'कॉकरोच' कह देने से खत्म नहीं होती बेरोजगारी, टूटते हैं सपने और बिखरता है आत्मसम्मान

मेहनत और प्रतिभा के बावजूद रोजगार से वंचित युवाओं को अपमानजनक विशेषणों से नवाजना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उनकी पीड़ा को और गहरा करना है। व्यवस्था को दोषियों पर कार्रवाई और अवसरों के न्यायपूर्ण वितरण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

Jul 25, 2026 - 12:43
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'कॉकरोच' कह देने से खत्म नहीं होती बेरोजगारी, टूटते हैं सपने और बिखरता है आत्मसम्मान

डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान—

जरा उन माता-पिता से पूछिए, जिनके होनहार, उच्च शिक्षित और व्यस्क हो चुके बेटे-बेटियां वर्षों की मेहनत के बाद भी रोजगार नहीं पा सके। उनसे पूछिए कि जब उनके बच्चों की पीड़ा को समझने के बजाय उन्हें सार्वजनिक रूप से कॉकरोच जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता है, तब उनके दिल पर क्या गुजरती होगी।

हर माता-पिता के लिए उसका बच्चा उसकी आंखों का तारा होता है। वह अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में जीवन भर की कमाई, उम्मीदें और सपने लगा देता है। ऐसे में यदि व्यवस्था उनकी समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय उन्हें अपमानजनक उपाधियां देने लगे, तो यह केवल युवाओं का नहीं, पूरे समाज के आत्मसम्मान का प्रश्न बन जाता है।

असल सवाल यह है कि गलती आखिर कहां है? क्या वे युवा, जिन्होंने 80, 90 या 95 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए, वास्तव में अयोग्य हैं? या फिर हमारी व्यवस्था उन्हें अवसर देने में असफल रही है? यदि एक मेधावी युवा वर्षों तक नौकरी के लिए भटकता रहे और अंततः उसकी पहचान उसकी योग्यता नहीं बल्कि एक अपमानजनक शब्द बन जाए, तो यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंतन का विषय होना चाहिए।

आज हालात ऐसे हैं कि उच्च शिक्षित युवाओं को चपरासी जैसी नौकरियों के लिए भी लंबी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। डिग्रियों पर डिग्रियां जुड़ती जा रही हैं, लेकिन रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे। ऐसे में निराशा और हताशा स्वाभाविक है। इस पीड़ा को समझने के बजाय यदि उन्हें तिरस्कार का पात्र बना दिया जाए, तो यह स्थिति और भी दुर्भाग्यपूर्ण हो जाती है।

भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अवसरों की असमानता ने अनेक प्रतिभाशाली युवाओं का आत्मविश्वास तोड़ा है। जो आवाज उठाते हैं, कई बार वही सबसे अधिक प्रताड़ना का सामना करते हैं। ऐसे युवाओं और उनके परिवारों के मन पर क्या बीतती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो।

कबीर की यह उक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है—

"जाके पांव न फटी बिवाई,

सो क्या जाने पीर पराई।"

जिसने बेरोजगारी की लंबी रातें नहीं देखीं, जिसने प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता नहीं झेली, जिसने वर्षों तक उम्मीद और निराशा के बीच संघर्ष नहीं किया, वह शायद इस दर्द की गहराई को कभी नहीं समझ पाएगा।

आज यह भी एक कटु सत्य है कि समाज में कुछ लोगों के लिए अवसर सहज उपलब्ध हो जाते हैं, जबकि बड़ी संख्या में युवाओं को केवल अपनी योग्यता के भरोसे संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अवसरों का वितरण पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता आधारित हो।

देश को व्यक्तियों पर टिप्पणी करने से अधिक व्यवस्था को सुधारने की आवश्यकता है। यदि चयन प्रक्रिया पारदर्शी होगी, भर्ती समय पर होगी और योग्यता का सम्मान होगा, तो न युवाओं में निराशा होगी और न समाज में आक्रोश।

जिम्मेदारी किसी भी क्षेत्र की हो- राजनीति, प्रशासन या शासन- उसे निभाने वालों की जवाबदेही भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए। जिस प्रकार वाहन चलाने के लिए सक्षम चालक आवश्यक होता है, उसी प्रकार व्यवस्था चलाने के लिए भी दूरदृष्टि, संवेदनशीलता और जवाबदेही जरूरी है। केवल पद पर बने रहना पर्याप्त नहीं, उस पद के अनुरूप परिणाम देना भी उतना ही आवश्यक है।

बेरोजगारी किसी भी युवा की पसंद नहीं होती। हर युवा सम्मानजनक अवसर चाहता है, दया नहीं; पहचान चाहता है, उपहास नहीं। इसलिए समय की मांग है कि व्यवस्था आत्ममंथन करे, रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता दे और युवाओं के आत्मसम्मान की रक्षा करे। यही राष्ट्रहित में होगा और यही एक मजबूत, आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला भी बनेगा।

SP_Singh AURGURU Editor