25 दिन में मायावती का यू-टर्न, आकाश आनंद की बसपा में तीसरी बार वापसी

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को महज 25 दिन बाद दोबारा पार्टी में शामिल कर न केवल उनकी राजनीतिक वापसी का रास्ता साफ किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय संयोजक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंप दी है। आकाश आनंद की यह बसपा में तीसरी वापसी है। लगातार बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच मायावती का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे जोर पकड़ रही हैं।

Oct 5, 2026 - 18:32
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25 दिन में मायावती का यू-टर्न, आकाश आनंद की बसपा में तीसरी बार वापसी

राष्ट्रीय संयोजक की मिली कमान, सियासी गलियारों में फिर तेज हुई हलचल, भावुक अपील, बुआ मां से माफी और पार्टी के प्रति निष्ठा जताने का मिला सियासी इनाम

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को महज 25 दिन बाद दोबारा पार्टी में शामिल कर न केवल उनकी राजनीतिक वापसी का रास्ता साफ किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय संयोजक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंप दी है। आकाश आनंद की यह बसपा में तीसरी वापसी है। लगातार बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच मायावती का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे जोर पकड़ रही हैं।

आकाश आनंद की वापसी को केवल पारिवारिक रिश्तों की बहाली के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे पार्टी के भीतर चल रही खींचतान, नेतृत्व को लेकर असहजता, संगठन के गिरते राजनीतिक प्रभाव और आगामी चुनावों की रणनीति जैसे कई पहलू जुड़े दिखाई देते हैं। सवाल यह भी है कि आखिर 25 दिन के भीतर मायावती का रुख कैसे बदल गया और जिस भतीजे को पार्टी से पूरी तरह अलग कर दिया गया था, उसी को फिर से राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी क्यों सौंपनी पड़ी?

भावुक पोस्ट से खुला वापसी का रास्ता, बुआ मां को बताया राजनीतिक गुरु

आकाश आनंद की वापसी की पटकथा दो अक्टूबर को लिखी गई भावुक सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ी मानी जा रही है। आकाश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट साझा करते हुए मायावती को अपना राजनीतिक गुरु, प्रेरणा और 'बुआ मां' बताया था। उन्होंने स्पष्ट किया था कि बहुजन समाज पार्टी ही उनका परिवार है और वे किसी दूसरे राजनीतिक दल में जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते। इस पोस्ट के जरिए आकाश ने एक तरफ मायावती के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की, वहीं दूसरी तरफ पार्टी से अलग होने के बाद पैदा हुई राजनीतिक और पारिवारिक दूरियों को समाप्त करने की कोशिश भी की। उन्होंने अपने ससुर अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास लेने के फैसले का समर्थन करते हुए कहा था कि मिशन और पार्टी से बड़ा कोई रिश्ता नहीं हो सकता।

आकाश ने मायावती की पोस्ट को रीपोस्ट नहीं करने के मामले में भी सफाई दी। उनका कहना था कि उस समय वे सोशल मीडिया से दूर थे। उन्होंने मायावती को हुई किसी भी ठेस के लिए माफी मांगते हुए दोबारा पार्टी की सेवा करने का अवसर मांगा था। राजनीतिक जानकारों की नजर में यह पोस्ट महज भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि पार्टी में वापसी के लिए एक सोची-समझी राजनीतिक पहल भी थी।

अशोक सिद्धार्थ के संन्यास के बाद भी नहीं पिघला था मायावती का रुख

आकाश आनंद और मायावती के बीच विवाद की एक बड़ी वजह उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ की राजनीतिक भूमिका को माना गया। नौ सितंबर को मायावती ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से स्पष्ट संकेत दिया था कि यदि अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास लेते हैं तो आकाश आनंद की जिम्मेदारियां वापस देने पर विचार किया जा सकता है।

इसके बाद 10 सितंबर को अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। हालांकि, मायावती ने इसे देर से उठाया गया कदम माना। उन्होंने आकाश आनंद को पार्टी से पूरी तरह मुक्त करने का फैसला कर दिया। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया था कि विवाद केवल अशोक सिद्धार्थ के राजनीतिक सक्रिय रहने तक सीमित नहीं था, बल्कि पार्टी के भीतर नेतृत्व, अधिकार और निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर असहजता थी। अब 25 दिन बाद आकाश को दोबारा राष्ट्रीय संयोजक बनाना मायावती के बदले रुख का बड़ा संकेत है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बसपा नेतृत्व ने पुराने विवादों को पीछे छोड़कर संगठनात्मक जरूरतों को प्राथमिकता देने का फैसला किया है।

650 करोड़ के पार्टी फंड को लेकर भी थी आकाश की अलग सोच

आकाश आनंद की नाराजगी के पीछे बसपा के कमजोर होते राजनीतिक ग्राफ को लेकर उनकी चिंता भी एक महत्वपूर्ण वजह बताई जा रही है। सूत्रों के हवाले से सामने आए घटनाक्रम के मुताबिक, आकाश ने पार्टी नेतृत्व को सलाह दी थी कि बसपा के पास 650 करोड़ रुपये से अधिक का कोष मौजूद है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी फंड का अधिकतम इस्तेमाल किया जाना चाहिए। आकाश की सोच थी कि चुनाव केवल संगठनात्मक बैठकों और राजनीतिक बयानों से नहीं जीते जाते, बल्कि प्रत्याशियों को मजबूत संसाधन, प्रभावी प्रचार और जमीनी स्तर पर चुनावी सहयोग भी उपलब्ध कराना जरूरी है। हालांकि, मायावती ने उनकी इस सलाह को प्राथमिकता नहीं दी।

यहीं से दोनों के बीच राजनीतिक सोच का अंतर और गहरा होने की चर्चा शुरू हुई। एक तरफ आकाश पार्टी को आक्रामक चुनावी रणनीति और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के जरिए दोबारा मजबूत करना चाहते थे, वहीं दूसरी तरफ मायावती की कार्यशैली में पारंपरिक संगठनात्मक नियंत्रण और अपने तरीके से फैसले लेने की प्राथमिकता दिखाई देती रही।

सादाबाद की रैली में आकाश के तेवरों ने बढ़ाई थी सियासी हलचल

हाथरस के सादाबाद में आयोजित बसपा की रैली भी आकाश आनंद के राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गई। इस रैली में आकाश के भाषण और उनके आक्रामक तेवरों की खूब सराहना हुई। उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया कि आकाश एक बार फिर बसपा की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं। रैली के बाद मीडिया में यह खबर भी सामने आई कि आगामी चुनाव में आकाश आनंद टिकट वितरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यही चर्चा पार्टी के भीतर विरोधी खेमे की सक्रियता का कारण बनी। बताया जाता है कि मायावती तक यह संदेश पहुंचाया गया कि आकाश के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के पीछे अशोक सिद्धार्थ की भूमिका है। इससे पार्टी के भीतर पहले से मौजूद अविश्वास और गहरा गया। नतीजा यह हुआ कि आकाश को संगठनात्मक गतिविधियों से दूर रखने की प्रक्रिया तेज हो गई।

जेवर की सभा बनी विवाद की बड़ी वजह, फैसलों पर लगी थी रोक

आकाश आनंद और मायावती के बीच टकराव का यह पहला मामला नहीं था। इससे पहले भी मायावती दो बार उन पर कार्रवाई कर चुकी थीं। उस समय आकाश की राजनीतिक परिपक्वता और संगठनात्मक अनुभव पर सवाल उठाते हुए उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से अलग कर दिया गया था। जेवर में आयोजित सभा को लेकर भी विवाद सामने आया था। बताया जाता है कि यह कार्यक्रम मायावती की पूर्व अनुमति के बिना तय किया गया था। इस पर मायावती नाराज हो गई थीं। पार्टी के भीतर सक्रिय विरोधी गुट के लोगों ने इस घटनाक्रम को इस तरह प्रस्तुत किया कि आकाश आनंद अपने स्तर पर बड़े फैसले लेने लगे हैं और संगठनात्मक अनुशासन का पालन नहीं कर रहे।

इसके बाद मायावती ने निर्देश जारी किया कि आकाश के भविष्य में होने वाले सभी कार्यक्रमों के लिए उनकी अनुमति लेना अनिवार्य होगा। आकाश को भी स्पष्ट कर दिया गया कि वे किसी कार्यक्रम में शामिल होने से पहले पार्टी प्रमुख की स्वीकृति लें। जेवर की सभा का लाइव प्रसारण पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया पेज पर नहीं किए जाने को भी आकाश के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना गया। इसके बाद 25 अगस्त, 31 अगस्त और तीन सितंबर को आयोजित पार्टी की बैठकों में भी उन्हें नहीं बुलाया गया। इन घटनाओं ने दोनों के बीच बढ़ती दूरी को और स्पष्ट कर दिया था।

'आपके दामाद' वाले संबोधन ने आत्मसम्मान को पहुंचाई थी चोट

इस पूरे विवाद का सबसे भावनात्मक पहलू मायावती की नौ सितंबर की सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा माना जाता है। इस पोस्ट में मायावती ने आकाश आनंद को संबोधित करते हुए 'आपके (अशोक सिद्धार्थ के) दामाद' शब्दों का इस्तेमाल किया था। आकाश के करीबी सूत्रों का दावा है कि यह संबोधन उन्हें बेहद आहत कर गया था। उनके लिए अशोक सिद्धार्थ के दामाद होने से पहले मायावती का भतीजा और बसपा का राजनीतिक कार्यकर्ता होना अधिक महत्वपूर्ण था। अशोक सिद्धार्थ ने भी अपने राजनीतिक संन्यास की घोषणा करते समय इस भावनात्मक पहलू को उठाया था। उन्होंने लिखा था कि आकाश आनंद उनके दामाद बाद में बने, उससे पहले वे मायावती के भतीजे हैं और उनका खून का रिश्ता है। इस घटनाक्रम ने विवाद को राजनीतिक दायरे से आगे बढ़ाकर पारिवारिक और भावनात्मक स्तर तक पहुंचा दिया था। हालांकि, अब आकाश की वापसी के साथ इस पूरे विवाद पर फिलहाल विराम लगता दिखाई दे रहा है।

2027 के चुनाव से पहले बसपा की नई रणनीति या पुराने समीकरणों की वापसी?

आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाना बसपा के लिए एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक फैसला है। पार्टी लंबे समय से अपने कमजोर होते जनाधार और चुनावी प्रदर्शन को लेकर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में युवा चेहरे के रूप में आकाश को आगे करना पार्टी के लिए नई पीढ़ी को जोड़ने और संगठन में नई ऊर्जा पैदा करने का प्रयास माना जा सकता है। आकाश की वापसी से बसपा के युवा कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ने की संभावना है। वहीं, मायावती के लिए भी यह फैसला दोहरी चुनौती लेकर आया है। उन्हें एक तरफ आकाश की राजनीतिक सक्रियता का लाभ लेना होगा तो दूसरी तरफ संगठन पर अपना पारंपरिक नियंत्रण और अनुशासन भी बनाए रखना होगा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार आकाश आनंद को स्वतंत्र रूप से राजनीतिक फैसले लेने का अवसर मिलेगा या उनकी भूमिका पहले की तरह मायावती के निर्देशों और अनुमति तक सीमित रहेगी?

फिलहाल इतना तय है कि आकाश आनंद की तीसरी वापसी ने बसपा की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि मायावती और आकाश की नई राजनीतिक साझेदारी पार्टी को कितना मजबूत कर पाती है। यह वापसी केवल एक नेता की घर वापसी नहीं, बल्कि बसपा के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों और भविष्य की रणनीति का भी संकेत है।