जिस तकनीक को देश ने ठुकराया, उसी से आज गूंज रही किलकारियां: एसीई-2026 में कोलकाता की डॉ. इंद्राणी लोध ने साझा की डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय की दर्दनाक कहानी- उपेक्षा ने तोड़ दिया था इस वैज्ञानिक का हौसला
आगरा। जिस तकनीक को उसके जन्मदाता के अपने देश में कभी संदेह, उपेक्षा और प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ा, वही तकनीक आज दुनिया भर में निःसंतान दंपत्तियों के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बनी हुई है। भारत में आईवीएफ की ऐतिहासिक सफलता के पीछे वैज्ञानिक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय का महत्वपूर्ण योगदान था। 3 अक्टूबर 1978 को कलकत्ता में जन्मी दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी दुर्गा के जन्म में उनकी विकसित ‘स्टिम्युलेशन साइकिल आईवीएफ’ तकनीक का इस्तेमाल हुआ था। लेकिन विडंबना यह रही कि इस उपलब्धि के बाद डॉ. सुभाष को सम्मान और सहयोग के बजाय उपेक्षा, अपमान और प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ा। मानसिक दबाव के बीच उन्होंने आत्महत्या कर ली। आज उसी तकनीक के विकसित स्वरूप से दुनिया भर में लाखों दंपत्तियों के आंगन में किलकारियां गूंज रही हैं।
दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म की कहानी
आईवीएफ तकनीक के इतिहास में 1978 का वर्ष बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इंग्लैंड में 25 जुलाई 1978 को पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ। इसके कुछ ही महीने बाद 3 अक्टूबर 1978 को भारत के कोलकाता में दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ। इस बच्ची का नाम दुर्गा रखा गया।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे भारतीय वैज्ञानिक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने ‘स्टिम्युलेशन साइकिल आईवीएफ’ तकनीक के माध्यम से इस सफलता को हासिल किया। दुर्गा के जन्म ने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल कर दिया था, जहां उस दौर में आईवीएफ के क्षेत्र में इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल हुई थी।
अग्रवाल दंपत्ति के घर पहुंची थी दुर्गा
डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय की तकनीक से अग्रवाल दंपत्ति को कन्या संतान प्राप्त हुई थी, जिसका नाम दुर्गा रखा गया। आज दुर्गा मुंबई में रहती हैं। बताया जाता है कि वह आईवीएफ तकनीक से जुड़े विशेषज्ञों, विशेषकर एम्ब्रियोलॉजिस्ट्स की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं।
आज दुनिया में इस्तेमाल हो रही उनकी तकनीक
कोलकाता से आईं डॉ. इंद्राणी लोध ने एसीई 2026 के दौरान इस ऐतिहासिक घटनाक्रम की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि आज विश्वभर में आईवीएफ के लिए जिस ‘स्टिम्युलेशन साइकिल’ विधि का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है, उसकी बुनियाद डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय के शोध से जुड़ी है।
डॉ. सुभाष ने अंडाणु और शुक्राणु के संरक्षण यानी क्रायो-फ्रीजिंग तकनीक पर भी महत्वपूर्ण शोध किया था। आधुनिक प्रजनन चिकित्सा में अंडाणु, शुक्राणु और भ्रूण के संरक्षण की तकनीक आज बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
शोध को मिला नहीं सम्मान, बढ़ता गया दबाव
डॉ. इंद्राणी लोध के अनुसार जिस समय डॉ. सुभाष ने यह उपलब्धि हासिल की, उस दौर का राजनीतिक और प्रशासनिक वातावरण उनके लिए अनुकूल नहीं था। उन्हें अपने शोध के लिए अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उनके काम को नजरअंदाज किए जाने के साथ उन्हें अपमान और तिरस्कार भी झेलना पड़ा।
लगातार उपेक्षा और मानसिक दबाव के चलते वह गहरे अवसाद में चले गए और अंततः उन्होंने आत्महत्या कर ली। उनकी मौत भारतीय वैज्ञानिक इतिहास का एक बेहद दुखद अध्याय बन गई।
शोध पत्र लेकर जापान जाना चाहते थे, अनुमति नहीं मिली
डॉ. इंद्राणी लोध ने बताया कि डॉ. सुभाष अपने शोध को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने के लिए जापान जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई। जिस शोध को वह दुनिया के सामने रखना चाहते थे, उसे अपने ही देश में उस समय अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका।
दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म की ऐतिहासिक टीम के सदस्य रहे प्रो. बी.एन. चक्रवर्ती के साथ काम कर चुकीं डॉ. इंद्राणी लोध ने कहा कि डॉ. सुभाष के स्वयं भी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि उस समय डॉ. सुभाष को उचित समर्थन और प्रोत्साहन मिला होता तो भारत आईवीएफ के क्षेत्र में और बहुत आगे जा सकता था और संभव है कि उनके योगदान को नोबेल पुरस्कार जैसी अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिलती।
जिस देश ने नकारा, दुनिया ने उसी शोध को अपनाया
डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय की कहानी विज्ञान की उस विडंबना को सामने लाती है, जिसमें अपने समय में किसी शोधकर्ता को पहचान नहीं मिलती, लेकिन वर्षों बाद दुनिया उसी विचार और तकनीक की उपयोगिता को स्वीकार करती है।
आज आईवीएफ तकनीक निसंतान दंपत्तियों के लिए उम्मीद बन चुकी है। भ्रूण विज्ञान, अंडाणु-शुक्राणु संरक्षण और सहायक प्रजनन तकनीकों में लगातार हो रहे विकास ने लाखों परिवारों को संतान सुख का अवसर दिया है। ऐसे समय में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय का योगदान फिर याद किया जाना इस बात का भी संकेत है कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को तत्काल पहचान, स्वतंत्रता और संस्थागत सहयोग मिलना कितना जरूरी है।
डॉ. सुभाष की कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह केवल एक वैज्ञानिक की उपलब्धि और दुखद अंत की कहानी नहीं, बल्कि उस शोध की कहानी है जिसने समय के साथ सीमाएं पार कर लीं। जिस तकनीक को कभी अपने ही देश में पर्याप्त विश्वास नहीं मिला, उसी तकनीक ने बाद में दुनिया के अनगिनत परिवारों के जीवन में उम्मीद और खुशियां पहुंचाईं।