तेजाब से झुलसी मासूम को 28 साल बाद मिला मुआवजा, लेकिन जिंदगी अब भी जख्मों में कैद
-राजीव शर्मा- शाहजहांपुर। इंसाफ की राह कभी-कभी इतनी लंबी होती है कि जिंदगी उसके इंतजार में बीत जाती है। शाहजहांपुर की 15 वर्षीय मासूम पर शादी तोड़ने के कारण तेजाब फेंकने की दिल दहला देने वाली वारदात को पूरे 28 साल बीत चुके हैं। अब जाकर उसे 5 लाख रुपये का मुआवजा मिला है, वह भी तब, जब उसका चेहरा, उसका बचपन, और उसकी पहचान सब कुछ जलकर राख हो चुका है।
थाना सदर बाजार क्षेत्र के अंटा मोहल्ले की रहने वाली जायदा बानो (बदला हुआ नाम) 28 अक्तूबर 1997 की उस रात को कभी भूल नहीं सकी जब मोहल्ले के ही युवक पप्पू ने उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया था। उस समय घर में कोई नहीं था, जायदा चारपाई पर लेटी थी, और बस इतना ‘जुर्म’ हुआ था कि उसके परिवार ने पप्पू से तय शादी तोड़ दी थी।
हमले के बाद उसकी चीखों से गली दहल उठी। पड़ोसी दौड़े, लेकिन तब तक चेहरा और शरीर बुरी तरह झुलस चुके थे। रिपोर्ट दर्ज होते ही आरोपी पप्पू को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, पर पीड़िता की जिंदगी वहीं ठहर गई। दर्द, बेबसी और सामाजिक उपेक्षा के अंधेरे में।
ब्रेव सोल्स फाउंडेशन की संस्थापक शाहीन मलिक, जो खुद भी 2009 में एसिड अटैक झेल चुकी हैं, ने बताया कि पिछले साल जायदा उनके संपर्क में आई। उन्होंने इलाज का जिम्मा उठाया और सरकार से लगातार पत्राचार किया। शाहीन ने बताया कि हमने सैकड़ों पत्र लिखे, अधिकारियों से बात की। तब जाकर इस माह यूपी सरकार ने 4 लाख और केंद्र सरकार ने एक लाख की सहायता दी।
शाहीन कहती हैं कि जायदा की स्थिति अब भी गंभीर है। उसका एक कान काटा गया, शरीर के कई अंग खराब हो चुके हैं और डॉक्टर कैंसर फैलने की आशंका से इलाज जारी रखे हुए हैं।
पीड़िता की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं, लेकिन यह सच्चाई है। जायदा बताती है, मेरे पिता दर्जी थे। दो साल तक बिस्तर पर पड़ी रही। पिताजी ने सारी जमा पूंजी इलाज में खर्च कर दी। जब पैसा खत्म हुआ तो मोहल्ले में चंदा मांगकर ऑपरेशन करवाया। करीब 10 लाख रुपये खर्च हुए। फिर पिताजी का निधन हो गया। मां घरों में काम करती रही, फिर वो भी गुजर गईं। अब भाईयों ने भी मुंह मोड़ लिया है। मैं अकेली रह गई हूं।
संवेदनहीनता की हद यह है कि जिला प्रशासन को पूरे मामले की जानकारी होते हुए भी किसी सरकारी योजना से तत्काल मदद नहीं दी गई। शाहीन मलिक ने कहा कि यह प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी का प्रतीक है। 28 साल तक जिसने अपनी जिंदगी इलाज में लगा दी, उसे महज 5 लाख रुपये देकर सरकार ने जैसे औपचारिकता निभाई है। उन्होंने बताया कि संस्था अब उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगी ताकि जायदा को कम से कम 50 लाख रुपये की सहायता मिले।
जिला प्रोबेशन अधिकारी गौरव मिश्रा ने बताया कि 2014 में रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल कल्याण योजना शुरू हुई थी। इसी योजना के तहत इस वित्तीय वर्ष में पीड़िता को 4 लाख की सहायता दी गई है, जबकि पिछले वर्ष एक लाख रुपये दिए गए थे। हालांकि, जिलाधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गई, पर उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।
जायदा बानो की यह कहानी सिर्फ एक महिला के दर्द की नहीं, बल्कि उस तंत्र की भी पोल खोलती है जो अपराधी को जेल भेजकर अपनी जिम्मेदारी खत्म मान लेता है, जबकि असली सजा तो वह महिला भुगतती है, जो हर सुबह आईने से डरती है और हर रात दर्द से करवटें बदलती है।