भट्ट चंद वरदाई की लेखनी और ‘पृथ्वीराज रासो’ पर आसानी से विश्वास क्यों नहीं किया जाता?

भट्ट चंद वरदाई की रचनाओं और ‘पृथ्वीराज रासो’ में वर्णित घटनाओं पर संदेह मुख्यतः आधुनिक दृष्टिकोण और सीमित ऐतिहासिक प्रमाणों के कारण उभरता है, जबकि उस दौर की सामाजिक परंपराएं, काव्य शैली और वीरगाथाएं अपने संदर्भ में सत्य और यथार्थ का अलग स्वरूप प्रस्तुत करती हैं, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के व्यक्तित्व, पराक्रम और निर्णयों को समझना आवश्यक है।

Apr 9, 2026 - 12:35
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भट्ट चंद वरदाई की लेखनी और ‘पृथ्वीराज रासो’ पर आसानी से विश्वास क्यों नहीं किया जाता?

-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान -

राष्ट्रीय कवि, भविष्य वक्ता, राजसलाहकार भट्ट चंद वरदाई की कथनी और काव्य पर हमें क्यों शंका होती है? क्या केवल इसलिए कि जो वह कहते हैं, वैसा तब से आज तक देखा-सुना नहीं गया? ऐसी आशा शायद किसी को भी न रही हो, है ना?

चलिए, उनके द्वारा रचित ‘पृथ्वीराज रासो’ की बात करते हैं। आखिर पृथ्वीराज चौहान जैसा कोई निडर, निर्भीक, वीर, शौर्यवान, प्रतापी, दिलेर, मजबूत कद-काठी वाला, शक्तिशाली, समझदार, सूझबूझ वाला, कार्यकुशल, दूरदर्शी, ईमानदार, वचन का पक्का, रौबदार, चरित्रवान, कर्मवीर, मेधावी, न्यायी और शरणागत का रक्षक—इन सभी गुणों से परिपूर्ण कैसे हो सकता है? और यदि ऐसे किसी व्यक्तित्व का वर्णन कोई करे, तो उसे तुरंत अतिशयोक्ति या असत्य मान लिया जाता है, जैसा कि भट्ट चंद वरदाई के साथ हुआ। क्या उस समय का भट्ट समाज राई का पहाड़ बना देता था, और क्या आज के समय में उस समाज की बातों पर सहज विश्वास नहीं किया जाता? यह विचारणीय प्रश्न है।

दिल्ली नरेश तोमर राजा पृथ्वीराज चौहान के नाना थे। यह समझने की कोशिश कीजिए कि उन्होंने अपनी गद्दी के उत्तराधिकारी के रूप में केवल पृथ्वीराज को ही क्यों चुना, जबकि अन्य दावेदार भी थे। भले ही पृथ्वीराज की आयु कम रही हो, लेकिन समग्र समाज का समर्थन और मंत्रणा उनके साथ थी। राजपुरोहित का आशीर्वाद भी उन्हें प्राप्त रहा होगा, अन्यथा इतने बड़े राज्य का संचालन एक दिन के लिए भी संभव नहीं था। उनके कंधों पर केवल राज्य ही नहीं, बल्कि प्रजा की देखभाल, पितरों और कुल की मान-मर्यादा की जिम्मेदारी भी रही होगी।

इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने वाले व्यक्ति को गिराने के लिए न जाने कितने षड्यंत्र होते रहे होंगे, और पीठ पीछे कितनी ही चालें चली गई होंगी। उन्हें सत्ता का सुख मात्र 15 वर्षों तक ही मिला, जिसमें अनेक युद्ध और चारों ओर से आक्रमण शामिल थे। मात्र 26 वर्ष की आयु में वे वीरगति को प्राप्त हुए। इस अल्प समय में वे सम्राट भी बने, और उस पद तक पहुंचने के लिए न जाने कितने संघर्ष और युद्ध करने पड़े। इतिहास यह भी बताता है कि मोहम्मद गौरी के विरुद्ध युद्ध में गिने-चुने राज्यों ने ही उनका साथ दिया। कहा जाए तो पूरे उत्तरी भारत का भार उनके ही कंधों पर था।

उस समय के सामाजिक नियमों को भी समझना आवश्यक है। संभवतः उस काल में मौसेरी बहन से विवाह की परंपरा रही होगी, और इसी कारण संयोगिता से उनका विवाह हुआ। न उन्हें कोई ग्लानि थी, न संयोगिता को, और न ही उस समय के समाज को। समाज ही नियम बनाता है, और समय के साथ वे बदलते भी हैं। जो आज प्रचलन में है, यह आवश्यक नहीं कि वह सदैव से रहा हो।

पुराने कालखंड में विभिन्न स्थानों पर व्यापक पूजा, हवन और अनुष्ठान ऋषि-मुनियों द्वारा आयोजित किए जाते थे, जिनके पीछे अनेक उद्देश्य होते थे। अबु पर्वत की श्रृंखला पर समय-समय पर विशेष हवन होते थे, जिनमें नए कुलों को अग्नि के समक्ष पवित्र कर उन्हें राजपूत बना दिया जाता था। यह एक परंपरा बन गई थी, जिसके माध्यम से शक्तिशाली समूहों को देश और क्षेत्र की रक्षा की जिम्मेदारी दी जाती थी।

कहा जाता है कि चौहान वंश का उद्भव ‘चाहूमण’ अर्थात ‘चार भुजा धारी’ अग्नि से हुआ। यह अग्निकुंड से उत्पन्न अंतिम समूह माना जाता है। स्पष्ट है कि चार भुजाएं केवल देवी-देवताओं की होती हैं, परंतु यहां यह वर्णन प्रतीकात्मक भी हो सकता है। संभव है कि ऐसे योद्धा, जो अपने दोनों हाथों और पैरों का समान रूप से उपयोग करते हों, उन्हें ‘चार भुजा’ कहा गया हो। जूडो-कराटे जैसी विधाओं में भी चारों अंगों का प्रयोग होता है, जो विदेशी कला मानी जाती है। संभव है कि ऐसे किसी युद्धक समुदाय को इस रूप में वर्णित कर, उन्हें राजपूत परंपरा में शामिल किया गया हो, जैसा कि इतिहास में समय-समय पर आवश्यकतानुसार होता रहा।

उस समय का समाज युद्ध में भी नियमों का पालन करता था। पृथ्वीराज चौहान की सेना रात्रि में गहरी नींद में होने के कारण तब पराजित हो गई, जब मोहम्मद गौरी ने अचानक नियम-विरुद्ध रात्रि में आक्रमण कर दिया। कहा जाता है कि उस समय तक रात्रि में युद्ध करना परंपरा के विरुद्ध था, इसलिए सेना निश्चिंत होकर विश्राम कर रही थी। जब भारतीय समाज युद्ध में भी मर्यादा और संस्कारों का पालन करता था, तो क्या वह भट्ट चंद वरदाई को निराधार और अतिरंजित कथाएं कहने की अनुमति देता?

इस दृष्टि से देखा जाए तो भट्ट चंद वरदाई द्वारा लिखा गया वर्णन केवल जुमला या कल्पना नहीं, बल्कि सत्य का ही स्वरूप प्रतीत होता है—न अर्धसत्य, न अतिशयोक्ति, न बनावट, बल्कि केवल सत्य।

लोग यह विश्वास ही नहीं कर पा रहे कि कैसे पृथ्वीराज चौहान ने आसानी से 21 बार हराया था मोहम्मद गौरी को? इसीलिए समाज और इतिहासकारों ने मिलकर इतिहास में 21 की जगह केवल 2 ही युद्ध पर विराम लगा दिए। आजकल कौन एक बार भी अपने दुश्मन को माफ करता है? पृथ्वीराज चौहान के काका ने भी दंड देने की बार-बार सलाह दी थी। सम्राट की आंखें फोड़े जाने के बाद भी कोई कैसे इतना सटीक शब्द-बाण चला सकता है, और वह भी केवल चंद वरदाई का दोहा सुनकर? अंधे पृथ्वीराज के शब्द-भेदी बाण आज भी हैरतअंगेज करते हैं। वह भी चंद वरदाई के दोहे को सुनकर? इसी बात को कोई अंग्रेज बताता, या फिर कोई विदेशी यह दोहा बोलता, तब यकीन आसानी से हो जाता ना? परंतु यहां तो भट्ट जी चंद वरदाई थे, और उस पर दुनिया कैसे ऐतबार कर ले? है ना?

"चार बांस चौबीस गज,
अंगुल अष्ट प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है,
मत चूको चौहान।"

....महाकवि भट्ट चंद वरदाई

(लेखक सम्राट पृथ्वीराज चौहान के वंशज हैं। यूपी के मैनपुरी जिले के बेटा नगला गांव निवासी डॉ. चौहान आज इंदौर के महू में निवास कर रहे हैं।)

SP_Singh AURGURU Editor