आगरा के किरावली थाने में दो नाबालिगों को पूछताछ के नाम पर घंटों बैठाए रखा गया, वीडियो-फोटो वायरल होने से दोनों किशोरों की पहचान उजागर, पुलिस पर उठ रहे गंभीर सवाल

आगरा। थाना किरावली पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। पूछताछ के नाम पर दो नाबालिग लड़कों को कई घंटे तक थाने में बैठाए रखने और उनसे संबंधित वीडियो तथा फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस पर बाल अधिकार कानून के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे हैं।

May 17, 2026 - 17:24
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आगरा के किरावली थाने में दो नाबालिगों को पूछताछ के नाम पर घंटों बैठाए रखा गया, वीडियो-फोटो वायरल होने से दोनों किशोरों की पहचान उजागर, पुलिस पर उठ रहे गंभीर सवाल

मामले ने तूल तब पकड़ा जब सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो में दोनों नाबालिग लड़के थाना परिसर में दिखाई दिए। इसके बाद बाल अधिकारों, किशोर न्याय अधिनियम और पुलिस की संवेदनशीलता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

मोबाइल बेचने पहुंचे थे नाबालिग

जानकारी के अनुसार शनिवार दोपहर कस्बा किरावली की एक मोबाइल दुकान पर दो नाबालिग लड़के मोबाइल बेचने पहुंचे थे। दुकान संचालक को मोबाइल संदिग्ध लगा और उसे चोरी की आशंका हुई। दुकानदार ने तत्काल थाना किरावली पुलिस को सूचना दे दी। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों नाबालिग लड़कों को अपने साथ थाने ले आई।

बताया जा रहा है कि पुलिस ने दोनों बच्चों को करीब दो घंटे तक थाने में बैठाकर पूछताछ की। बाद में उन्हें अछनेरा पुलिस को सौंप दिया गया, जहां से बच्चों को उनके परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया।

पुलिस भूल गई किशोर न्याय कानून

पूरा विवाद इस बात को लेकर खड़ा हुआ कि पुलिस ने नाबालिगों से पूछताछ के दौरान किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम-2015 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया।

कानून के अनुसार किसी भी नाबालिग से पूछताछ मित्रवत वातावरण में, परिजनों की मौजूदगी में और बाल कल्याण प्रक्रिया का पालन करते हुए की जानी चाहिए। साथ ही मामले की सूचना तत्काल किशोर न्याय बोर्ड को देना भी अनिवार्य होता है।

लेकिन आरोप है कि थाना पुलिस ने न तो बोर्ड को सूचना दी और न ही बच्चों के अधिकारों के अनुरूप प्रक्रिया अपनाई।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और फोटो

घटना के बाद थाना परिसर से जुड़े वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। वायरल सामग्री में नाबालिग बच्चों की पहचान और उनकी मौजूदगी खुलकर सामने आने लगी, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील बन गया।

चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट एडवोकेट नरेस पारस का कहना है कि इस प्रकार नाबालिगों की तस्वीरें सार्वजनिक होना गंभीर चिंता का विषय है और इससे बच्चों के मानसिक एवं सामाजिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हैरानी इस बात की है कि थानों की पुलिस को हर माह डीसीपी स्तर से जेजे एक्ट का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन फिर भी पुलिस ऐसी लापरवाहियां कर रही है।

एसीपी बोले- मामला संज्ञान में नहीं

मामले में एसीपी अछनेरा शैलेंद्र सिंह ने कहा कि मामला अभी मेरे संज्ञान में नहीं है। जांच कराकर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और तस्वीरों के बाद पुलिस की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

किशोर न्याय बोर्ड ने भी जताई आपत्ति

किशोर न्याय बोर्ड की अध्यक्ष जया चतुर्वेदी ने स्पष्ट कहा कि इस पूरे मामले में थाना पुलिस द्वारा बोर्ड को कोई सूचना नहीं दी गई, जो नियमों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में किशोर न्याय अधिनियम के दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य है और किसी भी स्तर पर लापरवाही गंभीर विषय माना जाता है।

पुलिस प्रशिक्षण पर फिर उठे सवाल

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जमीनी स्तर पर पुलिसकर्मियों को बाल अधिकारों और किशोर न्याय कानून की पर्याप्त जानकारी और प्रशिक्षण दिया जा रहा है या नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता, गोपनीयता और वैधानिक प्रक्रिया सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि छोटी सी लापरवाही भी किसी नाबालिग के भविष्य पर गहरा असर डाल सकती है।

SP_Singh AURGURU Editor