तुलसी की रामकथा में लोकमंगल का उजास और समन्वय व प्रेम से सजे समाज का आदर्श, तुलसी जयंती पर नागरी प्रचारिणी सभा में वक्ताओं ने रामचरितमानस के लोकमंगलकारी स्वरूप और तुलसी की भक्ति भावना को किया रेखांकित
आगरा। रामचरितमानस केवल रामकथा नहीं, बल्कि लोकमंगल, प्रेम, समन्वय और सामाजिक जीवन के आदर्शों का ऐसा विराट आख्यान है, जिसमें परिवार से लेकर समाज और राजा-प्रजा के संबंधों तक जीवन के विविध पक्षों को एक सूत्र में पिरोया गया है। तुलसी जयंती के अवसर पर नागरी प्रचारिणी सभा आगरा द्वारा आयोजित समारोह में वक्ताओं ने गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य में निहित इसी लोकमंगलकारी दृष्टि और समन्वय की भावना को वर्तमान समाज के लिए भी प्रासंगिक बताया।
प्रेम और समन्वय से होता है लोकमंगल : प्रो. बीना शर्मा
मुख्य वक्ता केंद्रीय हिंदी संस्थान की प्रो. बीना शर्मा ने कहा कि लोकमंगल के लिए समाज में परस्पर प्रेमभाव और समन्वय की भावना आवश्यक है। रामचरितमानस प्रारंभ से अंत तक समन्वय का काव्य है। जहां परिवार के सदस्यों के बीच परस्पर प्रेम और मेल-भाव होता है, वहां परिवार में मंगल ही मंगल होता है।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास जी की रामकथा केवल धार्मिक आख्यान के रूप में सीमित नहीं है, बल्कि उसमें समाज को जोड़ने और जीवन में समरसता स्थापित करने का व्यापक संदेश दिखाई देता है।
रामचरितमानस में जीवन के हर संबंध का समन्वय : डॉ. खुशीराम शर्मा
समारोह के अध्यक्ष एवं नागरी प्रचारिणी सभा के सभापति डॉ. खुशीराम शर्मा ने कहा कि रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने राजा और प्रजा, गुरु और शिष्य, गृहस्थ और संन्यासी तथा विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच परस्पर समन्वय का चित्र प्रस्तुत किया है। यह समन्वय मानस को केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन के विविध संबंधों को समझने और उन्हें संतुलित करने वाली कृति बनाता है।
लोकहित की भावना से रचा गया तुलसी साहित्य : प्रो. चंद्रशेखर शर्मा
नागरी प्रचारिणी सभा के मंत्री प्रो. चंद्रशेखर शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य की रचना समाज के हित के लिए ही की जाती है। तुलसीदास जी ने भी अपने समस्त काव्य का सृजन लोकमंगल की भावना से किया। इसी कारण उन्होंने अपने महाकाव्य के लिए रामकथा जैसे लोकहितकारी विषय का चयन किया।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास जी का साहित्य समाज को दिशा देने के साथ उसकी संवेदना और सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करता है।
दास्य और दैन्य भाव में रची तुलसी की भक्ति : प्रो. कमलेश नागर
संचालन करते हुए उप सभापति प्रो. कमलेश नागर ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी की भक्ति भावना मुख्य रूप से दास्य भाव और दैन्य भाव पर आधारित थी। उनकी भक्ति में बाह्य आडंबरों के लिए कोई स्थान नहीं था। हृदय की निर्मलता और अनन्य प्रेम उनकी भक्ति का प्रधान तत्व था।
मानस में दिखता है तत्कालीन समाज का जीवंत चित्र : डॉ. विनोद माहेश्वरी
कार्यक्रम के अंत में सभा के उप सभापति एवं आगरा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. विनोद माहेश्वरी ने कहा कि रामचरितमानस केवल राम की कथा भर नहीं है। रामकथा के माध्यम से तुलसीदास ने तत्कालीन समाज का अत्यंत यथार्थ और सजीव चित्रण किया है। मानस में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों, संबंधों और जीवन मूल्यों की स्पष्ट झलक मिलती है।
सरस्वती वंदना से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ स्वर कोकिला एवं कवि डॉ. शशि तिवारी की सरस्वती वंदना से हुआ। इसके बाद वक्ताओं ने तुलसीदास के साहित्य, रामचरितमानस के सामाजिक सरोकार और उसकी लोकमंगलकारी चेतना पर विचार रखे। पूरे आयोजन में तुलसी साहित्य के प्रति श्रद्धा और उसके सामाजिक संदेश को वर्तमान संदर्भों से जोड़ने का भाव प्रमुखता से दिखाई दिया।
इस अवसर पर डॉ. मधु भारद्वाज, नीरज जैन, डॉ. मधुरिमा शर्मा, डॉ. ब्रज बिहारी लाल शर्मा ‘बिरजू’, डॉ. नीलम भटनागर, डॉ. अनार सिंह ‘अग्र’, रजनी सिंह, सुरेंद्र वर्मा ‘सजग’, लखमी चंद्र, डॉ. रामेंद्र शर्मा रवि, डॉ. अशोक अश्रु, शीलेंद्र शर्मा, दुर्गविजय सिंह ‘दीप’, डॉ. केशव शर्मा, डॉ. यशोयश, रमेश पंडित, देवेश वाजपेयी, डॉ. शीलेंद्र कुमार वशिष्ठ, राजीव सक्सेना, राम अवतार शर्मा और नंद नंदन गर्ग ने भी विचार रखे।