वृन्दावन नाव हादसा: दो और शवों की बरामदगी के साथ मौतों का आंकड़ा 13 हुआ, अभी भी तीन की तलाश जारी, लापरवाही, लचर निगरानी ने ली मासूम तीर्थयात्रियों की जान, ठेकेदार और बोट चालक की गिरफ्तारी तो ठीक, लेकिन क्या अधिकारी इस हादसे के लिए जिम्मेदार नहीं?
वृन्दावन। यमुना नदी में दो दिन पहले केसी घाट पर हुए दर्दनाक नाव हादसे ने प्रशासनिक लापरवाही की भी पोल खोली है। सर्च ऑपरेशन के दौरान दो और श्रद्धालुओं के शव बरामद होने के बाद मृतकों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है, जबकि तीन तीर्थयात्री अब भी लापता हैं। राहत-बचाव कार्य जारी है, लेकिन इस भीषण त्रासदी ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बिना लाइफ जैकेट, क्षमता से अधिक सवारियों और निगरानी के अभाव में चल रही नावों को रोकने में प्रशासन क्यों पूरी तरह नाकाम रहा।
वृन्दावन में यमुना नदी में हुए भीषण नाव हादसे के बाद राहत एवं बचाव कार्य लगातार जारी है। सर्च ऑपरेशन के दौरान रविवार को दो और श्रद्धालुओं के शव बरामद किए गए, जिससे मृतकों की संख्या आधिकारिक तौर पर 13 पहुंच गई है। हादसे वाले दिन देर शाम तक 10 शव निकाले गए थे, जबकि 11वां शव देर रात करीब 2 बजे बरामद हुआ था। अब दो और शव मिलने के बाद यह आंकड़ा और भयावह हो गया है।
अब भी तीन तीर्थयात्री लापता बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश के लिए अभियान युद्धस्तर पर जारी है। बरामद शवों में लुधियाना के जगरांव निवासी ऋषभ शर्मा और अर्बन एस्टेट डुगरी निवासी डिंकी बंसल शामिल हैं। डिंकी बंसल की मां मीनू बंसल की मौत पहले ही हो चुकी थी, जिनका शव शुक्रवार को बरामद कर लिया गया था।
रेस्क्यू ऑपरेशन में पीएसी, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें जुटी हुई हैं। गोताखोर वृन्दावन से लेकर मथुरा के विश्राम घाट तक लगातार सर्च अभियान चला रहे हैं। प्रशासन के अनुसार करीब 10 किलोमीटर के दायरे में नदी के विभिन्न हिस्सों को खंगाला जा रहा है, लेकिन अब भी तीन लोगों का कोई सुराग नहीं मिला है।
रेस्क्यू में आ रही दिक्कतों को देखते हुए हरनौल एस्केप और जानी एस्केप से पानी रोका गया, जिससे यमुना का जलस्तर कम हुआ और इसके बाद तीन और शव बरामद किए जा सके। इसके बावजूद बाकी लापता लोगों की तलाश प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
घटना के बाद आनन-फानन में प्रशासन हरकत में आया है। जिलाधिकारी सीपी सिंह के निर्देश पर वृन्दावन, मथुरा और गोकुल क्षेत्र के नाविकों को 419 लाइफ जैकेट वितरित की जा रही हैं, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि ये कदम पहले क्यों नहीं उठाए गए?
हादसे के बाद प्रशासन ने कार्रवाई का दिखावा करते हुए नाव चालक और लोक निर्माण विभाग के ठेकेदार को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि ठेकेदार ने बिना अनुमति पॉन्टून पुल को हटाया और नाव में क्षमता से अधिक लोगों को बैठाया गया।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। क्या सिर्फ एक नाव चालक और एक ठेकेदार इतने बड़े हादसे के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं? क्या प्रशासन को यह दिखाई नहीं दे रहा था कि वृन्दावन में नावें बिना लाइफ जैकेट के चल रही हैं? क्या क्षमता से ज्यादा सवारियां बैठाना किसी की नजर में नहीं आया?
अगर ठेकेदार बिना अनुमति पुल हटा रहा था, तो लोक निर्माण विभाग का पूरा तंत्र आखिर कर क्या रहा था? क्या किसी अधिकारी को इसकी भनक तक नहीं लगी या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
हकीकत यह है कि हर बार की तरह इस बार भी छोटे लोगों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सियों पर सुरक्षित बैठे हैं। जवाबदेही तय करने की बजाय सिस्टम खुद को बचाने में जुटा है।
यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, निगरानी की कमी और सिस्टम की नाकामी का जिंदा सबूत है। अगर अब भी जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसी त्रासदियां दोहराई जाती रहेंगी और हर बार मासूम जिंदगियां यूं ही खत्म होती रहेंगी।