चवन्नी से रुपया’ का दांव: अखिलेश ने जयंत पर हमला किया या पश्चिमी यूपी में अपने लिए नया मोर्चा खोल दिया?

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया’ वाले बयान की प्रतिक्रिया 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में दिखाई दे सकती है। जाट समाज के एक हिस्से ने जयंत चौधरी पर की गई इस टिप्पणी को अपने राजनीतिक और सामाजिक सम्मान से जोड़ लिया है। ऐसे में यह बयान सपा-रालोद की सियासी दूरी को और ज्यादा बढ़ाने के साथ ही जाट मतदाताओं के बीच चुनावी प्रतिक्रिया का कारण बन सकता है।

Aug 21, 2026 - 20:02
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चवन्नी से रुपया’ का दांव: अखिलेश ने जयंत पर हमला किया या पश्चिमी यूपी में अपने लिए नया मोर्चा खोल दिया?

लखनऊ। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी पर ‘चवन्नी से रुपया’ वाला तंज अब दो नेताओं की राजनीतिक नोकझोंक से आगे निकलता दिखाई दे रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे जाट राजनीति, किसान अस्मिता और 2027 के चुनावी समीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है।

अखिलेश यादव ने कहा था- ‘कैसे-कैसे लोग हमारे गठबंधन में आ गए थे। हमने उन्हें चवन्नी से रुपया बनाया और वे गठबंधन छोड़कर चले गए।‘ संदर्भ साफ तौर पर 2022 के सपा-रालोद गठबंधन और उसके बाद जयंत के भाजपा के साथ जाने से जुड़ता है। सपा के लिए यह पुराने सहयोगी के पाला बदलने की नाराजगी है, लेकिन रालोद ने इसे जयंत चौधरी से आगे बढ़ाकर चौधरी चरण सिंह की विरासत और किसान राजनीति के सम्मान से जोड़ दिया है।

जयंत चौधरी का जवाब भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था- 'जनता जनार्दन है, सबको बनाती है।‘ उन्होंने ‘चवन्नी’ की बहस में उलझने के बजाय अपनी राजनीतिक ताकत का श्रेय जनता को दिया। यानी संदेश यह कि किसी नेता को दूसरा नेता नहीं, मतदाता बनाता है।

2022 की दोस्ती से 2024 की दूरी

इस विवाद की असली पृष्ठभूमि 2022 में है। विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद साथ आए थे। किसान आंदोलन के बाद पश्चिमी यूपी में भाजपा के खिलाफ बने माहौल और कई क्षेत्रों में जाट-मुस्लिम नजदीकी ने इस गठबंधन को ताकत दी थी।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी भाजपा के साथ चले गए और रालोद एनडीए का हिस्सा बन गया। इसलिए अखिलेश का हमला केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि गठबंधन में साथ छोड़कर जाने वाले सहयोगी के प्रति राजनीतिक शिकायत भी है।

यहीं ‘चवन्नी’ शब्द का असर बदल जाता है। अखिलेश के समर्थकों के लिए यह पुराने सहयोगी को दिया गया राजनीतिक जवाब हो सकता है, लेकिन रालोद के लिए इसे जाट-किसान अस्मिता से जोड़ने का अवसर मिल गया है।

क्या इसका असर जाट वोट पर पड़ेगा?

अखिलेश यादव के बयान का क्या असर होगा, यह सबसे बड़ा सवाल है, लेकिन इसका जवाब अभी किसी एक दिशा में नहीं है। पश्चिमी यूपी के कुछ इलाकों में रालोद की पहचान जाट और किसान राजनीति से गहराई से जुड़ी है। ऐसे में यदि रालोद इस बयान को जयंत चौधरी के साथ-साथ चौधरी चरण सिंह की विरासत के अपमान के रूप में पेश करती है, तो सपा को राजनीतिक नुकसान हो सकता है। यानी ‘चवन्नी’ भावनात्मक मुद्दा बन सकता है, लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि वोट का अंतिम फैसला केवल भावनाओं से नहीं होगा।

सपा की असली चुनौती

अखिलेश यादव पीडीए के जरिए सपा के पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को व्यापक सामाजिक गठजोड़ में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिमी यूपी में इसके लिए जाटों के एक हिस्से के साथ गुर्जर, दलित, मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्गों तक पहुंच बनाना जरूरी होगा।

यहीं जयंत चौधरी सपा के लिए चुनौती बनते हैं। यदि भाजपा-रालोद गठबंधन जाट मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अपने साथ बनाए रखता है और भाजपा गैर-जाट ओबीसी तथा अन्य सामाजिक आधार को भी मजबूत रखती है, तो सपा के लिए पश्चिमी यूपी की लड़ाई कठिन होगी।

भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा?

इस पूरे विवाद का तत्काल राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है। भाजपा के साथ रालोद का गठबंधन पहले से है। जयंत के सामने चुनौती है कि वह भाजपा के साथ रहते हुए अपनी जाट-किसान पहचान को कायम रखें। वहीं भाजपा चाहेगी कि रालोद का पश्चिमी यूपी में प्रभाव उसके व्यापक सामाजिक गठबंधन का हिस्सा बने।

अखिलेश के लिए फायदा या जोखिम?

अखिलेश के बयान से सपा कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया है कि पार्टी ने जयंत को गठबंधन के जरिए राजनीतिक ताकत दी और बाद में उन्होंने भाजपा का रास्ता चुना। लेकिन व्यापक चुनावी राजनीति में जयंत चौधरी के लिए ‘चवन्नी से रुपया’ कहना जोखिम भरा भी है।

यदि अखिलेश केवल इतना कहते कि हमने सम्मान और राजनीतिक ताकत दी, लेकिन सहयोगी ने रास्ता बदल लिया, तो निशाना जयंत की राजनीतिक भूमिका तक सीमित रहता। ‘चवन्नी’ शब्द ने रालोद को इसे भावनात्मक और विरासत के सवाल में बदलने का मौका दे दिया है।

यही इस पूरे विवाद की सबसे दिलचस्प राजनीतिक विडंबना है। जिस शब्द से विरोधी को छोटा करने की कोशिश हुई, वही शब्द उसके समर्थकों को लामबंद करने का आधार बन सकता है।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में जाट समाज का समाजवादी पार्टी के साथ कभी स्वाभाविक जुड़ाव नहीं रहा। यह दूरी चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर चौधरी अजित सिंह और मुलायम सिंह यादव के बीच पैदा हुए मतभेदों के दौर में और गहरी हुई। जाट समाज के एक वर्ग में यह धारणा आज भी बनी हुई है कि मुलायम सिंह यादव ने चौधरी अजित सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया।

यही वजह है कि सपा और रालोद जब-जब करीब आए, तब जाट मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन गठबंधन के चलते सपा को भी मिला, लेकिन यह समर्थन मूल राजनीतिक जुड़ाव की बजाय गठबंधन की परिस्थितियों का परिणाम रहा। ऐसे में अखिलेश यादव की ताजा टिप्पणी को जाट समाज के एक वर्ग में चौधरी चरण सिंह और उनकी राजनीतिक विरासत के प्रति असम्मान के तौर पर देखा जा सकता है। इसका असर आने वाले चुनाव में सपा-रालोद के रिश्तों और जाट मतदाताओं के रुख पर दिखाई दे सकता है।

SP_Singh AURGURU Editor