बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध नीतिगत फैसला, आगरा के डॉ. शरद गुप्ता और कीर्ति दुआ की जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से विचार करने को कहा
आगरा/नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक या प्रतिबंध लगाना नीतिगत मामला है और इस संबंध में निर्णय लेना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से जनहित याचिका (पीआईएल) में उठाए गए मुद्दों पर विचार कर उचित निर्णय लेने को कहा है।
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने तथा बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका का निपटारा करते हुए यह टिप्पणी की।
कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी। साथ ही याचिकाकर्ताओं के सुझावों को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म समेत सभी संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श के बाद उचित निर्णय लिया जाएगा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर किस तरह की रोक या प्रतिबंध लगाया जाए, इसका निर्देश कोर्ट की ओर से नहीं दिया जा सकता। यह सरकार के नीतिगत क्षेत्र का विषय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह सरकार को इस मामले में निर्णय लेने के लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं कर रही है।
यह आदेश तीन वर्षीय बच्ची की मां कीर्ति दुआ और आगरा के पर्यावरणविद एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। यह जनहित याचिका कीर्ति दुआ ने मां के रूप में जबकि डॊ. शरद गुप्ता ने बाल रोग विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ताओं के रूप में संयुक्त रूप से दायर की थी। याचिका में डॊ. शरद गुप्ता ने कहा कि 13 साल तक के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध बहुत जरूरी है। यह वह उम्र होती है जब दिमाग का विकास हो रहा होता है। इस आयु वर्ग में बच्चे सोशल मीडिया पर हिंसा और पोर्नोग्राफी कंटेंट देखते हैं तो इसका सीधा असर उनके दिमाग पर पड़ता है। यह हमेशा के लिए दिमाग में बैठ जाती हैं और बच्चा इसी के अनुरूप व्यवहार करने लगता है।
बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर उठाए सवाल
याचिका में कहा गया था कि सोशल मीडिया पर अनुचित और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री तक बच्चों की बिना रोक-टोक पहुंच उनके संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है। याचिका में यह भी कहा गया कि बच्चों को शोषण से बचाना राज्य का अनुच्छेद 39(एफ) के तहत संवैधानिक दायित्व है।
याचिकाकर्ताओं ने सरकार के 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए युवाओं में सोशल मीडिया की बढ़ती लत और उससे जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का मुद्दा उठाया। याचिका के अनुसार, आर्थिक सर्वेक्षण में डिजिटल लत के दुष्चक्र को रोकने के लिए कुछ उपाय सुझाए गए हैं, लेकिन वे स्वैच्छिक प्रकृति के हैं।
याचिकाकर्ताओं ने इस समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए बाध्यकारी कानून की आवश्यकता जताई।
मेटा ने बाल यौन शोषण सामग्री रोकने के लिए उठाए कदमों की जानकारी दी
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने मेटा की ओर से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बाल यौन शोषण सामग्री को नियंत्रित करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं और बड़ी संख्या में खातों को हटाया गया है।
दातार ने कहा कि कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों को ऐसी गतिविधियों से पूरी तरह रोकना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि तकनीक लगातार विकसित हो रही है। उन्होंने बताया कि आपत्तिजनक सामग्री की पहचान के लिए फोटो डीएनए सहित कई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके बावजूद कुछ सामग्री लीक होकर मीडिया तक पहुंच जाती है।
उन्होंने अदालत को बताया कि फेसबुक पर पर बाल यौन शोषण सामग्री की सक्रिय पहचान दर 99.5 प्रतिशत और इंस्टाग्राम पर 95.2 प्रतिशत है।
याचिकाकर्ताओं ने मेटा के लिए तकनीकी और ऑडिट व्यवस्था की मांग की
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद और अधिवक्ता अंशुल गुप्ता ने पैरवी की। उन्होंने मेटा को आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए तकनीक या ऑडिट प्रणाली लागू करने का निर्देश देने की मांग की।
इस पर कोर्ट ने कहा कि सरकार इन सभी मुद्दों पर विचार करेगी। अदालत ने सरकार को सभी संबंधित पक्षों से परामर्श कर मामले में उचित निर्णय लेने का रास्ता खुला रखा।