युद्ध, अहंकार और यथार्थ: क्यों भारत को रहना चाहिए इससे दूर
अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच टकराव सिर्फ युद्ध नहीं बल्कि विचारधाराओं और अहंकारों की लड़ाई है। इसमें यह संदेश दिया गया है कि कुछ युद्ध अपने आप समाप्त होते हैं और भारत जैसे देश के लिए समझदारी इसी में है कि वह इससे दूरी बनाए रखे।
-बृज खंडेलवाल-
आसमान लाल है। सायरन चीख रहे हैं। मिसाइलें रात को चीरती हुई इतिहास पर अपने हस्ताक्षर कर रही हैं। और इसी शोर के बीच एक असहज सवाल सिर उठाता है; क्या हर युद्ध सिर्फ त्रासदी होता है? या कुछ युद्ध इतिहास की अनिवार्य सफाई भी करते हैं?
पश्चिम एशिया सुलग रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान, तीनों आमने-सामने खड़े हैं। यह सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं है। यह अहंकारों की भिड़ंत है। यह विचारधाराओं का टकराव है। यह उन कहानियों का युद्ध है, जिन्हें हर पक्ष सच मानता है और बदलना नहीं चाहता।
वॉशिंगटन और तेल अवीव इसे अस्तित्व की लड़ाई बताते हैं। उनके लिए तेहरान सिर्फ एक देश नहीं, एक खतरा है, परमाणु महत्वाकांक्षाओं से लैस, और पूरे क्षेत्र में फैले अपने नेटवर्क के साथ। हिज़्बुल्लाह, हमास, यमन के हूती; हर मोर्चे पर तनाव, हर दिन एक नई चिंगारी।
उनकी नजर में यह युद्ध कोई विकल्प नहीं, मजबूरी है। लेकिन तेहरान की कहानी अलग है। वह खुद को घिरा हुआ देखता है। प्रतिबंधों से जकड़ा हुआ। सौदे टूटते हुए। वैज्ञानिक मारे जाते हुए। उसके लिए यह प्रतिरोध है; अपनी संप्रभुता, अपनी पहचान, अपने अस्तित्व की रक्षा।
दोनों कहानियाँ आधी सच हैं। और आधी झूठ। अमेरिका लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन इतिहास उसके हस्तक्षेपों से भरा पड़ा है। इज़राइल अपने अस्तित्व का तर्क देता है, लेकिन उस पर अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ने के आरोप भी कम नहीं।
ईरान अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन अपने ही लोगों की आवाज दबाने में पीछे नहीं रहता। धर्म के नाम पर सत्ता का खेल: पुराना, पर अब भी असरदार। तीनों चेहरे अलग हैं। लेकिन आईना एक ही है। और अब वह आईना दरक रहा है।
“रूल्स-बेस्ड ऑर्डर” की बातें खोखली लगने लगी हैं। नियम अब किताबों में नहीं, ताकत के तराजू पर तय हो रहे हैं। दूसरी तरफ, इस्लामी एकता का मिथक भी बिखर चुका है।
सऊदी अरब चुप है। तुर्की अपने हिसाब से चाल चल रहा है। पाकिस्तान संतुलन साध रहा है। “उम्मा” का नारा हकीकत की दीवार से टकराकर लौट आया है। हर देश अपने लिए खेल रहा है। बाकी दुनिया देख रही है।
भारत अपने हित साध रहा है। बेवजह विपक्ष के महाज्ञानी भारत को युद्ध में धकेलना चाहते हैं, मोदी सरकार की किरकिरी करने को। लेकिन भारत की भलाई चुप्पी साधने में ही है। गली के गुंडे भिड़ रहे हों, तो समझदार लोग किनारा कर लेने में ही भलाई समझते हैं।
चीन मौके तलाश रहा है। यूरोप बयान दे रहा है: संतुलित, सधे हुए, और लगभग बेअसर। कोई इस आग में कूदना नहीं चाहता। कोई इस युद्ध का मालिक बनना नहीं चाहता। और शायद यहीं सबसे कड़वी सच्चाई छिपी है। कुछ युद्ध बीच में रुकते नहीं। उन्हें थकना पड़ता है। उन्हें खुद को खत्म करना पड़ता है।
सीज़फायर अच्छे लगते हैं, लेकिन कई बार वे सिर्फ सांस लेने का मौका देते हैं, समाधान नहीं। जब जिद, विचारधारा और बदले की आग बहुत गहरी हो जाए, तो बातचीत भी सतही लगने लगती है। तब बचता क्या है? एक कठोर विकल्प- इंतज़ार।
यह कोई जश्न का आह्वान नहीं है। यह यथार्थ की स्वीकारोक्ति है। इतिहास बताता है; कई बार शांति समझौतों से नहीं, थकान से जन्म लेती है। जब गोलियां इसलिए रुकती हैं क्योंकि चलाने की ताकत नहीं बचती। जब अहंकार इसलिए झुकते हैं क्योंकि उन्हें उठाने वाला ढांचा टूट चुका होता है।
लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी होती है। आम लोग। उजड़े शहर। टूटी अर्थव्यवस्थाएँ। जली हुई धरती। यह आग साफ-सुथरी नहीं होती।
यह सब कुछ जलाती है।
फिर भी, हर युद्ध एक आईना होता है। वह दिखाता है कि ताकत की सीमा क्या है। वह खोलता है कि नैतिकता कितनी लचीली होती है। वह याद दिलाता है कि सबसे ऊँची आवाजें भी अंततः खामोश हो जाती हैं। और जब धुआं छंटेगा: कभी न कभी, तो सिर्फ नक्शे नहीं बदलेंगे। सच भी बदलेंगे।
शायद तब दुनिया थोड़ा समझदार होगी। शायद तब शांति थोड़ी सच्ची होगी। क्योंकि कभी-कभी, इंसान सीखता नहीं; उसे सिखाया जाता।