंडरों की जांच केवल कुछ फाइलों तक सीमित रहेगी या पिछले वर्षों में स्वीकृत निविदाओं का भी ऑडिट कराया जाएगा? यदि शासन स्तर पर एसआईटी जांच गठित होती है, तो कथित तौर पर लाभ पाने वाले ठेकेदारों, फाइलों को आगे बढ़ाने वाले कर्मचारियों और स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की जा सकती है। हालांकि, जांच गठित होने या किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के दोषी पाए जाने की अभी पुष्टि नहीं है। कानपुर नगर निगम में सामने आए कथित घोटालों से तुलना करते हुए आगरा के मामले को लेकर भी चर्चाएं हो रही हैं। लेकिन आगरा में कथित अनियमितताओं का वास्तविक पैमाना जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही तय किया जा सकता है।

जांच से ही सामने आएगा सच

नगर निगम की ई-टेंडर प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि संदिग्ध टेंडरों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। मूल ऑनलाइन बोलियों और फाइलों में दर्ज दरों का मिलान, डिजिटल रिकॉर्ड की जांच, भुगतान का सत्यापन और संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों की भूमिका का परीक्षण किया जाना चाहिए। साथ ही, आय से अधिक संपत्ति संबंधी शिकायतों की भी नियमानुसार जांच होनी चाहिए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो संबंधित कर्मचारियों को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। फिलहाल पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या जांच केवल पटल परिवर्तन तक सीमित रहेगी या ई-टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर की तह तक पहुंचकर सरकारी राजस्व को हुए वास्तविक नुकसान का आकलन भी किया जाएगा।