आगरा में साइबर ठगी का ‘डिजिटल आतंक’, 19 महीने में 42 करोड़ साफ, 870 से ज्यादा लोग बने शिकार
आगरा में साइबर ठगी का नेटवर्क तेजी से फैल रहा है। बीते 19 महीनों में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 870 से ज्यादा लोगों से करीब 42 करोड़ रुपये ठगे गए। करीब 70 प्रतिशत लोग शेयर, सोना, चांदी और क्रिप्टो में निवेश के लालच में फंसे, जबकि 20 प्रतिशत मामलों में डर और 10 प्रतिशत में फर्जी ऐप का इस्तेमाल किया गया। वर्ष 2025 में आगरा में 29.55 करोड़ रुपये की साइबर ठगी दर्ज हुई और जुलाई 2026 तक यह आंकड़ा 12 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया। पुलिस ने 2025 में 104 साइबर ठगों को गिरफ्तार किया, 7,742 IMEI और 1,928 मोबाइल नंबर ब्लॉक कराए तथा 7 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम पीड़ितों को वापस कराई। डिजिटल अरेस्ट के डर से आगरा में एक शिक्षिका की मौत का मामला भी सामने आया। वहीं जुलाई 2026 में 50 करोड़ रुपये से अधिक की कथित साइबर ठगी वाले फर्जी लिंक नेटवर्क का खुलासा इस खतरे की गंभीरता को सामने लाता है।
पुलिस अधिकारी बनकर डराया, निवेश का लालच दिया और फर्जी ऐप से फंसाया; साइबर पुलिस ने 7 करोड़ से ज्यादा रकम कराई वापस
आगरा। ताजनगरी में साइबर अपराध अब सिर्फ ऑनलाइन ठगी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ठगों ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डर, लालच और फर्जी पहचान का ऐसा जाल बिछाया है कि पढ़े-लिखे लोग भी इसके शिकार हो रहे हैं। बीते 19 महीनों में डिजिटल अरेस्ट और उससे जुड़े साइबर अपराधों में 870 से ज्यादा लोग ठगी का शिकार हुए और करीब 42 करोड़ रुपये गंवा बैठे। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में आगरा में करीब 29.55 करोड़ रुपये की साइबर ठगी हुई, जबकि जुलाई 2026 तक यह आंकड़ा 12 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है।
साइबर अपराधियों ने ठगी के लिए पुलिस अधिकारी, सीबीआई, ईडी, आरबीआई और अन्य सरकारी एजेंसियों के नाम और पहचान का सहारा लिया। पीड़ितों को वीडियो कॉल पर वर्दी या सरकारी अधिकारी जैसी प्रोफाइल दिखाई गई और फिर मुकदमे, गिरफ्तारी या बैंक खाते में अपराध की रकम होने का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करा लिए गए।
70 फीसदी ठगी में निवेश का लालच
आगरा में सामने आए साइबर अपराध के आंकड़े बताते हैं कि ठगी का सबसे बड़ा हथियार लालच बना हुआ है। करीब 70 प्रतिशत लोग शेयर बाजार, सोना, चांदी और क्रिप्टोकरेंसी में भारी मुनाफे के लालच में साइबर ठगों के जाल में फंसे। ठग पहले सोशल मीडिया या व्हाट्सऐप के जरिए संपर्क करते हैं। इसके बाद निवेश के नाम पर पीड़ित को किसी फर्जी ट्रेडिंग ग्रुप या ऐप से जोड़ा जाता है। शुरुआत में मुनाफा दिखाकर भरोसा जीता जाता है और फिर बड़ी रकम निवेश कराने के बाद निकासी के नाम पर टैक्स, कन्वर्जन फीस, सिक्योरिटी मनी या अन्य शुल्क मांगे जाते हैं।
20 फीसदी मामलों में डर बना हथियार
करीब 20 प्रतिशत मामलों में ठगों ने डर का सहारा लिया। पुलिस अधिकारी बनकर फोन किया गया और पीड़ित को बताया गया कि उसका नाम किसी आपराधिक मामले में सामने आया है। इसके बाद गिरफ्तारी, बैंक खाता सीज होने या जेल भेजने की धमकी देकर रकम वसूली गई। यही तरीका डिजिटल अरेस्ट के नाम पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया। पीड़ितों को घंटों वीडियो कॉल पर रहने के लिए कहा जाता है और किसी से बातचीत नहीं करने की हिदायत दी जाती है।
10 फीसदी मामलों में फर्जी ऐप ने फंसाया
करीब 10 प्रतिशत साइबर ठगी के मामलों में फर्जी ऐप का इस्तेमाल किया गया। ठगों ने बैंकिंग, ट्रेडिंग, निवेश या अन्य सेवाओं के नाम पर ऐप डाउनलोड कराया और उसके जरिए पीड़ितों की रकम पर सेंध लगाई। आगरा में जुलाई 2026 में फर्जी लिंक और जनसेवा केंद्र के जरिए 50 करोड़ रुपये से अधिक की कथित साइबर ठगी के एक अंतरराज्यीय गिरोह का खुलासा भी हुआ था। इस मामले में साइबर पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
ठगी के साथ साइबर पुलिस का शिकंजा भी तेज
बढ़ते साइबर अपराध के बीच आगरा साइबर पुलिस ने भी कार्रवाई तेज की है। वर्ष 2025 में 104 साइबर ठगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। साइबर अपराध में इस्तेमाल किए जा रहे 7,742 मोबाइल फोन के IMEI नंबर ब्लॉक कराए गए, जबकि 1,928 मोबाइल नंबर भी ब्लॉक कराए गए। पुलिस की कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ठगी की रकम को वापस कराना भी रहा। साइबर पुलिस ने 7 करोड़ रुपये से अधिक की रकम पीड़ितों को वापस कराने में सफलता हासिल की। वर्ष 2025 के आंकड़ों में आगरा में 29.55 करोड़ रुपये की साइबर ठगी दर्ज होने और 104 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है।
डिजिटल अरेस्ट का खौफ बना जानलेवा
आगरा में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर अपराध का सबसे भयावह मामला एक शिक्षिका की मौत से जुड़ा रहा। साइबर ठगों ने पुलिस अधिकारी की डीपी लगाकर महिला को कॉल किया था और उसे गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी दी थी। ठगों ने महिला को इस कदर डराया कि वह मानसिक दबाव में आ गईं थीं। रिपोर्टों के मुताबिक, इस घटना के बाद उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। यह मामला सामने आने के बाद डिजिटल अरेस्ट के नाम पर चल रहे साइबर अपराध की गंभीरता और भयावहता उजागर हुई।
पुलिस अधिकारी की फोटो लगाकर बना रहे भरोसा
साइबर ठग अब केवल फोन पर पुलिस अधिकारी बनने तक सीमित नहीं हैं। वे वर्दीधारी पुलिस अधिकारियों की तस्वीरों को डीपी बनाकर व्हाट्सऐप कॉल करते हैं। वीडियो कॉल पर पुलिस स्टेशन जैसा बैकग्राउंड दिखाकर पीड़ित को विश्वास दिलाया जाता है कि सामने वास्तव में कोई पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी का अधिकारी है। इसके बाद कहा जाता है कि उनके मोबाइल नंबर, आधार, बैंक खाते या किसी पार्सल का इस्तेमाल अपराध में हुआ है। डर बढ़ाने के लिए फर्जी गिरफ्तारी वारंट या दस्तावेज भी दिखाए जाते हैं।
आगरा में साइबर ठगी के प्रमुख मामले
जुलाई 2026 में आगरा साइबर पुलिस ने फर्जी जनसेवा केंद्र और लिंक के जरिए बैंक खातों से रकम उड़ाने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का खुलासा किया। पुलिस के अनुसार इस नेटवर्क से 50 करोड़ रुपये से अधिक की साइबर ठगी जुड़ी होने की बात सामने आई और दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
डिजिटल अरेस्ट के 185 मामले
वर्ष 2025 के दौरान आगरा में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े 185 मामले दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इसमें साइबर अपराधियों ने पुलिस और जांच एजेंसियों का नाम लेकर लोगों को डराया और उनकी जीवनभर की जमा पूंजी पर निशाना साधा।
क्रिप्टो और निवेश के नाम पर लाखों की ठगी
आगरा में साइबर अपराधियों ने सोशल मीडिया के जरिए क्रिप्टोकरेंसी और निवेश योजनाओं का झांसा देकर लोगों से लाखों रुपये ऐंठे। पहले मुनाफे का भरोसा दिलाया गया और रकम बढ़ने के बाद निकासी रोककर अलग-अलग शुल्क के नाम पर अतिरिक्त रकम वसूली गई।
फर्जी ट्रेडिंग ऐप का बढ़ता जाल
शेयर बाजार में निवेश और कम समय में बड़ा मुनाफा कमाने का सपना दिखाकर लोगों को फर्जी ट्रेडिंग ऐप डाउनलोड कराए जा रहे हैं। शुरुआती दौर में ऐप पर नकली मुनाफा दिखाया जाता है, जिससे पीड़ित बड़ी रकम निवेश कर देता है। इसके बाद पैसा निकालने पर टैक्स या अन्य शुल्क के नाम पर फिर रकम मांगी जाती है।
साइबर ठगों के तीन सबसे बड़े हथियार
आगरा में सामने आए मामलों से ठगी का पैटर्न साफ दिखाई देता है। पहले पीड़ित को लालच दिया जाता है, फिर जरूरत पड़ने पर डराया जाता है और अंत में ठग पुलिस अधिकारी या सरकारी एजेंसी की फर्जी पहचान का इस्तेमाल कर रकम ट्रांसफर करा लेते हैं। यही वजह है कि साइबर विशेषज्ञ लगातार लोगों को चेतावनी दे रहे हैं कि पुलिस, सीबीआई, ईडी या कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट नहीं करती और न ही जांच के नाम पर किसी खाते में पैसे जमा कराने को कहती है।
एक कॉल, एक क्लिक और जिंदगीभर की कमाई खतरे में
आगरा में साइबर अपराध का बढ़ता आंकड़ा बताता है कि डिजिटल दुनिया में सावधानी अब विकल्प नहीं बल्कि जरूरत बन चुकी है। ठग तकनीक के साथ अपने तरीके बदल रहे हैं। कभी निवेश का लालच, कभी रिश्तेदार बनकर कॉल, कभी बैंक अधिकारी और कभी पुलिस अधिकारी बनकर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। यदि कोई व्यक्ति फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे मांगता है तो तुरंत कॉल काटकर संबंधित विभाग से स्वतंत्र रूप से संपर्क करना चाहिए।