उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म करने पर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बोले- यह सरकार की ऐतिहासिक गलती

बरेली। उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को समाप्त करने के फैसले को लेकर अब देशभर में सियासी और धार्मिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। आल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “ऐतिहासिक गलती” करार दिया है और धामी सरकार पर इस्लामी शिक्षा को खत्म करने का आरोप लगाया है।

Apr 1, 2026 - 21:02
Apr 1, 2026 - 21:35
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उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म करने पर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बोले- यह सरकार की ऐतिहासिक गलती

मौलाना रजवी ने कहा कि मदरसों पर जिहादी सोच फैलाने के आरोप लगाना और मदरसा बोर्ड को समाप्त करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि देश के इतिहास के साथ भी अन्याय है। उन्होंने दावा किया कि देश की आजादी की लड़ाई में मदरसों से जुड़े लगभग 55 हजार उलेमा और छात्रों ने अपनी जान कुर्बान की थी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हालिया “ऑपरेशन सिन्दूर” जैसे मौकों पर भी मदरसों के उलेमा देश के साथ मजबूती से खड़े रहे हैं।

उन्होंने पुष्कर सिंह धामी को सलाह देते हुए कहा कि बिना इतिहास को समझे इस तरह के बयान देना उचित नहीं है। संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को शिक्षा संस्थानों में सुधार की दिशा में काम करना चाहिए, न कि उन्हें बदनाम करने का प्रयास करना चाहिए।

मौलाना ने आगे आरोप लगाया कि उत्तराखंड सरकार ने करीब 250 मदरसों पर ताले लगवा दिए हैं और 125 सूफी मजारों पर बुलडोजर कार्रवाई की है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई उत्तर प्रदेश में भी नहीं हुई है और उत्तराखंड सरकार इस्लामी धार्मिक शिक्षा को समाप्त करने की दिशा में बढ़ रही है।

दरअसल, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में कहा था कि राज्य में पनप रही “विभाजनकारी सोच” को रोकने के लिए मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1 जुलाई 2026 से मदरसों में भी समान पाठ्यक्रम लागू किया जाएगा, ताकि वहां पढ़ने वाले बच्चे मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़ सकें और देश की प्रगति में योगदान दे सकें।

धामी ने यह भी कहा कि सरकार नहीं चाहती कि कोई भी संस्थान ‘जिहादी सोच’ या अलगाववाद का केंद्र बने। उनके इस बयान के बाद अब यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन गया है, जिसमें अलग-अलग पक्षों से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

यह विवाद अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शिक्षा, धर्म और राजनीति के त्रिकोण में खड़ा एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।

SP_Singh AURGURU Editor