राम मंदिर का चढ़ावा बना चुनावी चक्रव्यूह, यूपी के विधान सभा चुनाव से पहले आस्था के बहाने हिंदुत्व की नई सियासी जंग

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब केवल मंदिर प्रशासन तक सीमित नहीं रह गया है। विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही यह भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच हिंदुत्व की राजनीति का नया अखाड़ा बनता दिख रहा है। विपक्ष इसे भाजपा की जवाबदेही का मुद्दा बना रहा है, जबकि भाजपा इसे उन्हीं दलों का राजनीतिक अवसरवाद बता रही है, जो लंबे समय तक राम मंदिर से दूरी बनाए रहे।

Jun 28, 2026 - 22:17
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राम मंदिर का चढ़ावा बना चुनावी चक्रव्यूह, यूपी के विधान सभा चुनाव से पहले आस्था के बहाने हिंदुत्व की नई सियासी जंग

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी का मामला सामने आते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। यह विवाद अब कानून या मंदिर प्रबंधन से आगे निकलकर चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुका है। छह-सात महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इस मुद्दे को पूरी ताकत से उठाना शुरू कर दिया है। दोनों दलों को लग रहा है कि राम मंदिर से जुड़ा यह विवाद भाजपा को उसी मुद्दे पर घेरने का अवसर दे सकता है, जिसे भाजपा पिछले कई वर्षों से अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और वैचारिक ताकत मानती रही है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो विपक्ष कभी राम मंदिर के मुद्दे पर खुलकर राजनीति करने से बचता था, वही आज राम मंदिर के चढ़ावे और उसकी व्यवस्था पर सबसे अधिक मुखर दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी लगातार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निशाने पर ले रही है। पार्टी की कोशिश यह संदेश देने की है कि जब सरकार राम मंदिर को अपनी उपलब्धि बताती है तो उसकी व्यवस्था में हुई कथित गड़बड़ियों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

दूसरी ओर कांग्रेस इस मुद्दे की राजनीतिक सीमा को उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रखना चाहती। उसकी रणनीति इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि से जोड़ने की दिखाई देती है। कांग्रेस यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि यदि राम मंदिर राष्ट्रीय आस्था का प्रतीक है तो उसकी व्यवस्थाओं पर भी सर्वोच्च स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

विपक्ष की पूरी रणनीति का केंद्र केवल कथित चोरी नहीं, बल्कि हिंदू मतदाता तक अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाना भी माना जा रहा है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा को जिस व्यापक हिंदू समर्थन का लाभ मिला, विपक्ष अब उसी सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि राम मंदिर का मुद्दा अब केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सीधा चुनावी विमर्श बन चुका है।

भाजपा ने भी इस चुनौती का जवाब उतनी ही आक्रामक शैली में देना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी लगभग हर जनसभा में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पुराने राजनीतिक रुख की याद दिला रहे हैं। वह बार-बार कहते हैं कि अयोध्या में रामभक्तों पर गोली चलवाने वाले आज राम मंदिर की चिंता जता रहे हैं। वह यह भी सवाल उठा रहे हैं कि जो लोग वर्षों तक राम मंदिर आंदोलन से दूरी बनाए रहे या आज तक दर्शन के लिए नहीं पहुंचे, वे अब रामभक्तों की भावनाओं की बात कैसे कर रहे हैं।

कांग्रेस पर भी भाजपा का हमला कम तीखा नहीं है। योगी आदित्यनाथ लगातार यह याद दिला रहे हैं कि भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस आज स्वयं को रामभक्त साबित करने की कोशिश कर रही है। भाजपा इस पूरे विवाद को विपक्ष के 'राजनीतिक अवसरवाद' के रूप में स्थापित करने में जुटी है।

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जनता की धारणा होगी। यह सच है कि राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी की खबर ने करोड़ों रामभक्तों को आहत किया है। मंदिर की व्यवस्था पर सवाल भी उठे हैं। लेकिन फिलहाल राजनीतिक माहौल में ऐसा स्पष्ट संकेत नहीं दिखता कि इसका सीधा नुकसान भाजपा के हिंदुत्व समर्थन आधार को होगा। बड़ी संख्या में समर्थक कथित चोरी की जिम्मेदारी मंदिर प्रबंधन या संबंधित व्यक्तियों पर मान रहे हैं, न कि सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर।

यही वजह है कि विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाना भी है कि यह मामला सरकार की राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ा है। दूसरी ओर भाजपा पूरी कोशिश कर रही है कि बहस चोरी से हटकर विपक्ष के पुराने रिकॉर्ड और हिंदुत्व की विश्वसनीयता पर केंद्रित हो जाए।

आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा बार-बार उठेगा। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस इसे चुनाव तक जीवित रखने का प्रयास करेंगी, जबकि भाजपा इसे अपने हिंदुत्व एजेंडे पर हमले के रूप में पेश करेगी। अंततः फैसला मतदाता करेंगे कि वे इस विवाद को मंदिर प्रबंधन की कथित चूक मानते हैं या सत्ता की जवाबदेही का प्रश्न। इतना तय है कि राम मंदिर का चढ़ावा अब केवल धार्मिक विषय नहीं रहा, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लड़ाइयों में से एक बन चुका है।

SP_Singh AURGURU Editor