यूपी की चुनावी बिसात पर ओवैसी की दस्तक: बसपा से नजदीकियां बढ़ने के संकेत, यह मेल हुआ तो सपा की चिंता बढ़ेगी, 2027 के रण में क्या एआईएमआईएम बनेगी 'गेम चेंजर'

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। यदि बसपा और एआईएमआईएम के बीच गठबंधन होता है तो मुस्लिम और दलित वोटों का नया समीकरण समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। विपक्ष के भीतर वोटों की नई प्रतिस्पर्धा आगामी चुनाव को और रोचक बना सकती है।

Jun 15, 2026 - 12:58
Jun 15, 2026 - 12:59
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यूपी की चुनावी बिसात पर ओवैसी की दस्तक: बसपा से नजदीकियां बढ़ने के संकेत, यह मेल हुआ तो सपा की चिंता बढ़ेगी, 2027 के रण में क्या एआईएमआईएम बनेगी 'गेम चेंजर'

-एसपी सिंह-

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने शेष हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में एआईएमआईएम प्रमुख एवं सांसद असदुद्दीन ओवैसी का बहराइच दौरा केवल एक जनसभा भर नहीं था, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने का स्पष्ट संकेत था।

ओवैसी का लक्ष्य केवल कुछ सीटें जीतना नहीं दिखता, बल्कि वह उस मुस्लिम वोट बैंक में हिस्सेदारी चाहते हैं, जिस पर पिछले एक दशक से समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत दावा रहा है। यही वजह है कि उनका यह दौरा सपा के लिए सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि संभावित चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

समाजवादी पार्टी पहले ही कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। इसके पीछे सबसे बड़ा राजनीतिक गणित यही रहा कि विपक्षी मतों, विशेषकर मुस्लिम वोटों का बिखराव न हो। लेकिन ओवैसी की सक्रियता इस रणनीति के सामने नई चुनौती खड़ी करती दिखाई दे रही है।

बहराइच की सभा में ओवैसी ने जिस तरह गठबंधन को लेकर कहा कि समय आने पर सब होगा, उसे राजनीतिक हलकों में एक खुला संदेश माना जा रहा है। यह संदेश खुले तौर पर तो सपा और बसपा के लिए नजर आता है, लेकिन खासतौर पर यह बहुजन समाज पार्टी की ओर संकेत करता दिखता है। लंबे समय से ऐसी चर्चाएं हैं कि एआईएमआईएम और बसपा के बीच संवाद जारी है। यदि यह संवाद चुनावी समझौते में बदलता है तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण काफी बदल सकता है।

बसपा के पास आज भी एक मजबूत और स्थायी दलित वोट बैंक है। यदि इस आधार में ओवैसी का मुस्लिम समर्थन जुड़ता है तो कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला बन सकता है। इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी के पारंपरिक सामाजिक गठजोड़ पर पड़ सकता है। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रोहिलखंड, पूर्वांचल और तराई क्षेत्र की उन सीटों पर, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बसपा की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए ओवैसी का साथ उसके खिसकते जनाधार को फिर से मजबूत करने का माध्यम बन सकता है। उधर ओवैसी भी बसपा समर्थक वोट बैंक की मदद से यूपी में अपनी जमीन तैयार कर सकते हैं।

हालांकि यह भी उतना ही सच है कि उत्तर प्रदेश में ओवैसी की पार्टी अब तक चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकी है। इसके बावजूद उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। बिहार में एआईएमआईएम ने सीमांचल क्षेत्र में लगातार अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई है। महाराष्ट्र में भी पार्टी ने पहले लोकसभा और अब विधानसभा में प्रतिनिधित्व हासिल किया है। कई राज्यों में ओवैसी ने यह साबित किया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद वह मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के सामने इस चुनाव का महत्व असाधारण है। लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद यह चुनाव उसके राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक माना जा रहा है। ऐसे में सपा शायद ही चाहेगी कि उसके पारंपरिक समर्थन आधार में किसी प्रकार की सेंध लगे। यही कारण है कि आने वाले महीनों में सपा की रणनीति केवल भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने पर भी केंद्रित रह सकती है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या अखिलेश यादव अपने खेमे में असदुद्दीन ओवैसी को ला सकते हैं। 

भाजपा के लिए भी यह घटनाक्रम राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। विपक्ष जितना अधिक बिखरेगा, भाजपा को उतना ही लाभ मिलने की संभावना रहेगी। यदि मुस्लिम वोट तीन हिस्सों- सपा, बसपा-ओवैसी और अन्य दलों में बंटते हैं, तो कई सीटों पर मुकाबले का गणित पूरी तरह बदल सकता है।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ओवैसी उत्तर प्रदेश में कितना प्रभाव छोड़ पाएंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उन्होंने चुनावी बहस का नया केंद्र बना दिया है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि क्या बसपा वास्तव में उनके साथ हाथ मिलाती है, समाजवादी पार्टी इसका क्या जवाब देती है और क्या ओवैसी उत्तर प्रदेश में भी बिहार जैसी राजनीतिक जमीन तैयार कर पाते हैं।

यूपी की 2027 की चुनावी लड़ाई केवल भाजपा बनाम विपक्ष नहीं रह गई है। अब विपक्ष के भीतर भी नेतृत्व, सामाजिक आधार और वोटों की हिस्सेदारी की नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। इस नई बिसात पर असदुद्दीन ओवैसी एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में उभर रहे हैं, जिनकी मौजूदगी चुनावी परिणामों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव डाल सकती है, भले ही उनकी पार्टी सीटों की संख्या में बड़ी सफलता हासिल करे या नहीं।

SP_Singh AURGURU Editor