मथुरा में मांगी मनौती से जन्मे थे पंडित जवाहर लाल नेहरू
कश्मीरी विप्र पंडित मोतीलाल नेहरू ने पुत्र रत्न (जवाहर लाल ) प्राप्त होने की ख़ुशी में गली भीकचंद्र स्थित मारु गली में कश्मीरी पंडितान नाम से धर्मशाला बनवायी थी, यमुना पूजन और ब्राह्मण सेवा भी की थी। ये आज भी है और बनकली चौबे के परिवार के पास है।
सीपी सिंह सिकरवार
मथुरा। आज देश भर में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उनकी जयंती पर याद किया जा रहा है। कम लोगों को मालूम होगा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म मथुरा में मांगी गई एक मनौती से हुआ था। इसके बाद उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू ने मथुरा में एक धर्मशाला भी बनवाई थी, जो आज भी मौजूद है। इंदिरा गांधी के समय तक नेहरू-गांधी परिवार का इस धर्मशाला से जुड़ाव रहा। उनके वंशजों में से कोई यहां अब नहीं आता।
साहित्यकार डा. अशोक बंसल द्वारा की गयी खोजबीन के अनुसार मोतीलाल नेहरू अपनी पत्नी स्वरूप रानी, जवाहर लाल और कमला के साथ इस धर्मशाला में कई बार आये थे। आज़ादी के बाद इंदिरा गांधी वक्त वक्त पर यहां आई थीं।
सन 1888 में मोतीलाल नेहरू अपनी पत्नी स्वरूप रानी के साथ मथुरा की तीर्थ यात्रा पर आये थे। मथुरा में उनके पुरोहित बनकली चतुर्वेदी ने कश्मीर के ब्राह्मणों की सुविधा के लिए एक धर्मशाला बनबाने का प्रस्ताव रखा था। तब मोतीलाल नेहरू बोले थे, 'यदि मेरे घर में पुत्र पैदा होगा तो वह इस कार्य को अवश्य करेंगे।'
चौबे बनकली ने ''जै यमुना मैया'' का उद्घोष किया और पुत्र रत्न होने का आशीर्वाद दिया। संयोग की बात रही कि 14 नबम्बर 1889 को जवाहर लाल नेहरू का जन्म हुआ। पंडित मोतीलाल नेहरू ने अपना वचन निभाया और अपने मुंशी को इलाहाबाद से मथुरा भेजा।
मुंशी ने यमुना किनारे मारू गली में एक स्थान का चयन किया और दो मंजिला इमारत का निर्माण किया गया। उस समय इस निर्माण पर 32 हजार रुपये का खर्च आया। 19 जुलाई 1908 को मोतीलाल नेहरू मथुरा आये और इस इमारत के गेट पर लगे पत्थर का उदघाटन कर गए। जिस पर उर्दू में आज भी खुदा हुआ है, 'कश्मीरी पण्डितान बहकमाम व् इंतजाम बनकली चौबे।''.
1921 में पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू के साथ यहां आये और तीन घंटे इस धर्मशाला में बिताये। एक अक्टूबर 1927 को स्वरूप रानी नेहरू अपने पुत्र जवाहर और बहूरानी कमला के साथ इस धर्मशाला में आकर ठहरीं। स्वरूप रानी तब यहां 17 नबम्बर तक रुकीं।
बनकली चौबे मोतीलाल और स्वरूप रानी से अपने संबंधों के प्रमाण पत्र हासिल करते रहे ताकि सनद रहे। सभी पत्र बनकली के वंशज राजेंद्र प्रसाद चतुर्वेदी के पास आज भी सुरखित हैं। 25 मार्च 1972 को श्रीमती इंदिरा गांधी ने यहां आकर अपने दादा -दादी का स्मरण किया था।
इसके बाद नेहरूजी के किसी वंशज ने इधर का रुख नहीं किया। हां, एक बार शीला कौल (इंदिरा गांधी की मामी) को इस धर्मशाला में आते गली के लोगों ने जरूर देखा था।
हैरत की बात यह है कि नेहरूजी ने अपनी आत्मकथा ''मेरी कहानी'' में अपने परिवार की इस महत्वपूर्ण घटना का जिक्र नहीं किया है।
राजेंद्र चतुर्वेदी को इमारत के जर्जर होने और नेहरूजी के वंशजों द्वारा कोई आर्थिक मदद न करने का बेहद कष्ट है। जिस कमरे में मोतीलाल अपनी पत्नी के साथ रुके थे। आज उस कमरे में एक गाय का चारा बिखरा पड़ा है।
जब इलाहाबाद का 'स्वराज्य भवन' और 'आनंद भवन' पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हो सकता है तो मथुरा की यह धर्मशाला इतिहास प्रेमियों के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण होनी चाहिए। मथुरा के कांग्रेसियों ने भी इस इमारत के रखरखाव की ओर ध्यान नहीं दिया।