ताजमहल के हरे कवच पर कंक्रीट का वार : शाहजहां पार्क पर मंडरा रहा विनाश का खतरा

आगरा का 90 एकड़ हरा-भरा शाहजहां पार्क संस्कृति वन परियोजना के नाम पर उजाड़ा जा रहा है। सौ साल पुराने पेड़ों की जड़ें खोदी जा रही हैं, तितलियों-पक्षियों का घर खत्म हो रहा है और घास पर कंक्रीट- कियोस्क-लाइट पोल का कब्ज़ा बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट और एएसआई की रोक के बावजूद ताजमहल से 500 मीटर के दायरे में निर्माण कार्य हो रहे हैं। पर्यावरणविदों का कहना है यह विकास नहीं, धोखा है। शाहजहां पार्क ताज का प्राकृतिक कवच है, जिसे बचाना शहर की सांसें बचाना है।

Sep 16, 2025 - 12:39
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ताजमहल के हरे कवच पर कंक्रीट का वार : शाहजहां पार्क पर मंडरा रहा विनाश का खतरा

-रिवर कनेक्ट कैंपेन के डॉ देवाशीष भट्टाचार्य ने आज सुबह इस विषय पर मंडलायुक्त को ज्ञापन दिया

-बृज खंडेलवाल-

आगरा फिर से मुश्किल में है। शाहजहां पार्क, जो ताजमहल और आगरा किले के बीच 90 एकड़ का हरा-भरा इलाका है, उसे संस्कृति वन के नाम पर नुकसान पहुंचाने का प्रयास जारी है। सौ साल पुराने पेड़ों का दम घोंटा जा रहा है। तितलियों के ठिकाने खत्म हो रहे हैं। हरी घास को खोदकर कियोस्क और कंक्रीट के रास्ते बन रहे हैं।

ये बात दिल को चुभती है। जिस शहर में ताजमहल जैसा खूबसूरत स्मारक है, वो अपने ही हरे-भरे कवच को काट रहा है। पहले मेट्रो प्रोजेक्ट ने इस पार्क का बड़ा हिस्सा निगल लिया और वहां बंजर पार्किंग लॉट बना दिया। अब आगरा डेवलपमेंट अथॉरिटी (एडीए) एक और हेरिटेज पार्क की बात कर रही है, जो पैसे की लालच और अफसरों के घमंड की तरह लगता है, जैसा 2003 का विवादा ग्रस्त ताज हेरिटेज कॉरिडोर था।

एडीए कहता है कि वो शाहजहां पार्क को थीम पार्क में बदल रहा है। लेकिन उनकी प्लानिंग तो ठेकेदार की लिस्ट जैसी है। छोटे-मोटे स्मारक, स्मार्ट पोल, साउंड सिस्टम, कूड़ेदान, गज़ीबो, कियोस्क, पक्के रास्ते। और ये सब ताजमहल के 500 मीटर के दायरे में, जहां पुरातत्व विभाग और सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा हुआ है कि कोई नया निर्माण नहीं होगा।

कहते हैं ये पार्क ताज और आगरा किले को जोड़ेगा। एक हरा रास्ता बनेगा, लेकिन इसमें हरा क्या बचा? एडीए खुद मानता है कि ये टूरिज्म के लिए है। यानी कंक्रीट, भीड़, दुकानें और हंगामा। वहां, जहाँ पर्यावरण को बचाने वाला बफर ज़ोन होना चाहिए था।

इस प्रोजेक्ट की कहानी भी शक पैदा करती है। ये 2016-18 के वर्ल्ड बैंक के हेरिटेज वॉकवे प्लान का पुराना माल लगता है, जिसे चुपके से बंद कर दिया गया था। अब वही आइडिया फिर से निकाला गया और उसे कमर्शियल बना दिया गया।

पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं गैरकानूनी काम तो साफ़ दिखता है। पुरातत्व विभाग का नियम है कि ताज के 500 मीटर के दायरे में कुछ बन नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा कि इस इलाके को स्मारक के नाज़ुक माहौल के लिए बरकरार रखना है। फिर भी, कंस्ट्रक्शन चल रहा है। कैसे? क्योंकि जब सरकार हरी झंडी दे देती है, तो स्थानीय आवाज़ को कुचल दिया जाता है।

स्थानीय बागवानी विभाग ने नुकसान भांप कर आपत्ति दायर की है। पर्यावरणवादी चीख रहे हैं। लेकिन एडीए को सियासी सपोर्ट मिला हुआ है। लखनऊ से मंजूरी की मोहर लगती है, और आगरा कीमत चुकाता है।

सबसे दुखद है जो खो रहा है। सौ साल पुराने पेड़ों की जड़ों के पास गड्ढे खोदे जा रहे हैं। घास, जो कीड़ों और तितलियों का घर थी, उजाड़ दी गई। पार्क में ढेर सारे पक्षी और परागणक थे। अब सब गायब, सिर्फ़ कियोस्क और लाइट पोल के लिए।

मेट्रो प्रोजेक्ट में हम देख चुके हैं। पेड़ काटे गए, कुछ दूसरी जगह लगाए गए, ज्यादातर मर गए। पार्क का वो हिस्सा अब गर्मी उगलने वाली पार्किंग है। छांव की जगह कंक्रीट ने ले ली। शहर का माहौल और खराब हो गया। अब शाहजहां पार्क का बाकी हिस्सा भी उसी रास्ते पर है। याद दिल दें शाहजहां पार्क के बगल में रोड पर रेत बजरी के हजारों ट्रोला डेली रात में गुजरते हैं, इसके अतिरिक्त टूरिस्ट बसें और कार आदि यात्री वाहन इसी क्षेत्रों प्रदूषण फैलाते हैं। शाह जहां काफी पॉल्यूशन सोख लेता है, मगर हरियाली का एरिया ही अगर घट जाएगा तो भविष्य में दिक्कत होगी।

और तो और एडीए ने पेड़ काटने की सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी तक नहीं ली। मेट्रो के दौरान गायब हुए पेड़ों का हिसाब भी नहीं दिया। इस चुप्पी से फायदा किसे? ठेकेदारों, दुकानदारों और नेताओं को, जो रिबन काटने को तैयार बैठे हैं।

बायो डायवर्सिटी एक्सपर्ट डॉ मुकुल पांड्या कहते हैं, संस्कृति वन का नाम तो बस मज़ाक है। संस्कृति कियोस्क और प्लास्टिक की बेंच से नहीं बनती। हेरिटेज की इज्जत नकली स्मारकों से नहीं होती। और पर्यावरण को मेले की तरह सजाकर नहीं बचाया जाता। ये विकास नहीं, धोखा है—आगरा के लोगों का, शहर की प्रकृति का, और ताजमहल का। ताज सिर्फ़ संगमरमर की इमारत नहीं। उसे पेड़ों, घास और खुली जगह की ज़रूरत है। ये सब छीन लिया, तो ताज की रूह छिन जाएगी।

शाहजहां पार्क को चुपके से मरने नहीं दे सकते। आगरा के लोग, पर्यावरणवादी और हेरिटेज चाहने वालों को एकजुट होना होगा। आगरा ने मेट्रो, हाईवे और पार्किंग की वजह से पहले ही बहुत हरे-भरे इलाके खो दिए। अब और नहीं।

संदेश साफ़ है: विकास का मतलब तबाही नहीं। कुछ पौधे लगाकर सौ साल पुराने पेड़ों की ठंडक और कार्बन सोखने की ताकत को नहीं बदला जा सकता। टूरिज्म का मुनाफा पर्यावरण को बर्बाद करने की कीमत नहीं हो सकता। और सरकारें प्रगति के नाम पर लोगों के हक़ को कुचल नहीं सकतीं।

ग्रीन एक्टिविस्ट जगन प्रसाद तेहरिया के मुताबिक, अगर ये प्रोजेक्ट नहीं रुका, तो आगरा का आखिरी बड़ा पार्क कंक्रीट का जंगल बन जाएगा। शहर का हरा फेफड़ा खत्म हो जाएगा। और ताजमहल की खूबसूरती, जो इसके आसपास की हवा और रोशनी पर टिकी है, वो भी खतरे में पड़ जाएगी। आगरा और ताज को बचाने का वक़्त है। शाहजहां पार्क सिर्फ़ ज़मीन नहीं, ये ताज का कुदरती कवच है, शहर की हरी उम्मीद है।

SP_Singh AURGURU Editor