बांध, बारिश और बर्बादी : जल शक्ति मंत्रालय की नाकामी से डूबता जनजीवन

भारी वर्षा के दौरान समय रहते बांध और चेक डैम से पानी न छोड़े जाने की लापरवाही से पंजाब, दिल्ली, मथुरा-आगरा समेत कई राज्यों में बाढ़, तबाही और जनजीवन संकट में है। विशेषज्ञों से भरे जल मंत्रालय और तकनीकी संसाधनों के बावजूद योजनाबद्ध प्रबंधन न होना सबसे बड़ी विफलता है।

Sep 4, 2025 - 12:19
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बांध, बारिश और बर्बादी : जल शक्ति मंत्रालय की नाकामी से डूबता जनजीवन
पंजाब में आई बाढ़ की एक तस्वीरः क्या योजनाबद्ध प्रबंधन कर सरकार लोगों को इस संकट से बचा नहीं सकती थी।

-डॉ. (लेफ्टिनेंट कर्नल) राजेश चौहान-

आजकल जल मंत्रालय से संबंधित, भू-स्खलन, टूटती-बहती पुल-पुलिया, रेलमार्ग, राजमार्ग, उखड़ी और बह गई सड़कों, तथा लगभग बर्बाद जनजीवन के लिए जिम्मेदार कौन है?

जल शक्ति मंत्रालय / जल मंत्रालय को क्या यह पता नहीं रहता कि आने वाले दिनों में भारी वर्षा की संभावना है? फिर समय रहते बांधों और चेक डैम से पानी क्यों नहीं छोड़ा जाता? हमेशा ऐसा क्यों होता आया है कि खतरे की सतह की अंतिम रेखा पार होने के बाद ही अचानक पानी छोड़ दिया जाता है? और यह तब होता है जब पहले से ही जोरदार बारिश चल रही होती है, हर तरफ पानी भरा होता है। ऐसे में बांध और चेक डैम खोल देने से हालात और भयावह हो जाते हैं।

पंजाब डूब चुका है, गुरुग्राम की हालत बेहद खराब है। भारी बरसात में हथिनी कुंड भी खोल दिया गया है। दिल्ली में यमुना किनारे बुरा हाल है। आलम यह है कि आगरा में यमुना किनारे की बस्तियां और गांव खतरे में आ गये हैं।

क्रिकेट मैच में एक गेंदबाज और एक बल्लेबाज होता है। ऐसा नहीं होता कि दो-दो गेंदबाज और दो-दो बल्लेबाज एक साथ खेलें। इसी तरह जल शक्ति मंत्रालय में हजारों कर्मचारी हैं। विशेषज्ञ से लेकर लालफीताशाही तक, मंत्री और उप मंत्री तक। जगह-जगह कंप्यूटर भी लगे हैं। तो क्यों नहीं हर बड़े जलाशय के लिए पानी की जरूरत और बारिश के अनुमान पर आधारित एक ऐप (सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन) बनाया जा सकता? जो केवल निगरानी ही न रखे बल्कि आवश्यकता अनुसार समय पर कार्रवाई भी करे।

जैसे, यदि बीस दिन की बारिश शेष हो और बांध लगभग भर चुका हो, तो क्यों न उसका पानी समय रहते खोला जाए, यह अनुमान लगाकर कि दस दिन बाद बांध से ऊपर पानी बहने लगेगा? यदि समय रहते पानी न खोला गया तो बांध टूट सकता है और भारी बारिश के बीच जलभराव और बढ़ जाएगा। नतीजा बेहद खतरनाक होगा। पंजाब का हाल इसी वजह से बना है। और अब यमुना किनारे दिल्ली और आगरा की स्थिति भी हथिनी कुंड का पानी छोड़ने के कारण गंभीर है।

आखिर सड़कों और पुल-पुलियों के टूटने-बहने की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने विकास के समय कोई कमी छोड़ दी थी? उत्तराखंड में टनल हादसे में मजदूर दब गए थे। निकलने का रास्ता केवल कागजों पर था। क्या इतने भूस्खलन और तबाही होती अगर विकास सही ढंग से किया गया होता? ज़रूरी है यह सोचना कि लगातार गलतियां कहां-कहां हुईं।

आज जब भारी वर्षा के बीच हथिनी कुंड, चेक डैम, बैराज और भाखड़ा-नंगल जैसे बड़े जल संग्रहण स्थलों का पानी अचानक छोड़ा जाता है, तो सवाल उठता है कि जल मंत्रालय के अधीन आने वाले कर्मचारी और अधिकारी अपनी वास्तविक जिम्मेदारी समझते भी हैं या नहीं। आम जनता की अपेक्षा यही है कि यह मंत्रालय समय रहते उचित कदम उठाए और जनजीवन को बचाए।

SP_Singh AURGURU Editor