‘चवन्नी से रुपया’ पर मायावती का पलटवार, अखिलेश से की जाट समाज से माफी मांगने की मांग; जयंत के बहाने पश्चिमी यूपी में नए सियासी समीकरण का दांव
मायावती का अखिलेश यादव पर हमला केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समाज की सहानुभूति हासिल करने की राजनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। पश्चिमी यूपी कभी बसपा का मजबूत गढ़ रहा है और अब पार्टी दलित-मुस्लिम आधार के साथ जाट समाज को जोड़कर नया सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है।
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी पर किए गए ‘चवन्नी से रुपया’ वाले तंज ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नया मोड़ ला दिया है। जयंत चौधरी के पलटवार के बाद अब बसपा प्रमुख मायावती भी खुलकर उनके समर्थन में उतर आई हैं। मायावती ने अखिलेश यादव के बयान को अमर्यादित और शर्मनाक बताते हुए कहा कि उन्होंने चौधरी चरण सिंह के परिवार का अपमान किया है और उन्हें पूरे जाट समाज से तुरंत माफी मांगनी चाहिए।
क्या कहा था अखिलेश यादव ने
अखिलेश यादव ने हाल में पुराने गठबंधन सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि कैसे-कैसे लोग हमारे गठबंधन में आ गए थे। हमने उन्हें चवन्नी से रुपया बनाया और वे गठबंधन छोड़कर चले गए। हालांकि उन्होंने अपने बयान में जयंत चौधरी या रालोद का नाम सीधे नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक संदर्भ में इसे जयंत चौधरी पर निशाने के रूप में देखा गया।
मायावती ने अखिलेश को सीधे घेरा
अखिलेश यादव के तंज पर जयंत चौधरी ने भी पलटवार किया था। अब बसपा सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश यादव पर हमला किया है। उन्होंने कहा कि सपा अध्यक्ष का बयान न केवल जयंत चौधरी बल्कि चौधरी चरण सिंह के परिवार और जाट समाज का अपमान है। मायावती ने अखिलेश यादव से जाट समाज से तत्काल माफी मांगने की मांग की है।
अखिलेश-जयंत विवाद में मायावती की एंट्री इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बसपा और सपा के बीच उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से तीखा संघर्ष रहा है। ऐसे में जयंत चौधरी के मुद्दे पर मायावती का अखिलेश के खिलाफ खुलकर खड़ा होना महज किसी बयान की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम माना जा रहा है।
सपा-रालोद की दोस्ती से भाजपा-रालोद गठबंधन तक
जयंत चौधरी और अखिलेश यादव के रिश्ते का राजनीतिक संदर्भ भी इस विवाद को महत्वपूर्ण बनाता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। रालोद ने 33 सीटों पर चुनाव लड़ा और आठ सीटें जीतीं। बाद में खतौली उपचुनाव में रालोद ने एक और सीट जीती।
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं। जयंत चौधरी की रालोद ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का साथ पकड़ लिया। इसके बाद जयंत चौधरी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री बने। वर्तमान में भाजपा और रालोद उत्तर प्रदेश में गठबंधन सहयोगी हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर दोनों दलों के बीच तालमेल की तैयारी चल रही है।
मायावती के निशाने पर सिर्फ अखिलेश नहीं, संदेश पश्चिमी यूपी को
मायावती के बयान की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने विवाद को केवल अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच व्यक्तिगत तकरार नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे जाट समाज और चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत से जोड़ दिया। यही वह बिंदु है जहां यह बयान पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में ज्यादा बड़ा अर्थ ग्रहण करता है।
चौधरी चरण सिंह की विरासत पश्चिमी यूपी की राजनीति में लंबे समय से जाट, किसान और ग्रामीण राजनीति से जुड़ी रही है। जयंत चौधरी उसी राजनीतिक परिवार की अगली पीढ़ी का चेहरा हैं। इसलिए मायावती ने अखिलेश के बयान को जयंत तक सीमित न रखकर जाट समाज और चौधरी चरण सिंह के परिवार के सम्मान से जोड़ दिया। इससे अखिलेश के लिए राजनीतिक रूप से जवाब देना अधिक कठिन हो गया है।
मायावती का निशाना अखिलेश, नजर जाट वोट बैंक पर
अखिलेश यादव पर हमला करके मायावती दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समाज की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं। पश्चिमी यूपी कभी बसपा का मजबूत राजनीतिक गढ़ रहा है और यहां दलितों के साथ मुस्लिमों तथा जाटों को जोड़कर बसपा एक व्यापक सामाजिक समीकरण खड़ा करना चाहती है। जयंत चौधरी और चौधरी चरण सिंह के परिवार के सम्मान को मुद्दा बनाकर मायावती ने अखिलेश के खिलाफ जाट समाज की भावनाओं को संबोधित करने का अवसर तलाशा है।
बसपा की रणनीति अगर इस दिशा में आगे बढ़ती है तो उसका लक्ष्य पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम-जाट गठजोड़ को मजबूत करना हो सकता है। यह सपा के पीडीए समीकरण के समानांतर बसपा के लिए एक अलग सामाजिक आधार तैयार करने की कोशिश होगी। अखिलेश के बयान को जाट समाज के सम्मान से जोड़कर मायावती ने इसी संभावित राजनीतिक जमीन पर दस्तक दी है।
हालांकि इस रणनीति की राह आसान नहीं है। पश्चिमी यूपी में जाट राजनीति पर रालोद की गहरी पकड़ है और जयंत चौधरी का भाजपा के साथ गठबंधन जाट मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के लिए स्वाभाविक राजनीतिक विकल्प माना जाता है। ऐसे में मायावती अखिलेश पर हमला करके जाट समाज की सहानुभूति हासिल करने में कितनी सफल होती हैं और उसे वास्तविक राजनीतिक समर्थन में कितना बदल पाती हैं, यह 2027 के चुनावी समीकरणों में ही साफ होगा।