‘वस्तुत्व महाकाव्य’ पर राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी, मुनि समत्व सागर ने कहा—श्रेष्ठ साहित्य ही संस्कृति और राष्ट्र की पहचान सुरक्षित रखता है
आगरा। जैन दर्शन, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण में श्रेष्ठ साहित्य की भूमिका पर छीपीटोला में देशभर के विद्वानों ने मंथन किया। निर्मल सेवा सदन में आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज द्वारा रचित ‘वस्तुत्व महाकाव्य’ पर आयोजित राष्ट्रीय जैन विद्वत संगोष्ठी में प्रमुख जैन विद्वानों ने कृति के दार्शनिक एवं साहित्यिक पक्षों पर विचार रखे। श्रमण मुनिश्री 108 समत्व सागर महाराज, मुनिश्री 108 शील सागर महाराज एवं मुनिश्री 108 सुप्रभात सागर महाराज के ससंघ सानिध्य में हुई संगोष्ठी में सैकड़ों श्रद्धालु और स्थानीय विद्वान मौजूद रहे।
मुनि समत्व सागर महाराज ने कहा कि वही संस्कृति अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकती है, जिसके पास श्रेष्ठ साहित्य और श्रेष्ठ पुरातात्विक संपदा होती है। भारत आज भी विश्व के आकर्षण का केंद्र है तो इसके पीछे देश की पुरातात्विक और साहित्यिक संपदा का महत्वपूर्ण योगदान है। विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में भारत की संस्कृति और परंपरा के प्रति दोबारा रुचि बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि पुरातत्व के माध्यम से भारत के अतीत को देखा जा सकता है, लेकिन संस्कृति को समझने के लिए उसके साहित्य को समझना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि साहित्य ऐसा माध्यम है, जो भविष्य की दिशा दिखाने के साथ वर्तमान के परिप्रेक्ष्य को स्पष्ट करता है और अतीत का दर्पण भी बनता है। इसलिए राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का इतिहास शिलालेखों, हस्तलिखित प्रतियों और ताड़पत्रों पर आचार्य भगवंतों द्वारा रचित साहित्य के माध्यम से आज भी वर्तमान पीढ़ी तक पहुंच रहा है।
मुनि समत्व सागर महाराज ने नवीन साहित्यकारों और विद्वानों से कहा कि साहित्य का सृजन केवल वर्तमान और वर्तमान की भाषा तक सीमित नहीं होना चाहिए। ऐसी कृति तैयार होनी चाहिए जिसे पाठक एक बार पढ़कर रख न दे, बल्कि उसमें निहित सिद्धांत और विषय-वस्तु उसे बार-बार पढ़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि केवल आकर्षक चित्रांकन या बाहरी प्रस्तुति किसी कृति की महत्ता निर्धारित नहीं करती। कृति की वास्तविक महत्ता उसमें निहित सिद्धांतों और विषय-वस्तु से होती है।
उन्होंने कहा कि जिन सिद्धांतों को जिन-दर्शन ने प्रतिपादित किया है, उनका गंभीर अध्ययन और प्रस्तुतीकरण साहित्य को स्थायी महत्व प्रदान करता है। साहित्य में विचार और सिद्धांत जितने गहरे होंगे, वह उतना ही लंबे समय तक समाज और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा।
संगोष्ठी में देश के प्रमुख जैन विद्वानों ने ‘वस्तुत्व महाकाव्य’ के विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे। राष्ट्रीय जैन विद्वान डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, डॉ. अनेकान्त जैन, डॉ. सुरेंद्र जैन भारती, डॉ. वीरसागर जैन, डॉ. अशोक जैन, प्रतिष्ठाचार्य विनोद जी जैन रजवांस, प्रो. अभिषेक जैन दमोह, श्री सुनील जैन ‘संचय’, श्री आशीष जैन शास्त्री, डॉ. नीलम जैन, डॉ. पंकज जैन, श्री महावीर पंडित, विकर्ष शास्त्री जी, मनोज जैन बाकलीवाल सहित अनेक स्थानीय विद्वानों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम का मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और धर्मावलंबी मौजूद रहे।
इस अवसर पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, शैलेश जैन (लालाजी), जगदीश प्रसाद जैन, अनंत जैन, आनंद जैन, आशु जैन (वी.के.), अनिकेत जैन, आशीष जैन (बाबा), सतेंद्र जैन (सोनू), राजू भाई (चचे), अमित जैन, गौरव जैन, पंडित विजय जैन शास्त्री तथा मीडिया प्रभारी राहुल जैन समेत समस्त मंडल और सकल जैन समाज के लोग उपस्थित रहे।