श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी: आस्था की रक्षा के लिए अब कठोर जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान चोरी की घटना केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर आघात है। इस घटना से प्रबंधन, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठते है। इस घटना से सबक लेकर चरित्रवान एवं सत्यापित कर्मियों की नियुक्ति, आधुनिक तकनीक आधारित निगरानी, कठोर दंड, पारदर्शी जांच और धार्मिक संस्थानों में उच्चतम स्तर की ईमानदारी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है।

Jun 20, 2026 - 11:40
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श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की चोरी: आस्था की रक्षा के लिए अब कठोर जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी

-डॊ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

पिछले लगभग पांच सौ वर्षों तक चले संघर्ष, बलिदान और अनगिनत प्रयासों के बाद अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर अस्तित्व में आया। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, भावनाओं और समर्पण से निर्मित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सनातन विश्वास का प्रतीक है। किंतु निर्माण काल से लेकर आज तक समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जिन्होंने इस पवित्र धरोहर के प्रबंधन पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। अब मंदिर के दान में कथित चोरी की घटना ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दान की देखरेख केवल उन पांच-छह लोगों तक सीमित नहीं हो सकती जिनके नाम सार्वजनिक हुए हैं। उनके अतिरिक्त भी अनेक कर्मचारी, अधिकारी, सुरक्षा कर्मी और निगरानी तंत्र इस पूरी व्यवस्था का हिस्सा रहे होंगे। यदि चोरी जैसी घटना लंबे समय तक चलती रही, तो क्या केवल कुछ लोगों को दोषी मान लेना पर्याप्त होगा? जिन लोगों का दायित्व निगरानी करना था, क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनती? यदि किसी स्तर पर लापरवाही, मौन सहमति या मिलीभगत रही है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

समाज का मौन भी कई बार अपराधियों का सबसे बड़ा सहयोगी बन जाता है। यदि लोग सब कुछ देखकर भी चुप रहें, गलत को गलत कहने से बचें और महात्मा गांधी के तीन बंदरों की तरह न कुछ देखें, न कुछ सुनें और न कुछ बोलें, तो अपराधियों के हौसले स्वाभाविक रूप से बढ़ते जाते हैं। यही कारण है कि छोटी-छोटी अनियमितताएँ धीरे-धीरे बड़े घोटालों का रूप ले लेती हैं।

देश में आईएएस, आईपीएस और सेना के अधिकारी बनने से पहले अभ्यर्थियों को अनेक कठिन परीक्षाओं, प्रशिक्षण और सत्यापन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। ऐसे में देश के सबसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों पर नियुक्त होने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए भी चरित्र परीक्षण, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन तथा पृष्ठभूमि की कठोर जांच अनिवार्य क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि संविधान अथवा नियमावली में ऐसी व्यवस्था अब तक नहीं है, तो समय की मांग है कि इसे तत्काल लागू किया जाए। इससे यह दावा नहीं किया जा सकता कि सभी दोषमुक्त होंगे, लेकिन व्यवस्था निश्चित रूप से अधिक विश्वसनीय बनेगी।

दुनिया में कालनेमी जैसे छल करने वाले लोगों की कभी कमी नहीं रही। हर भगवाधारी संत नहीं होता और हर जिम्मेदार व्यक्ति ईमानदार हो, यह भी आवश्यक नहीं। इसलिए केवल व्यक्तियों पर भरोसा करने के बजाय मजबूत व्यवस्था और सतत निगरानी आवश्यक है। मंदिर जैसी पवित्र जगह पर यदि एक रुपये की भी चोरी होती है, तो उसे सामान्य आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ विश्वासघात माना जाना चाहिए। ऐसे मामलों में दोष सिद्ध होने पर तत्काल सेवा से बर्खास्तगी और कठोर कारावास जैसी सजा का प्रावधान होना चाहिए।

भारत जैसे डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश में क्या ऐसे एक प्रतिशत लोग भी नहीं मिल सकते जो भगवान के चरणों में चढ़ाए गए एक-एक पैसे की रक्षा पूरी ईमानदारी से कर सकें? यदि मिल सकते हैं, तो उन्हें ही ऐसी जिम्मेदारियां सौंपी जानी चाहिए।

सिख गुरुद्वारों की व्यवस्थाओं से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जहां सेवा, पारदर्शिता और अनुशासन की मिसाल देखने को मिलती है। इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वे पूर्णकालिक कार्यकर्ता, जिन्होंने पारिवारिक जीवन का त्याग कर सामाजिक जीवन को समर्पित किया है और जिनकी छवि निष्कलंक मानी जाती है, ऐसे लोगों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं। यदि नागा साधु अथवा निहंग जैसे अनुशासित धार्मिक समुदायों को दायित्व सौंपा जाता, तो क्या ऐसी घटनाएं इतनी आसानी से घटित हो पातीं, यह भी विचार का विषय है।

आज स्थिति यह प्रतीत होने लगी है कि हिंदू धार्मिक संस्थानों में अनेक अनियमितताओं को सामान्य मान लिया गया है। चोरी, गबन और वित्तीय गड़बड़ियों की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं, किंतु उन पर कठोर और त्वरित कार्रवाई बहुत कम दिखाई देती है। दान चोरी के मामले में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन क्या अब तक किसी को जिम्मेदारी से हटाया गया? क्या जांच को निष्पक्ष बनाने के लिए संबंधित कर्मचारियों को कार्यमुक्त किया गया? यदि नहीं, तो ऐसी जांच की निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

हमारी व्यवस्था कई बार गंगा के गंदे जल को थोड़ा-थोड़ा निकालकर उसमें नया जल भरने जैसी प्रतीत होती है। इससे गंदगी पूरी तरह समाप्त नहीं होती, बल्कि उसका कुछ अंश नए जल में भी मिल जाता है। यदि व्यवस्था को वास्तव में स्वच्छ बनाना है, तो आधे-अधूरे सुधारों के बजाय व्यापक परिवर्तन करने होंगे।

राम मंदिर में प्रत्येक दस फीट पर सुरक्षा गार्ड तैनात हैं। अनेक सीसीटीवी कैमरे और निगरानी व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसके बावजूद यदि चोरी हुई है, तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं पूरी प्रणाली में गंभीर खामी रही है। ऐसी स्थिति में मंदिर परिसर में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी, स्वयंसेवक, सुरक्षा कर्मी और अधिकारी को तत्काल हटाकर उनकी जगह नए, स्वच्छ छवि वाले लोगों की नियुक्ति करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। जिनकी तत्काल आवश्यकता न हो, उन्हें मंदिर परिसर से पाँच किलोमीटर दूर तैनात रखा जाए ताकि अनावश्यक भीड़ और संपर्क सीमित रहे।

तकनीक का अधिकतम उपयोग भी समय की आवश्यकता है। आधुनिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और उनकी निगरानी केवल स्थानीय स्तर पर न होकर देश के तीन-चार अलग-अलग शहरों में बैठी स्वतंत्र टीमों द्वारा भी लगातार की जाए। मंदिर के आसपास के क्षेत्रों की भी प्रभावी निगरानी सुनिश्चित हो। इस पर कुछ अतिरिक्त व्यय अवश्य होगा, लेकिन यदि इससे सैकड़ों करोड़ रुपये के दान की सुरक्षा सुनिश्चित होती है और श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहता है, तो यह निवेश अत्यंत उचित माना जाएगा।

मंदिर की व्यवस्था से जुड़े कार्यों में स्थानीय श्रद्धालुओं, तकनीकी विशेषज्ञों और सेवा भावना से जुड़े अनुभवी वरिष्ठ नागरिक संगठनों की भी भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। संभव है कि अनेक लोग बिना किसी पारिश्रमिक के केवल भगवान की सेवा के भाव से यह दायित्व निभाने के लिए तैयार हो जाएं।

साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मंदिर परिसर और उसके आसपास नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति अत्यंत मृदुभाषी, संयमी और संवेदनशील हो। वह स्वयं किसी श्रद्धालु के साथ अभद्र व्यवहार न करे और न किसी अन्य को ऐसा करने दे। भारत जैसे विशाल देश में ऐसे हजारों लोग अवश्य मिल सकते हैं जो अपनी ईमानदारी, सेवा भावना और समर्पण से राम मंदिर की गरिमा को और ऊँचा उठाएं तथा भगवान के चरणों में अर्पित एक-एक पैसे की पूरी निष्ठा से रक्षा करें।

राम मंदिर केवल पत्थरों का बना भव्य भवन नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए यहां पारदर्शिता, जवाबदेही और शुचिता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक दायित्व भी है। यदि इस पवित्र स्थान की व्यवस्था को आदर्श बनाना है, तो अब आधे-अधूरे उपायों से आगे बढ़कर कठोर, पारदर्शी और तकनीक आधारित सुधार लागू करने होंगे।

SP_Singh AURGURU Editor