क्या 15 साल में 'सपना' पुराना हो जाता हैः मध्यमवर्ग की गाड़ी पर सरकार का ‘डिलीट बटन’ क्यों?
नई मोटर व्हीकल नीति के तहत 15 साल पुराने निजी वाहनों को जबरन 'कबाड़' मानना तकनीकी रूप से एकांगी और सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अनुचित है। इससे न केवल मध्यमवर्गीय भावनाओं को ठेस पहुंचती है, बल्कि लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी और ऑटोमोबाइल इकोसिस्टम भी प्रभावित होता है। सरकार को केवल वाहन की उम्र नहीं, उसकी तकनीकी स्थिति और प्रदूषण मानकों को भी ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक नीति बनानी चाहिए।
नई मोटर व्हीकल नीति के तहत 15 साल पुराने निजी वाहनों को 'कबाड़' मानकर सड़कों से हटाने का जो निर्णय लिया गया है, वह न केवल तकनीकी रूप से सीमित सोच का परिचायक है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक यथार्थ की उपेक्षा भी कर रहा है। यह नियम देश के उस मध्यम वर्ग को सीधा झटका दे रहा है, जिसके लिए एक कार सिर्फ साधन नहीं, बल्कि संघर्षों से संजोया गया सपना होती है।
सवाल सिर्फ एक मशीन की उम्र का नहीं है, बल्कि उस मानसिक और भावनात्मक जुड़ाव का है, जो एक मध्यमवर्गीय परिवार अपनी पहली गाड़ी से रखता है। कोई गाड़ी 15 साल बाद पुरानी हो जाए, यह संभव है, लेकिन क्या हर गाड़ी एक जैसी होती है? क्या उसका रखरखाव, उसका प्रदूषण स्तर, उसका तकनीकी स्वास्थ्य महज़ उसके पंजीकरण की उम्र से तय किया जाना न्यायोचित है?
आज जब गाड़ियां बीएस-6 मानकों के अनुसार बन रही हैं, जब पॉल्यूशन सर्टिफिकेट और फिटनेस टेस्ट जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, और जब वाहन निर्माता कंपनियां 5 से 7 साल तक की विस्तारित वारंटी दे रही हैं तो फिर यह मान लेना कि एक वाहन 15 साल बाद पर्यावरण के लिए घातक हो जाएगा, यह तर्क कमज़ोर और एकांगी है। पूरी तरह फिट गाड़ियां सरकारी की इस नीति से कबाड़ के भाव में बिक रही हैं।
यह नीति सिर्फ वाहन मालिकों को ही नहीं, पूरे ऑटोमोबाइल इकोसिस्टम को प्रभावित करेगी। हजारों छोटे-छोटे मैकेनिक, स्पेयर पार्ट्स विक्रेता, वर्कशॉप संचालक और परोक्ष रूप से जुड़े लोग इस नीति के चलते बेरोजगारी की ओर धकेले जाएंगे। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, खासकर जीडीपी और रोज़गार दर पर भी पड़ सकता है।
सरकार 'एक सांचे में फिट' नीति के बजाय व्यावहारिक और बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाए। यदि कोई वाहन तकनीकी रूप से सक्षम है, प्रदूषण स्तर के मानकों पर खरा उतरता है और सड़क सुरक्षा के सभी मानदंड पूरे करता है, तो सिर्फ उम्र के आधार पर उसे कबाड़ घोषित करना लोकतांत्रिक और नीतिगत दृष्टि से दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाएगा।
यह समय है जब सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए, न सिर्फ वाहनों की नियति पर, बल्कि उन सपनों पर भी, जो उन वाहनों के साथ चलते हैं। वरना नीति और निष्ठा के बीच की खाई और गहरी हो जाएगी।
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देशभर के वाहन मालिक, खासकर मध्यम वर्ग, इस एकतरफा फैसले से क्षुब्ध हैं। सभी जनप्रतिनिधियों- सांसद, विधायक, मेयर सरकार के सामने इस मुद्दे को उठाएं और एक नई, व्यावहारिक नीति की मांग करें।
-राजीव गुप्ता- जनस्नेही कलम से
लोकस्वर, आगरा।