बेटी तो बेटी होती हैः राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है

राजनीति की लड़ाई अब केवल विचारों और नीतियों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि विरोधियों के परिवारों, खासकर बेटियों को बदनाम करने तक पहुंच गई है। सोशल मीडिया पर झूठी खबरें, फर्जी तस्वीरें और अफवाहें फैलाकर किसी बेटी को राजनीतिक हथियार बनाना न केवल अमानवीय है, बल्कि पूरे समाज के नैतिक पतन का संकेत भी है। लोकतंत्र की गरिमा तभी बनी रह सकती है, जब राजनीतिक संघर्ष व्यक्तिगत जीवन से दूर रहे और हर बेटी के सम्मान को दल, विचारधारा और चुनावी प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखा जाए।

Jun 22, 2026 - 13:53
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बेटी तो बेटी होती हैः राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है

-बृज खंडेलवाल-

सूरज ढल चुका था, लेकिन लखनऊ की एक पुरानी हवेली में रोशनी अभी भी जल रही थी। अखबारों के बिखरे पन्नों और टीवी चैनलों के शोर के बीच 22 वर्षीय प्रिया अपनी किताबों में डूबी थी। तभी फोन की घंटी बजी। दोस्त का संदेश था, “प्रिया, तुम ठीक हो? सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है?”

स्क्रीन खुलते ही उसकी दुनिया बदल गई। कहीं चोरी की अफवाह, कहीं गुमशुदगी की मनगढ़ंत कहानी, कहीं फोटोशॉप की गई तस्वीरें। एक ट्रोल ने लिखा, “नेता की बेटी का असली चेहरा सामने आ गया।” देखते ही देखते लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे मजाक समझ रहे थे, कुछ इसे राजनीतिक हथियार बना रहे थे।

घर में सन्नाटा था। माँ की आँखों में आँसू थे। पिता की खामोशी में गुस्सा और बेबसी।

राजनीति हमेशा ऐसी नहीं थी। मतभेद होते थे, तीखी बहसें भी होती थीं, लेकिन परिवारों को निशाना बनाने की परंपरा नहीं थी। विरोधियों पर वैचारिक हमले होते थे, निजी जीवन पर नहीं। आज बहस का मंच कीचड़ उछालने का अखाड़ा बनता जा रहा है। मुद्दे गायब हैं, मर्यादा लापता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कभी किसी नेता की बेटी को फर्जी वीडियो से बदनाम किया जाता है, कभी किसी की पत्नी या माँ को अभद्र टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है। चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब निजी हमलों में बदलती जा रही है।

तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश, कोई प्रदेश इससे अछूता नहीं है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और खतरनाक बना दिया है। एक झूठी पोस्ट मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। किसी को सनसनी चाहिए, किसी को लाइक्स चाहिए, तो किसी को अपने विरोधी को नीचा दिखाने का अवसर।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कहा, “बेटी तो बेटी होती है।” यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और तहजीब की याद दिलाने वाला संदेश है। बेटियों का सम्मान किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा का विषय नहीं हो सकता।

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में इसकी निंदा की। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संयम और जवाबदेही का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं।

जरा उस लड़की की कल्पना कीजिए, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वह स्कूल जाती है, सपने देखती है, दोस्तों के साथ हँसती है। अचानक पिता की राजनीतिक पहचान उसकी अपनी पहचान पर भारी पड़ जाती है। उसकी तस्वीरें वायरल होने लगती हैं। संदर्भ बदल दिए जाते हैं। स्कूल में सवाल उठते हैं, मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो जाती है। परिवार की नींद उड़ जाती है।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना होनी चाहिए, विपक्ष से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन जब बहस परिवारों तक पहुँच जाती है, तब असली मुद्दे दम तोड़ देते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। चर्चा अफवाहों और अपमान तक सिमट जाती है।

हमें ठहरकर सोचना होगा। हर सनसनीखेज पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखें। राजनीतिक कार्यकर्ता हों, इन्फ्लुएंसर हों या आम नागरिक, सभी को संयम दिखाना होगा। झूठ फैलाने वाला दोषी है, लेकिन बिना जाँच उसे आगे बढ़ाने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है।

सत्ता बदलती रहती है। नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन समाज की शालीनता एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

बेटी तो बेटी होती है। यह कोई नारा नहीं, हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि जब सियासत बेटियों को निशाना बनाती है, तब हार किसी एक दल की नहीं होती, पूरे समाज की होती है। और इस हार की भरपाई कोई चुनावी जीत नहीं कर सकती।Top of Form

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SP_Singh AURGURU Editor