एसीई की अंतर्राष्ट्रीय कार्यशालाः छह हजार आईवीएफ क्लीनिक, लेकिन सिर्फ ढाई हजार एम्ब्रियोलॉजिस्ट; इस स्थिति पर विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता

आगरा। देश में तेजी से बढ़ रही बांझपन (इन्फर्टिलिटी) की समस्या के बीच प्रशिक्षित भ्रूण वैज्ञानिकों (एम्ब्रियोलॉजिस्ट) की भारी कमी अब आईवीएफ उपचार व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में जहां आईवीएफ क्लीनिकों की संख्या बढ़कर करीब 6 हजार तक पहुंच चुकी है, वहीं प्रशिक्षित एम्ब्रियोलॉजिस्ट की संख्या महज करीब ढाई हजार है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकी दक्षता विकसित करने के उद्देश्य से आयोजित ACE 2026 की कार्यशालाओं को इस कमी को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

Aug 7, 2026 - 16:51
 0
एसीई की अंतर्राष्ट्रीय कार्यशालाः छह हजार आईवीएफ क्लीनिक, लेकिन सिर्फ ढाई हजार एम्ब्रियोलॉजिस्ट; इस स्थिति पर विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता
इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ एकेडमी ऑफ क्लीनिकल एम्ब्रियोलॉजिस्ट (ACE), इंडिया की ओर से होटल आईटीसी मुगल में आयोजित तीन दिवसीय ACE 2026 अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में भाग लेने पहुंचे चिकित्सक।

कार्यशाला में एआई से डीएनए टेस्टिंग देखते डॊ. नरेंद्र मल्होत्रा।

यह जानकारी इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ एकेडमी ऑफ क्लीनिकल एम्ब्रियोलॉजिस्ट (ACE), इंडिया की ओर से होटल आईटीसी मुगल में आयोजित तीन दिवसीय ACE 2026 अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के पहले दिन आयोजन समिति के सचिव डॉ. केशव मल्होत्रा ने दी।

उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 15 प्रतिशत दंपती किसी न किसी स्तर पर बांझपन की समस्या से प्रभावित हैं। इसके चलते आईवीएफ उपचार की मांग लगातार बढ़ रही है और देशभर में आईवीएफ केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है। हालांकि, प्रशिक्षित भ्रूण वैज्ञानिकों की उपलब्धता इस गति के अनुरूप नहीं बढ़ सकी है। उन्होंने कहा कि आधुनिक प्रजनन चिकित्सा में एम्ब्रियोलॉजिस्ट की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, इसलिए उनकी संख्या और दक्षता दोनों बढ़ाना समय की आवश्यकता है।

पहले दिन 500 विशेषज्ञों और विद्यार्थियों ने लिया व्यावहारिक प्रशिक्षण

तीन दिवसीय कार्यशाला के पहले दिन प्री-कॉन्फ्रेंस के अंतर्गत 9 हैंड्स-ऑन वर्कशॉप्स आयोजित की गईं, जिनमें देशभर से आए लगभग 500 चिकित्सकों, एम्ब्रियोलॉजिस्ट और विद्यार्थियों ने भाग लिया। इन कार्यशालाओं में अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों ने आधुनिक प्रयोगशाला तकनीकों और आईवीएफ प्रक्रियाओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया।

आधुनिक तकनीकों पर रहा विशेष फोकस

कार्यशाला के दौरान "द ब्लास्टोसिस्ट एनिग्मा: फ्रॉम मॉर्फोलॉजी टू प्रिडिक्टिव मॉडलिंग" सत्र में भ्रूण के विकास, उसकी गुणवत्ता और भविष्यवाणी से संबंधित उन्नत वैज्ञानिक अवधारणाओं पर विस्तार से प्रशिक्षण दिया गया।

"माइक्रोमैनिपुलेशन मास्टरी एंड सीक्रेट्स – हैंड्स ऑन (लाइव डेमो)" में माइक्रोमैनिपुलेशन तकनीकों का लाइव प्रदर्शन किया गया, जबकि "मास्टिरिंग विट्रिफिकेशन: फ्रॉम कन्वेंशनल टू अल्ट्रा-फास्ट प्रोटोकॉल्स" के माध्यम से भ्रूण संरक्षण (विट्रिफिकेशन) की नवीनतम तकनीकों का अभ्यास कराया गया।

इसके अलावा "सिलेक्ट टू परफेक्ट: द स्पर्म सिलेक्शन मास्टरक्लास" में उच्च गुणवत्ता वाले शुक्राणुओं के चयन की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। "क्रायो क्राइसिस: ट्रबलशूटिंग इन विट्रिफिकेशन" सत्र में भ्रूण फ्रीजिंग के दौरान आने वाली तकनीकी चुनौतियों और उनके समाधान पर चर्चा हुई।

"द बायोप्सी वैलिडेशन लैब (हैंड्स ऑन + वैलिडेशन सर्टिफिकेशन)" तथा उसके थ्योरी सत्र में भ्रूण बायोप्सी की सटीकता, गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन प्रक्रिया पर विशेषज्ञों ने विस्तृत जानकारी दी। प्रतिभागियों को आधुनिक माइक्रोस्कोपिक तकनीकों, विशेष परिस्थितियों में शुक्राणु खोजने की प्रक्रियाओं तथा भ्रूण विकास रुकने के कारणों और उनके समाधान से भी अवगत कराया गया।

देश-विदेश के विशेषज्ञ रहे मौजूद

कार्यशाला में डॉ. जयदीप मल्होत्रा, डॉ. निहारिका मल्होत्रा, ACE की अध्यक्ष डॉ. सुजाता रामकृष्णन, इनकमिंग प्रेसीडेंट डॉ. गौरव मजूमदार, सचिव डॉ. परशुराम गोपीनाथ, डॉ. रीता वासेना, डॉ. अनुपम गुप्ता, अम्बर गुप्ता, किया पाराशर, रजनी पचौरी, मीनल जैन, डॉ. सुधा बंसल, रिचा सिंह, डॉ. नीरजा सचदेव, डॉ. कृष्णा चैतन्य सहित देश-विदेश के अनेक विशेषज्ञ, चिकित्सक और प्रशिक्षु उपस्थित रहे।

विशेषज्ञों का कहना था कि आईवीएफ उपचार की सफलता केवल आधुनिक मशीनों पर नहीं, बल्कि प्रशिक्षित और दक्ष एम्ब्रियोलॉजिस्ट पर भी निर्भर करती है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आने वाले वर्षों में देश में कुशल भ्रूण वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने और आईवीएफ उपचार की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

SP_Singh AURGURU Editor