उत्तर प्रदेश में लगातार धीमी हो रही पारदर्शिता: सूचना अधिकार कानून पर सिस्टम की मार, अदालत की फटकार के बाद भी हालात दयनीय

सूचना का अधिकार कानून केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर लागू होने से ही सार्थक होगा। उत्तर प्रदेश में जब तक सिस्टम में इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक न कानून काम करेगा, न अदालत के आदेश।

Apr 14, 2026 - 18:16
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उत्तर प्रदेश में लगातार धीमी हो रही पारदर्शिता: सूचना अधिकार कानून पर सिस्टम की मार, अदालत की फटकार के बाद भी हालात दयनीय

उत्तर प्रदेश में सूचना का अधिकार अधिनियम की स्थिति अब चिंता का विषय बनती जा रही है, जहां पारदर्शिता का यह सबसे बड़ा हथियार खुद सिस्टम की उदासीनता में दम तोड़ता दिख रहा है। राज्य सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम ने हालिया टिप्पणियों में साफ कहा कि प्रदेश में सूचना का अधिकार अधिनियम का कार्यान्वयन दयनीय स्तर पर पहुंच चुका है। हालात यह हैं कि अधिकांश मामलों में सूचना तभी मिलती है जब मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंच जाता है, जो पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

आंकड़े भी इसी सच्चाई को उजागर करते हैं। करीब 75 प्रतिशत मामलों में सूचना आयोग के हस्तक्षेप के बाद ही जवाब मिलता है, जबकि 50 हजार से अधिक मामलों का निस्तारण होने के बावजूद 20 हजार से ज्यादा मामले अभी भी लंबित पड़े हैं। कई मामलों में अधिकारियों की लापरवाही इतनी स्पष्ट है कि समय पर सूचना न देने पर पीलीभीत में 143 जन सूचना अधिकारियों को दंडित करना पड़ा। यह स्थिति बताती है कि सूचना देना अब जिम्मेदारी नहीं, बल्कि टालने का खेल बन चुका है।

वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन टाइम्स ऒफ इंडिया की रिपोर्ट का हवाला देकर बताते हैं कि जमीनी स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है। कई जन सूचना अधिकारी अपील और शिकायत के बीच का बुनियादी अंतर तक नहीं समझते, जबकि 2019 के संशोधनों की जानकारी का भी अभाव है। समीक्षा बैठकों में अधिकारी बिना दस्तावेजों के पहुंचते हैं, जिससे प्रक्रिया ही बाधित हो जाती है। सरकारी विभागों की वेबसाइटों पर स्वतः प्रकटीकरण की भारी कमी है, जिससे आम नागरिक को हर छोटी जानकारी के लिए RTI आवेदन करना पड़ता है। यही वह बिंदु है, जहां पूरा सिस्टम पारदर्शिता के मूल सिद्धांत से भटकता नजर आता है।

इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे पर स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है। केसी जैन बनाम भारत सरकार मामले में 9 अक्टूबर 2023 को दिए गए फैसले में न्यायालय ने कहा कि सूचना का अधिकार केवल अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही की व्यवस्था भी है। इस फैसले में न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने साफ किया कि धारा 4 के तहत स्वतः प्रकटीकरण आरटीआई कानून की आत्मा है और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों को यह भी निर्देश दिया कि वे धारा 4 के अनुपालन की लगातार निगरानी करें और सार्वजनिक प्राधिकरणों को जवाबदेह बनाएं। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन निर्देशों के बावजूद न तो वेबसाइटों पर सूचनाएं अपडेट हो रही हैं और न ही अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। परिणाम यह है कि अदालत के आदेश भी कागजों तक सीमित रह जाते हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन के अनुसार, सूचना का अधिकार अधिनियम अब धीरे-धीरे अपनी धार खोता जा रहा है। जो कानून कभी आम नागरिक के हाथ में सशक्त हथियार था, वह अब एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह गया है। अधिकारी जानबूझकर सूचना देने में देरी करते हैं, प्रथम अपील स्तर पर भी न्याय नहीं मिलता और राज्य सूचना आयोग भी अपेक्षित गति से काम नहीं कर पा रहा।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि नागरिकों का भरोसा आरटीआई प्रक्रिया से उठता जा रहा है। जब हर स्तर पर निराशा मिले, तो लोग आवेदन करना ही छोड़ देते हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। पारदर्शिता की जगह अब गोपनीयता और टालमटोल ने ले ली है।

एडवोकेट केसी जैन कहते हैं- समाधान स्पष्ट है, लेकिन इच्छाशक्ति का अभाव सबसे बड़ी बाधा है। जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण, समय-सीमा उल्लंघन पर सख्त दंड, सूचना आयोगों में रिक्त पदों की शीघ्र नियुक्ति और सरकारी वेबसाइटों पर स्वतः प्रकटीकरण को अनिवार्य बनाना ही इस कानून को फिर से प्रभावी बना सकता है।

अंततः, आरटीआई केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। यदि यह कमजोर पड़ता है, तो पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकार- सभी एक साथ खतरे में पड़ जाते हैं।

SP_Singh AURGURU Editor