गाली-गलौज नहीं, संस्कारवान भारतीय चरित्र चाहिए; नारी सृजक है, परिवार को उसकी सबसे पहले जरूरत- जेन जी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नारी सशक्तिकरण पर गोष्ठी में वक्ताओं ने रखे बेबाक विचार, ‘मां जैसा कोई नहीं जीया : एक युग’ पुस्तक का विमोचन

आगरा। जेन जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नारी सशक्तिकरण पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने नई पीढ़ी, तकनीक और बदलते सामाजिक मूल्यों को लेकर बेबाक विचार रखे। शिक्षाविद डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि नारी परिवार और समाज की सृजक है तथा बच्चे की पहली शिक्षक मां होती है। उन्होंने कहा कि गाली-गलौज और उच्छृंखलता को नारी सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता, देश को संस्कारवान भारतीय चरित्र की जरूरत है। कार्यक्रम में डॉ. शशि तिवारी और शिवरंजिनी तिवारी द्वारा संपादित पुस्तक ‘मां जैसा कोई नहीं जीया : एक युग’ का विमोचन किया गया।

Aug 13, 2026 - 20:29
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गाली-गलौज नहीं, संस्कारवान भारतीय चरित्र चाहिए; नारी सृजक है, परिवार को उसकी सबसे पहले जरूरत- जेन जी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नारी सशक्तिकरण पर गोष्ठी में वक्ताओं ने रखे बेबाक विचार, ‘मां जैसा कोई नहीं जीया : एक युग’ पुस्तक का विमोचन
जेन जी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नारी सशक्तिकरण विषय पर गुरुवार को सेठ पदमचंद जैन संस्थान सभागार में आयोजित गोष्ठी में विचार रखतीं डॊ. शशि तिवारी। मंचस्थ हैं अतिथिगण।

सेठ पदम चंद जैन संस्थान के सभागार में आयोजित गोष्ठी में अध्यक्षीय संबोधन देते हुए डॉ. महेश शर्मा ने कहा कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर कई बार केवल खानापूर्ति हो रही है। नारी की भूमिका केवल अधिकारों तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि परिवार और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण हैं। बच्चे की पहली पाठशाला परिवार और पहली शिक्षक मां होती है, इसलिए संस्कारवान पीढ़ी तैयार करने में नारी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह कैलकुलेटर के अत्यधिक इस्तेमाल से गणितीय बौद्धिक क्षमताओं में कमी आई, उसी तरह एआई का अत्यधिक प्रभाव जीवन पर गंभीर असर डाल सकता है, इसलिए तकनीक के उपयोग के साथ उसके प्रभावों को समझना भी जरूरी है। पुस्तक ‘मां जैसा कोई नहीं जीया : एक युग’ के संदर्भ में उन्होंने कहा कि संयोग है कि जीया का जन्म 30 जून को हुआ और 30 जून को ही 95 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। पुस्तक में उनके जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व को शब्दों के माध्यम से सहेजने का प्रयास किया गया है।

मुख्य अतिथि डॉ. गिरधर शर्मा ने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी सदैव सशक्त रही है और उसे देवी का स्वरूप माना गया है। युग बदलने के साथ मान्यताएं भी बदली हैं। आज के समय के अनुरूप नारी को सशक्तिकरण की नई चुनौतियों को स्वीकार करना होगा।

मुख्य वक्ता प्रो. कमलेश नागर ने जेन जी का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर गाली-गलौज करती किशोरियों और युवतियों के व्यवहार को नारी सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता। सड़क पर उच्छृंखल व्यवहार करना नारी सशक्तिकरण नहीं है। उन्होंने कहा कि सशक्तिकरण का अर्थ अधिकारों के साथ जिम्मेदारी, मर्यादा और आत्मसम्मान को समझना भी है।

कार्यक्रम के संचालक दिलीप रघुवंशी ने कहा कि विचार सबके अपने और अलग होते हैं। पुरानी पीढ़ी हमेशा नई पीढ़ी में कमियां निकालती आई है। जेन जी के युवा कई मामलों में पिछली पीढ़ी से बहुत आगे की सोच के साथ चल रहे हैं और उनसे भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

साहित्यकार डॉ. कुसुम चतुर्वेदी ने कहा कि जंतर-मंतर का दृश्य देखकर लगा कि आंदोलन सलीके से नहीं हुआ। इसके लिए आभासी दुनिया भी जिम्मेदार है। जीया को याद करते हुए उन्होंने कहा, कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं, जिनको यादों में ठहर जाने का हुनर आता है। उन्होंने कविता की पंक्तियां सुनाईं—“जब-जब मिली मैं आपसे, मुझको खुशियां मिली अपार, कैसे व्यक्त करूं मैं उनको, जिनका नहीं आर-पार...।

डॉ. ज्योत्सना रघुवंशी ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जीवन में बड़ा बदलाव ला रहा है। महिला सुरक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी एआई का उपयोग हो रहा है। नई तकनीक के साथ कदमताल नहीं करेंगे तो पिछड़ जाएंगे। सोशल मीडिया की ताकत को स्वीकार करना होगा, लेकिन उसके दुष्प्रभावों से भी बचना जरूरी है। मौजूदा परिस्थितियों पर उन्होंने पंक्तियां सुनाईं—“बीच भंवर में फंस गई नैया, खेवनहार कहां पर हो!”

वरिष्ठ साहित्यकार राज बहादुर राज ने कहा कि आज के दौर में शिक्षा के साथ संस्कार भी बेहद जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि वैदिक युग में भारतीय नारी बहुत सशक्त थी। मध्यकाल में आक्रांताओं के शासन के दौरान भारतीय नारी की स्थिति कमजोर हुई।

कवयित्री डॉ. शशि तिवारी ने अपनी मां जीया के व्यक्तित्व और कृतित्व को शब्दों में बयां करते हुए कहा कि यह पुस्तक उनकी वैयक्तिक अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि दुनियाभर की माताओं को समर्पित है।

गायिका-कवयित्री शिवरंजनी तिवारी ने मां को समर्पित कविता प्रस्तुत की। उन्होंने कहा— तुम ही घर की धड़कन थीं, तुम ही परिवार का मान, तुम सब रिश्तों की डोरी, तुम ही आन बान और शान।
गायक परमानंद ने हिंडोला गायकी का प्रस्तुतीकरण करते हुए मल्हार सुनाई, जबकि भगवान स्वरूप ने ढपली पर संगत की।

कार्यक्रम में दो लघु फिल्में भी दिखाई गईं। इनका लेखन, निर्देशन और निर्माण शिवरंजनी तिवारी और मेजर शेखर ने किया।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि प्रो. ब्रजेश रावत मौजूद रहे। ब्रिगेडियर सौरभ तिवारी, कर्नल राजीव तिवारी, रजनी पांडेय, रश्मि शांडिल्य, शिप्रा तिवारी, रूपम, भावना, संजय तिवारी, पं. योगेश शर्मा योगी, अनिल जैन और डॉ. महेश धाकड़, डॉ. विशाल, ममता, कुमकुम रघुवंशी, संजय शर्मा, विनोद दीक्षित, सुधांशु पांडेय, डॉ. नीलम भटनागर, अनिल जैन, संजय गुप्त, शरद गुप्त, राजकुमार दीक्षित, राजेंद्र शर्मा, डॉ. रुचिरा प्रसाद, स्वाति माथुर, श्वेता, जितेंद्र दीक्षित, आचार्य उमा शंकर, अनिल अरोड़ा संघर्ष सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।

SP_Singh AURGURU Editor