जीएसटी कानून बनाम संवैधानिक अधिकार: क्या सुधार की मांग अब अपरिहार्य है?

जीएसटी अधिनियम के कुछ प्रावधान, जैसे एकपक्षीय आदेश के बाद पुनः सुनवाई का अभाव, गिरफ्तारी की व्यवस्था, जीएसटीएन पोर्टल की तकनीकी कमियां और अपील प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 के अनुरूप नहीं हैं। इन प्रावधानों पर पुनर्विचार कर जीएसटी कानून को अधिक सरल, व्यावहारिक, न्यायसंगत और करदाता हितैषी बनाने की आवश्यकता है।

Aug 7, 2026 - 13:21
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जीएसटी कानून बनाम संवैधानिक अधिकार: क्या सुधार की मांग अब अपरिहार्य है?
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पराग सिंहल

भारत के संविधान के अनुच्छेद 246ए, अनुच्छेद 269ए और अनुच्छेद 279ए के अंतर्गत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसी अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था का संवैधानिक आधार निहित है। अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को लागू करने के लिए प्रमुख संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 246ए है, जो संसद तथा राज्य विधानमंडलों दोनों को वस्तुओं एवं सेवाओं पर कराधान (जीएसटी) संबंधी कानून बनाने की समवर्ती शक्ति प्रदान करता है।

वहीं अनुच्छेद 269ए अंतरराज्यीय व्यापार एवं वाणिज्य पर लगाए जाने वाले एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) के अधिरोपण एवं संग्रह का प्रावधान करता है, जिसकी प्राप्ति संघ और राज्यों के बीच निर्धारित व्यवस्था के अनुसार विभाजित की जाती है। अनुच्छेद 279ए के अंतर्गत जीएसटी परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री करते हैं तथा जो कर दरों एवं नियमों के संबंध में केंद्र और राज्यों को सिफारिशें देती है।

इसके अतिरिक्त, संविधान का अनुच्छेद 265 कराधान का मूलभूत सिद्धांत स्थापित करता है कि "कानून के अधिकार के बिना कोई भी कर न तो लगाया जा सकता है और न ही वसूला जा सकता है।" यह सिद्धांत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष—दोनों प्रकार के करों पर समान रूप से लागू होता है।

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) को किसी पृथक संहिता के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है, किंतु इसके मूल सिद्धांत अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी के संबंध में संरक्षण) में गहराई से समाहित हैं।

प्राकृतिक न्याय के दो प्रमुख सिद्धांत हैं। पहला, 'नेमो जुडेक्स इन कॉज़ा सुआ' (Nemo Judex in Causa Sua) अर्थात कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। दूसरा, 'ऑडी ऑल्टरम पार्टेम' (Audi Alteram Partem) अर्थात किसी भी प्रतिकूल निर्णय से पूर्व दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। इसके साथ ही कारणयुक्त (Speaking) आदेश देना भी प्राकृतिक न्याय का महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

अनुच्छेद 14 राज्य की मनमानी के विरुद्ध समान एवं निष्पक्ष व्यवहार की गारंटी देता है। वहीं अनुच्छेद 21 की व्याख्या मेनका गांधी बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक निर्णयों में इस प्रकार की गई कि किसी भी व्यक्ति के जीवन अथवा स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और तर्कसंगत होनी चाहिए। इसी प्रकार अनुच्छेद 22 तथा अनुच्छेद 311 सरकारी सेवकों एवं गिरफ्तार व्यक्तियों के लिए प्रक्रियात्मक संरक्षण और निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं।

अब प्रश्न यह है कि जब जीएसटी कानून अनुच्छेद 246ए, 269ए एवं 279ए के आधार पर बनाया गया, तब क्या अनुच्छेद 14, 21 और 22 जैसे मौलिक अधिकारों तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पर्याप्त ध्यान रखा गया? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जीएसटी अधिनियम की कुछ धाराओं के व्यावहारिक क्रियान्वयन में इन संवैधानिक सिद्धांतों पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है।

यह निर्विवाद है कि प्रत्येक कानून के दो पक्ष होते हैं। जीएसटी व्यवस्था में भी एक ओर पंजीकृत करदाता है तो दूसरी ओर कानून का पालन कराने वाला विभाग। किंतु अधिनियम की कुछ धाराओं के व्यवहारिक संचालन से अनेक प्रश्न उभरते हैं।

उदाहरण के लिए, धारा 61 के अंतर्गत जारी नोटिसों का यदि किसी कारणवश समय पर समुचित उत्तर नहीं दिया जा सके और विभाग द्वारा एकपक्षीय निर्धारण (Ex Parte Order) पारित कर दिया जाए, तो उसके बाद उसी प्राधिकारी के समक्ष पुनः सुनवाई अथवा वाद को पुनः खोलने (Reopening) का कोई स्पष्ट प्रावधान उपलब्ध नहीं है।

पूर्ववर्ती बिक्रीकर एवं व्यापार कर अधिनियम की धारा 30 तथा वैट अधिनियम की धारा 32 में ऐसे मामलों में पुनर्विचार अथवा वाद पुनः खोलने की व्यवस्था थी, जबकि जीएसटी अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। यद्यपि धारा 161 के अंतर्गत आदेश में त्रुटि संशोधन (Rectification) हेतु ऑनलाइन आवेदन का प्रावधान है, किंतु यह पुनः सुनवाई अथवा वाद के पुनः उद्घाटन का विकल्प नहीं है। इस दृष्टि से यह व्यवस्था प्राकृतिक न्याय तथा संविधान के अनुच्छेद 14 के आलोक में विचारणीय प्रतीत होती है।

इसी प्रकार धारा 69 के अंतर्गत गिरफ्तारी का प्रावधान भी गंभीर विमर्श की अपेक्षा रखता है। जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर प्रणाली है, जिसमें पंजीकृत व्यक्ति उपभोक्ता से कर संग्रह कर उसे सरकारी कोष में जमा करता है। ऐसे में गिरफ्तारी के प्रावधान की आवश्यकता, सीमा और औचित्य पर संवैधानिक दृष्टि से पुनर्विचार किया जाना चाहिए, विशेषकर अनुच्छेद 14 एवं 22 के संदर्भ में।

जीएसटी व्यवस्था का संचालन जीएसटीएन पोर्टल के माध्यम से होता है, किंतु व्यवहार में अनेक तकनीकी कमियाँ सामने आती हैं। यदि किसी करदाता से पैन, बैंक खाते अथवा अन्य विवरण दर्ज करने में त्रुटि हो जाए, तो उसका समयबद्ध एवं प्रभावी सुधार संभव नहीं हो पाता। हेल्पडेस्क अथवा टैक्सपेयर सुविधा केंद्रों पर शिकायत दर्ज कराने के बावजूद अनेक मामलों में समाधान नहीं मिल पाता।

इसी प्रकार डीआरसी-03 के माध्यम से कर जमा करते समय यदि गलती से गलत वित्तीय वर्ष का चयन हो जाए और बाद में विभागीय नोटिस प्राप्त होने पर त्रुटि का पता चले, तो करदाता के पास स्वयं उस त्रुटि को सुधारने का कोई प्रभावी तंत्र उपलब्ध नहीं है। यह व्यवस्था भी सुधार की अपेक्षा रखती है।

इसी क्रम में धारा 107 के अंतर्गत अपील दायर करने के लिए विवादित कर की 10 प्रतिशत राशि प्री-डिपॉजिट के रूप में जमा करने की अनिवार्यता भी व्यावहारिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। पूर्ववर्ती कर व्यवस्थाओं में अपील के साथ केवल न्यूनतम न्यायालय शुल्क देय होता था। साथ ही, जीएसटी अधिनियम की उपधारा (11) अपीलीय प्राधिकारी को मामले को पुनः मूल प्राधिकारी के पास भेजने (Remand) के अधिकार से भी वंचित करती है, जबकि पूर्ववर्ती कानूनों में यह व्यवस्था उपलब्ध थी।

स्पष्ट है कि जीएसटी व्यवस्था ने कर प्रणाली को आधुनिक और एकीकृत स्वरूप अवश्य प्रदान किया है, किंतु व्यावहारिक स्तर पर कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिन पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस होती है। जीएसटी परिषद को चाहिए कि वह इन बिंदुओं पर व्यापक समीक्षा कर अधिनियम को अधिक व्यावहारिक, सरल, पारदर्शी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बनाए। साथ ही, करदाताओं की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए उत्तरदायी एवं प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए। यही कर प्रणाली को अधिक न्यायसंगत और विश्वास आधारित बनाने की दिशा में सार्थक कदम होगा।

SP_Singh AURGURU Editor