मायावती के भतीजे आकाश आनंद पर सियासी दांव तेज, कई दलों ने खोले दरवाजे

बसपा से आकाश आनंद को पूरी तरह अलग किए जाने के बाद निषाद पार्टी के संजय निषाद, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद और कांग्रेस की ओर से उन्हें अपने साथ आने के संकेत/न्योते मिले हैं। हालांकि आकाश ने अभी किसी दल में जाने की घोषणा नहीं की है। आकाश को लेकर 2024 से 2026 तक बसपा नेतृत्व के फैसलों में कई बदलाव हुए हैं। इसी के साथ पार्टी के घटते वोट शेयर और उत्तराधिकार को लेकर बने असमंजस ने 2027 से पहले बसपा के सामने संगठनात्मक स्थिरता और राजनीतिक पुनर्स्थापन की चुनौती बढ़ा दी है।

Sep 23, 2026 - 13:55
Sep 23, 2026 - 19:33
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मायावती के भतीजे आकाश आनंद पर सियासी दांव तेज, कई दलों ने खोले दरवाजे
जब बसपा सुप्रीमो ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, यह तबका फोटो है।

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से आकाश आनंद को पूरी तरह अलग किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई सियासी हलचल तेज हो गई है। मायावती के इस फैसले के बाद आकाश आनंद को अपने साथ जोड़ने के लिए अलग-अलग राजनीतिक दलों की ओर से सार्वजनिक तौर पर संकेत और न्योते सामने आने लगे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आकाश को लेकर यह सक्रियता इस बात को रेखांकित करती है कि विभिन्न दल बहुजन राजनीति और दलित मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश में हैं।

आकाश आनंद को लेकर सबसे पहले निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद की ओर से खुला संदेश सामने आया। उन्होंने आकाश से मुख्यधारा में आने की अपील करते हुए अपनी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। रिपोर्टों के मुताबिक निषाद ने उन्हें सम्मान और उनकी पसंद की जिम्मेदारी देने की बात भी कही थी।

इसके बाद आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी आकाश आनंद को अपनी पार्टी में आने का खुला न्योता दिया। चंद्रशेखर ने आकाश को अपना छोटा भाई बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी के दरवाजे उनके लिए खुले हैं। यह प्रस्ताव इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि चंद्रशेखर आजाद खुद दलित राजनीति में एक अलग राजनीतिक मंच खड़ा कर चुके हैं।

कांग्रेस की ओर से भी आकाश आनंद को साथ आने का प्रस्ताव सामने आया है। कांग्रेस नेता उदित राज ने उन्हें पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया। वहीं समाजवादी पार्टी समेत अन्य दलों की ओर से भी आकाश को लेकर राजनीतिक दिलचस्पी की खबरें सामने आई हैं। इस तरह बसपा से बाहर होने के बाद आकाश आनंद को लेकर अलग-अलग राजनीतिक खेमों में संपर्क और संभावनाओं की चर्चा शुरू हो गई है।

हालांकि इन तमाम राजनीतिक संकेतों और न्योतों के बावजूद आकाश आनंद ने अभी तक किसी दूसरे दल में शामिल होने की घोषणा नहीं की है। ऐसे में उनकी अगली राजनीतिक दिशा फिलहाल स्पष्ट नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वह किसी स्थापित राजनीतिक दल का मंच चुनते हैं, अपना अलग रास्ता बनाते हैं या कुछ समय के लिए सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं।

बार-बार फैसले बदलने से बसपा के सामने चुनौती

आकाश आनंद प्रकरण को केवल एक नेता के पार्टी से बाहर होने के तौर पर देखना बसपा की मौजूदा स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं देता। पिछले करीब ढाई वर्षों में आकाश को लेकर पार्टी नेतृत्व के फैसलों में कई बार बदलाव देखने को मिला है। जून 2024 में उन्हें मायावती का राजनीतिक उत्तराधिकारी और राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया था। इसके बाद मार्च 2025 में उन्हें पदों से हटाकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। सार्वजनिक माफी के बाद अप्रैल 2025 में उन्हें फिर पार्टी में जगह दी गई और बाद में उन्हें महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारी भी मिली।

सितंबर 2026 में एक बार फिर आकाश आनंद को पार्टी की जिम्मेदारियों से दूर कर दिया गया और 11 सितंबर को मायावती ने उन्हें पार्टी से पूरी तरह मुक्त किए जाने की घोषणा की। इसके बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर नए समीकरण बनते दिखाई दिए। हालिया फैसलों में परिवार के दूसरे सदस्यों को लेकर भी रुख में बदलाव सामने आया है।

इन लगातार बदलावों का राजनीतिक असर संगठन की स्थिरता, नेतृत्व की स्पष्टता और कार्यकर्ताओं के बीच संदेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर तब, जब 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। हालांकि इसका वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, यह आने वाले महीनों में संगठन की सक्रियता, उम्मीदवार चयन, सामाजिक समीकरण और मतदाताओं के रुझान पर निर्भर करेगा।

बसपा के सामने एक दूसरी बड़ी चुनौती उसका घटता चुनावी आधार भी है। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर 22.23 प्रतिशत था, जबकि 2022 में यह घटकर करीब 12.88 प्रतिशत रह गया। इसी तरह लोकसभा चुनावों में भी पार्टी के वोट शेयर में गिरावट दर्ज हुई—2019 में करीब 19.43 प्रतिशत से 2024 में करीब 9.39 प्रतिशत।

ऐसे में आकाश आनंद का पार्टी से अलग होना बसपा के लिए केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के नेतृत्व, उत्तराधिकार और दलित राजनीति में पार्टी की भविष्य की भूमिका से जुड़ा सवाल भी बन गया है। दूसरी ओर, विभिन्न दलों की ओर से आकाश को मिल रहे न्योतों से यह संकेत जरूर मिलता है कि दूसरे राजनीतिक खेमे उनके संभावित प्रभाव और बहुजन राजनीति में उनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आकाश आनंद अपनी अगली राजनीतिक पारी किस दिशा में ले जाते हैं और बसपा अपने संगठन तथा नेतृत्व को किस तरह स्थिर करती है। बार-बार बदलते फैसलों के बाद अब पार्टी के सामने 2027 से पहले एक स्पष्ट और स्थायी राजनीतिक रोडमैप तैयार करने की चुनौती है।