आगरा की सभ्यता सिंधु घाटी से भी प्राचीन, इतिहासकारों के शोध में सामने आए नए तथ्य

आगरा और आसपास की सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन होने का निष्कर्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में प्रस्तुत शोध के अध्ययन के दौरान सामने आया। इतिहास एवं संस्कृति विभाग और अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संयुक्त आयोजन में 26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों ने हिस्सा लिया। दो दिनों में 147 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण और प्रमाणों के आधार पर लिखने की जरूरत बताई।

Nov 1, 2026 - 19:33
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आगरा की सभ्यता सिंधु घाटी से भी प्राचीन, इतिहासकारों के शोध में सामने आए नए तथ्य
दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल प्रतिभागी।

आंबेडकर विश्वविद्यालय में दो दिवसीय महिला इतिहासकार राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन, 26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों ने लिया हिस्सा, दो दिनों में 147 शोध पत्रों पर हुआ मंथन

आगरा। ताजनगरी आगरा का इतिहास केवल मुगलकालीन इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत की जड़ें प्राचीन काल तक फैली हुई हैं। आगरा और आसपास के क्षेत्रों की सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन होने का महत्वपूर्ण निष्कर्ष दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में प्रस्तुत शोध और ऐतिहासिक तथ्यों के अध्ययन के आधार पर सामने आया है। इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को विदेशी दृष्टिकोण के बजाय भारतीय सांस्कृतिक चेतना, प्राचीन ज्ञान परंपरा और प्रमाणिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर समझने और लिखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के इतिहास एवं संस्कृति विभाग तथा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय महिला इतिहासकार राष्ट्रीय सम्मेलन एवं राष्ट्रीय सेमिनार का रविवार को समापन हुआ। सम्मेलन के दूसरे दिन देश के विभिन्न राज्यों से आईं महिला इतिहासकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भारतीय सभ्यता, संस्कृति, पुरातत्व, इतिहास लेखन और महिलाओं के ऐतिहासिक योगदान पर विचार साझा किए। दो दिनों में कुल 147 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

भारतीय इतिहास को विदेशी नहीं, भारतीय दृष्टिकोण से लिखने की जरूरत

दूसरे दिन के उद्घाटन सत्र का शुभारंभ राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. बबीता चौहान, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय सह संगठन सचिव संजय कुमार मिश्रा, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की प्रोजेक्ट प्रमुख सुष्मिता पांडे, लखनऊ की श्रद्धा शुक्ला, हैदराबाद की अनुराधा भोसले तथा योजना के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. हेमंत धींग मजूमदार ने दीप प्रज्वलित कर किया।

सेमिनार को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. हेमंत धींग मजूमदार ने कहा कि भारत का इतिहास लिखने वाले लोगों ने देश को उसकी संपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से समझने का पर्याप्त प्रयास नहीं किया। अब समय आ गया है कि भारतीय इतिहास का लेखन भारतीय दृष्टिकोण और ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर किया जाए।

उन्होंने कहा कि अब तक पुस्तकों में भारत का जो चित्रण किया गया है, उसमें भारतीय सभ्यता और संस्कृति की संपूर्ण तस्वीर दिखाई नहीं देती। इतिहास लेखन पर विदेशी और मुगलिया दृष्टिकोण का प्रभाव अधिक रहा है। भारत की वास्तविक सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान परंपरा और गौरवशाली अतीत को शोध के माध्यम से सामने लाना जरूरी है। इसके लिए इतिहासकारों को प्राचीन ग्रंथों, पुरातात्विक साक्ष्यों और ऐतिहासिक तथ्यों का गंभीरता से अध्ययन करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां देश के वास्तविक अतीत और सांस्कृतिक विरासत को समझ सकें।

ब्रज की संस्कृति में छिपे हैं इतिहास के अनेक सूत्र

राष्ट्रीय सह संगठन सचिव संजय कुमार मिश्रा ने ब्रज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ब्रज का इतिहास केवल राजाओं, शासकों और साम्राज्यों की कहानियों तक सीमित नहीं है। यहां की लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था, परंपराओं और जनभावनाओं में भी इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण सूत्र छिपे हुए हैं।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा से जाने के बाद ब्रजवासियों के विरह का भावनात्मक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उनके वियोग में ब्रजवासियों की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी थी। इसी भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि ब्रजवासियों के उन आंसुओं की धारा से ही यहां की धरती के भीतर का पानी खारा हो गया। उन्होंने कहा कि ब्रज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा को समझे बिना यहां के इतिहास का समग्र अध्ययन संभव नहीं है।

आगरा की सभ्यता सिंधु घाटी से भी प्राचीन होने का निष्कर्ष

समापन सत्र में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए इतिहास एवं संस्कृति विभाग के अध्यक्ष तथा भारतीय इतिहास संकलन समिति, ब्रज प्रांत के अध्यक्ष प्रो. बीडी शुक्ला ने दो दिवसीय आयोजन में प्रस्तुत शोध पत्रों और ऐतिहासिक तथ्यों के अध्ययन से सामने आए निष्कर्षों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शोध और विमर्श के दौरान यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आया कि आगरा और उसके आसपास की सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से भी प्राचीन है। यह तथ्य ताजनगरी के प्राचीन इतिहास को नए सिरे से समझने और उसके ऐतिहासिक स्वरूप पर व्यापक शोध की संभावनाएं खोलता है।

प्रो. शुक्ला ने कहा कि भारतीय इतिहास में आर्यों के बाहरी क्षेत्रों से भारत आने और यहां के मूल निवासियों को अनार्य बताने जैसी धारणाओं पर भी नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। इतिहास को किसी पूर्व निर्धारित धारणा के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणों, शोध और समग्र अध्ययन के आधार पर समझा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत 12 ऋतुओं वाला देश है और यहां प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान, दर्शन तथा संस्कृति की समृद्ध परंपरा रही है। भारतीय ज्ञान और सभ्यता का प्रभाव विश्व के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचा है। इसलिए भारतीय इतिहास के अध्ययन में प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक प्रमाणों को समुचित महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी प्रसन्नता जताई कि सम्मेलन में वरिष्ठ इतिहासकारों के साथ शोधार्थियों और स्नातक स्तर के विद्यार्थियों ने भी अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इससे नई पीढ़ी में शोध और इतिहास अध्ययन के प्रति रुचि बढ़ाने का अवसर मिला है।

चार सत्रों में 50 शोध पत्र, दो दिनों में 147 शोध पत्रों पर विमर्श

सम्मेलन के दूसरे दिन चार अलग-अलग सत्र आयोजित किए गए, जिनमें शोधार्थियों ने कुल 50 शोध पत्र प्रस्तुत किए। दो दिवसीय आयोजन में कुल 147 शोध पत्रों पर चर्चा हुई। इनमें लगभग नौ शोध पत्र ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत किए गए। देश के विभिन्न प्रांतों से पहुंचे इतिहासकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भारतीय सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व और महिला योगदान से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने शोध निष्कर्ष और विचार साझा किए। इन सत्रों में इतिहास के अनछुए पहलुओं, प्राचीन परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं के नए विश्लेषण पर विशेष चर्चा हुई।

26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों का एक मंच पर जुटना बड़ी उपलब्धि

विश्वविद्यालय की पूर्व संकाय अध्यक्ष प्रो. हेमा पाठक ने सम्मेलन को विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग की स्थापना के बाद यह पहला अवसर है, जब एक साथ 26 प्रांतों की महिला इतिहासकारों को आमंत्रित कर उनके शोध और विचारों को साझा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर का मंच उपलब्ध कराया गया। उन्होंने कहा कि महिला इतिहासकारों की इतनी बड़ी सहभागिता इतिहास लेखन के क्षेत्र में नए दृष्टिकोण और शोध की संभावनाओं को मजबूत करती है। महिलाओं ने भारतीय इतिहास, संस्कृति और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके योगदान को शोध और प्रमाणों के माध्यम से सामने लाना भी इतिहास लेखन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

प्रमाण पत्र देकर शोधार्थियों को किया सम्मानित

दो दिवसीय महिला इतिहासकार राष्ट्रीय सम्मेलन एवं सेमिनार का समापन शोधार्थियों और प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित करने के साथ हुआ। आयोजन के माध्यम से देशभर के इतिहासकारों, महिला शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और विद्यार्थियों को एक साझा मंच मिला, जहां भारतीय इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ। कार्यक्रम का संचालन अर्चना शर्मा और शिवम ने किया। इस अवसर पर अखिलेश कुमार, डॉ. रोहित, स्वतंत्र कटारा, प्रो. राजन दुबे, प्रो. लवकुश मिश्रा, मीडिया प्रमुख हेमंत द्विवेदी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।