बसंत के रंग में रचा दयालबाग, श्रद्धा, सजावट और सामूहिक उल्लास, ऋतुराज यहां के लिए केवल मौसम नहीं, बल्कि सत्संग, साधना और संस्कृति का जीवंत उत्सव
आगरा। ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ ही दयालबाग बसंतोत्सव के रंग में रंग गया। हर गली, हर प्रांगण और हर मन उल्लास व भक्ति से सराबोर नजर आया। सौर ऊर्जा से सुसज्जित विद्युत झालरों से दयालबाग की इमारतें और सत्संग कॉलोनियां दिव्य आभा से जगमगा उठीं, वहीं बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के चेहरों पर बसंत का उत्साह साफ झलकता रहा। राधास्वाआमी मत के अनुयायियों ने पूर्ण श्रद्धा, स्वच्छता और संयम के साथ बसंत पंचमी का पर्व मनाते हुए इसे केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, सेवा और सामूहिक आनंद का पर्व बना दिया।

बसंत पंचमी के मौके पर अनुयाइयों को दर्शन देते हुजूर महाराज प्रो. प्रेम सरन सतसंगी और रानी साहिबा।
प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी ऋतुराज बसंत की सुखदाई, आनंदपूर्ण और ऊर्जा से भरपूर ऋतु ने दस्तक दी है। शीत ऋतु के विदा होते ही बसंत के आगमन से प्रकृति, मन और चेतना, तीनों में नवजीवन का संचार हो जाता है। यही कारण है कि संतों ने भी इस पावन ऋतु को ईश्वरीय अवतरण और आध्यात्मिक जागरण से जोड़ा है।
दयालबाग में बसंत केवल मौसम नहीं, बल्कि सत्संग, साधना और संस्कृति का जीवंत उत्सव है, जो मानव, पशु और पक्षी, सभी में उल्लास भर देता है।
“ऋतु बसंत आए सतगुरु जग में,
चलो चरनन पर सीस धरो री।”

आगरा शहर में स्थित दयालबाग, राधास्वाआमी मत का मुख्यालय है। यहां के सत्संगियों के लिए बसंत पंचमी का दिवस अत्यंत पावन और ऐतिहासिक महत्व रखता है। इसी शुभ दिन, 15 फरवरी 1861 को, मत के प्रथम आचार्य परम पुरुष पूरन धनी हुजूर स्वामी जी महाराज ने जगत उद्धार का संदेश प्रगट किया और सत्संग आम का शुभारंभ किया। यही कारण है कि बसंत पंचमी दयालबाग में महाआनंद और आध्यात्मिक उल्लास का पर्व बन गई है।
“घट में खेलूं अब बसंत,
भेद बताया सतगुरु संत।”

दयालबाग की नींव भी बसंत में
बसंत पंचमी के इसी पावन अवसर पर एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ा। राधास्वाआमी मत के पांचवें आचार्य सर साहबजी महाराज ने 20 जनवरी 1915 को दयालबाग, आगरा में राधास्वामी सत्संग का मुख्यालय स्थापित करने के उद्देश्य से एक शहतूत का पौधा रोपित किया, जिसने आगे चलकर दयालबाग की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नींव को मजबूत किया।
“देखो देखो सखी अब चल बसंत,
फूल रही जहं तहं बसंत।”
शिक्षा, संस्कृति और जीवन-दृष्टि
दयालबाग में शिक्षा और संस्कृति को केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन की तर्ज-ए-जिंदगी के रूप में विकसित किया गया। 1 जनवरी 1916 को मिडिल स्कूल के रूप में शुरू हुआ राधास्वाआमी एजुकेशनल इंस्टिट्यूट (आरईआई) आज एक विशाल वटवृक्ष के रूप में दयालबाग एजुकेशनल इंस्टिट्यूट (डीईआई) बन चुका है। इसका प्रभाव न केवल देश के विभिन्न हिस्सों में, बल्कि विदेशों तक फैल चुका है।

बसंत से आरंभ होता है नववर्ष
राधास्वाआमी मत में राधास्वामी संवत का नववर्ष बसंत पंचमी से प्रारंभ होता है। इस दिन सभी सत्संगी पूर्ण श्रद्धा और प्रेम भाव से हुजूर राधास्वाआमी दयाल का गुणगान करते हैं। बसंत के स्वागत की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं। बच्चे, युवा और बुजुर्ग—सभी अपने घरों, गलियों और मोहल्लों की सफाई व सजावट में जुट जाते हैं। इन सामूहिक प्रयासों से बसंत के दिन दयालबाग की छटा अद्वितीय हो जाती है।
सत्संगी इस पर्व को आरती, पूजा, अभ्यास और सेवा के माध्यम से मनाते हैं तथा अपने गुरु महाराज के चरणों में कृतज्ञता अर्पित करते हैं।
“आज आई बहार बसंत,
उमंग मन गुरु चरनन लिपटाए।”
“आज आया बसंत नवीन,
सखी री खेलो गुरु संग फाग रचाय।”
पर्यावरण-संवेदनशील उत्सव
बसंत के शुभ अवसर पर दयालबाग सहित देश-विदेश की सभी सत्संग कॉलोनियों में रात्रि के समय भव्य एवं आकर्षक विद्युत सज्जा की जाती है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए मोमबत्ती और दीयों का प्रयोग नहीं किया जाता। सजावट के लिए सौर-ऊर्जा चालित बिजली बल्बों का उपयोग होता है, जो दयालबाग की सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रतीक है।
भक्ति, स्वच्छता और संयम का संदेश
कुल मिलाकर, राधास्वाआमी मत के अनुयायी बसंतोत्सव को स्वच्छ, संयमित और पूर्ण भक्ति-भाव के साथ मनाते हैं। यह पर्व दिखावे का नहीं, बल्कि आंतरिक आनंद, सेवा और कृतज्ञता का उत्सव है।
“मोहि मिल गए राधास्वाआमी पूरे संत,
अब बाजत हिये में धुन अनंत।”