आईवीएफ में ‘मिसमैच’ पर बढ़ी कानूनी सख्तीः एसीई-2026 में दम्पत्तियों को दी गई हर प्रक्रिया की लिखित जानकारी लेने की सलाह
आगरा। आईवीएफ उपचार में जीन संबंधी ‘मिसमैच’ के सामने आए मामलों के बाद प्रजनन उपचार में कानूनी सावधानियों और मरीजों की सहमति का मुद्दा गंभीरता से उठने लगा है। आगरा में आयोजित एसीई 2026 में इस विषय पर विशेष सत्र हुआ, जिसमें प्रजनन कानून विशेषज्ञ लॉयर राधिका थापर ने दम्पत्तियों को उपचार के दौरान मेडिकल रिपोर्ट खुद देखने, प्रक्रिया की पूरी जानकारी लेने और भ्रूण निर्माण में इस्तेमाल अंडाणु व शुक्राणु अपने या डोनर के होने की जानकारी लिखित में लेने की सलाह दी। विशेषज्ञों ने कहा कि उपचार में पारदर्शिता और स्पष्ट लिखित सहमति भविष्य में होने वाले कानूनी विवाद से बचाव का महत्वपूर्ण आधार है।
आईवीएफ प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी
आईटीसी मुगल में एकेडमी ऑफ क्लीनिकल एम्ब्रियोलॉजिस्ट की ओर से आयोजित तीन दिवसीय एसीई 2026 के विशेष सत्र में आईवीएफ उपचार से जुड़े कानूनी पहलुओं पर चर्चा की गई। दिल्ली से आईं प्रजनन कानून विशेषज्ञ लॉयर राधिका थापर ने कहा कि आईवीएफ उपचार कराने वाले दम्पत्तियों को अपने कानूनी अधिकारों और उपचार की प्रत्येक प्रक्रिया की जानकारी रखनी चाहिए।
उन्होंने सलाह दी कि उपचार के दौरान दम्पत्ति अपनी सभी मेडिकल रिपोर्ट स्वयं देखें और चिकित्सक से प्रत्येक प्रक्रिया को सरल भाषा में समझें। विशेष रूप से भ्रूण निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाले अंडाणु और शुक्राणु दम्पत्ति के अपने हैं अथवा डोनर से लिए गए हैं, इसकी जानकारी स्पष्ट रूप से लिखित रूप में लेना जरूरी है।
डोनर को लेकर दोनों पक्षों की सहमति जरूरी
आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. नरेन्द्र मल्होत्रा ने कहा कि चिकित्सकों की जिम्मेदारी केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि दम्पत्ति को पूरी प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी देना भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने बताया कि कई बार पति या पत्नी में से कोई एक डोनर की सहायता लेने के लिए तैयार होता है, जबकि दूसरा पक्ष या परिवार इस संबंध में पूरी जानकारी नहीं रखता।
ऐसी स्थिति में भविष्य में विवाद की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए डोनर से संबंधित किसी भी प्रक्रिया में दम्पत्ति की स्पष्ट और लिखित सहमति महत्वपूर्ण है।
मेडिकल रिकॉर्ड की जानकारी खुद रखें
विशेषज्ञों ने दम्पत्तियों को सलाह दी कि आईवीएफ उपचार के दौरान केवल मौखिक जानकारी पर निर्भर न रहें। मेडिकल रिपोर्ट, उपचार से संबंधित दस्तावेज और सहमति पत्रों को ध्यान से पढ़ें तथा आवश्यकता होने पर चिकित्सक से सवाल पूछें। उपचार में इस्तेमाल होने वाले अंडाणु और शुक्राणु की उत्पत्ति तथा भ्रूण निर्माण से संबंधित जानकारी को स्पष्ट रूप से दर्ज कराया जाना चाहिए।
बढ़ रहे हैं कानूनी विवाद
आईवीएफ उपचार के विस्तार के साथ इससे जुड़े कानूनी विवादों पर भी चर्चा बढ़ रही है। दिल्ली में सामने आए आईवीएफ ‘मिसमैच’ मामले के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रजनन उपचार जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में किसी भी स्तर पर जानकारी छिपने या भ्रम की स्थिति पैदा होने से गंभीर कानूनी और भावनात्मक विवाद खड़े हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार दम्पत्तियों और चिकित्सकों के बीच स्पष्ट संवाद, उपचार की पारदर्शी प्रक्रिया और लिखित सहमति ऐसे विवादों की संभावना को कम कर सकती है। जागरूकता के साथ चिकित्सकीय और कानूनी जिम्मेदारियों का पालन ही आईवीएफ उपचार को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने का आधार है।