ताज नगरी की ज़बानी गंदगी: आखिर हर गाली में औरत ही क्यों? महिलाओं का सम्मान करना है तो गालियों में उनका जिक्र न कीजिए!

आगरा की रोज़मर्रा की भाषा में गालियां एक आम सामाजिक अभिव्यक्ति बन चुकी हैं, जिनका निशाना अक्सर मां-बहन और औरतों की अस्मिता होती है। छोटे-छोटे विवादों से लेकर सड़क की बहस तक, ग़ुस्से की भाषा में औरत का नाम सबसे पहले आता है। आखिर सम्मान की बात करने वाला समाज गाली देते समय औरत को ही क्यों केंद्र में रखता है। ग़ुस्सा निकले तो निकले, लेकिन भाषा में औरतों को अपमान का प्रतीक बनाना बंद होना चाहिए।

Mar 9, 2026 - 11:10
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ताज नगरी की ज़बानी गंदगी: आखिर हर गाली में औरत ही क्यों? महिलाओं का सम्मान करना है तो गालियों में उनका जिक्र न कीजिए!
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-बृज खंडेलवाल-

आगरा ताजमहल के लिए मशहूर है। मोहब्बत की निशानी, लेकिन ज़रा शहर की गलियों में घूमिए। एक और स्मारक नज़र आएगा। गालियों का स्मारक। यहां तालीम मायने नहीं रखती। तहज़ीब भी नहीं। दौलत भी नहीं। आगरा में एक लोकतांत्रिक ज़बान है- गालियों की ज़बान।

सब्ज़ी बेचने वाला। स्कूटर मिस्त्री। कॉलेज का छात्र। पान की दुकान पर बैठे बुज़ुर्ग। गुटके की पीक बौछार के साथ गालियों का मधुर रस! लेकिन इस कहानी में एक अजीब मोड़ है। ज़्यादातर गालियां औरतों के नाम पर टिकती हैं। मां। बहन। बेटी। झगड़ा चाहे पार्किंग का हो या बिजली बिल का, इज़्ज़त किसी की मां-बहन की ही उछलती है।

आगरा की हवा में भाषाई प्रदूषण तैरता है। लेकिन किसी को तकलीफ़ नहीं। लोगों को इसकी आदत पड़ चुकी है। जैसे सड़क का शोर। औरतें भी पीछे नहीं। वे भी इस कला में कम उस्ताद नहीं। उम्र की कोई पाबंदी नहीं। दादी-नानी भी ऐसी शब्दावली चला सकती हैं कि ट्रक ड्राइवर भी शरमा जाए।

एक ज़माना था जब बातों में नज़ाकत होती थी। मुहावरों से बात सजती थी। कहावतों से तर्क मजबूत होते थे। शेर-ओ-शायरी से बात में नूर आ जाता था। आजकल ग़ुस्सा बढ़ा है। सब्र घटा है और ज़बान गरीब हो गई है। जब लफ़्ज़ कम पड़ते हैं, गाली हाज़िर हो जाती है।

हर वाक्य में जिस्मानी इशारे। हर झगड़े में मां-बहन का जिक्र। असल ग़ुस्सा ट्रैफिक पर होता है, लेकिन निशाना औरत बनती है।

यह सवाल शायद ही किसी को परेशान करता है। ग्रामीण आगरा हो या शहर, गाली कई लोगों के लिए ग़ुस्सा निकालने का सबसे आसान ज़रिया है।

ज़िंदगी मुश्किल है। नाइंसाफ़ी बहुत है। दिल में भड़ास भरी है। तो लोग गाली देते हैं। न खून-खराबा। न पुलिस केस। बस ज़बानी आतिशबाज़ी।

कुछ लोग तो इसे सामाजिक हथियार भी बताते हैं। गाली एक तरह का अहिंसक विरोध है। गोली नहीं चलती। बस ज़बान चलती है। अजीब ख्याल है। लेकिन पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं। गालियां अक्सर उस ग़ुस्से की आवाज़ होती हैं जो व्यवस्था से निराश आम आदमी के भीतर जमा होता रहता है।

फिर भी एक सवाल बार-बार उठता है। हर गाली औरत के इर्द-गिर्द ही क्यों घूमती है? मां। बहन। बेटी। यह कैसी मानसिकता है जिसमें औरत को इज़्ज़त का बर्तन बना दिया गया है?

सामाजिक विश्लेषक श्रीवास्तव तो और आगे जाते हैं। उनका कहना है- समाज में बदलाव गोलियों से नहीं, गालियों से आता है। भारत जैसे अहिंसा-प्रिय समाज में गाली ग़ुस्से का वैध इज़हार है। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि गालियों का दायरा बढ़ना चाहिए। नई तरह की, एलजीबीटी-दोस्त गालियां भी बननी चाहिए।

बात चौंकाने वाली है। लेकिन हमारी परंपरा भी कम अजीब नहीं। उत्तर भारत की शादियों में दूल्हे की बारात का स्वागत औरतें लयबद्ध गालियों से करती हैं। सब हंसते हैं। मज़ा लेते हैं। एक सांस्कृतिक रस्म।

गली-मुहल्लों की मिली-जुली संस्कृति में भी गाली का अपना मुकाम है। चाय की दुकान। बाज़ार। बस अड्डा। हर जगह यह खुरदुरी भाषा सुनाई देती है।

पुलिस की नौकरी करनी हो तो शायद गाली-शास्त्र में पारंगत होना भी ज़रूरी है। कवि खुसकेट अकबराबादी ने बरसों पहले लिखा था- जिसे गाली देना नहीं आता, उसकी ज़िंदगी अधूरी है।

आगरा इस बात को पूरी शिद्दत से साबित करता है। यहां लोग लड़ाई में हथियार कम निकालते हैं। गालियां ज़्यादा।

जहां समाज बीमार होता है; वहां पिस्तौल चलती है। जहां लोग थोड़े सभ्य होते हैं; वहाँ गाली से काम चल जाता है।

लेकिन आगरा की गाली संस्कृति पर एक नया खतरा मंडरा रहा है। पश्चिमी असर। शहर संस्कृति के जानकार एक पंडित दुखी हैं। उनका कहना है कि आज के नौजवानों ने गालियों की पूरी विरासत बरबाद कर दी। उनकी पूरी शब्दावली बस दो अंग्रेज़ी लफ़्ज़ों में सिमट गई है- “ओह शिट।” बस। न कोई तर्ज़। न कोई रंग।

आगरा की पुरानी गालियों में रचनात्मकता थी। लय थी। अदायगी थी। अब सब कुछ ग्लोबलाइजेशन की भेंट चढ़ रहा है। फिर भी शहर चलता जा रहा है।

ताजमहल में दुनिया मोहब्बत देखने आती है और बाहर गलियों में लोग ग़ुस्सा निकालते रहते हैं। शायद बुज़ुर्ग ठीक ही कहते हैं; गालियां भाषा का श्रृंगार हैं। गालियां ज़बान में करंट भर देती हैं। बात में बेबाकी लाती हैं।

बस एक छोटी-सी गुज़ारिश है। अगली बार ग़ुस्सा आए तो किसी की मां-बहन-बेटी को बख्श दीजिए। बेचारी भाषा में बहुत पहले ही शहीद हो चुकी है।

SP_Singh AURGURU Editor