25 जून 1975 का आपातकाल : जब लोकतंत्र सलाखों के पीछे था, लेकिन जनशक्ति नहीं झुकी
देश में 25 जून 1975 को लगा आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन दौर था। इस दौरान नागरिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया गया। लोकतंत्र की रक्षा के लिए हुए संघर्ष और बलिदान को याद करते हुए नई पीढ़ी को लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सजग रहने की जरूरत है।
– पुरुषोत्तम खंडेलवाल-
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तारीख है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लागू किया गया। इसके साथ ही संविधान प्रदत्त अनेक नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश लगा दिया गया। अभिव्यक्ति की आज़ादी सीमित हो गई, प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई और हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा लोकतंत्र समर्थक नागरिकों को जेलों में बंद कर दिया गया। लगभग 21 महीनों तक चला यह दौर भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन और सबसे विवादास्पद परीक्षा के रूप में इतिहास में दर्ज है।
आपातकाल केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना पर गंभीर आघात था। उस समय देश का राजनीतिक वातावरण भय, दमन और असहमति को दबाने की प्रवृत्ति से घिर गया था। सरकार की आलोचना करना जोखिम भरा बन गया था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अभूतपूर्व दबाव दिखाई देने लगा था।
मैं स्वयं भी उस दौर के संघर्ष का प्रत्यक्ष साक्षी रहा हूं। लोकतंत्र की रक्षा के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण मुझे भी जेल जाना पड़ा। वह समय व्यक्तिगत संघर्ष का ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के लोकतांत्रिक भविष्य को बचाने का संघर्ष था। सत्ता के दमन के सामने झुकने के बजाय हजारों राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने जेल की यातनाएं सहन कीं, लेकिन लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे। यही वह जज़्बा था जिसने भारतीय लोकतंत्र को जीवित रखा।
आपातकाल के दौरान केवल राजनीतिक विरोधियों को ही निशाना नहीं बनाया गया, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर भी गंभीर प्रहार हुआ। अनेक समाचार पत्रों को सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। समाचार प्रकाशित होने से पहले सरकारी अनुमति आवश्यक हो गई। स्वतंत्र पत्रकारिता पर अभूतपूर्व नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित हुई और असहमति की आवाज़ को दबाने की कोशिशें तेज़ हो गईं।
इस दमनकारी दौर के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चला जनआंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। इस आंदोलन ने देश के युवाओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति नई चेतना जगाई। लाखों लोगों ने व्यक्तिगत कठिनाइयों की परवाह किए बिना लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया। अंततः जनता की शक्ति और लोकतांत्रिक चेतना की विजय हुई तथा देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई। भारत ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि यहां की जनता किसी भी प्रकार के अधिनायकवाद को स्थायी रूप से स्वीकार नहीं करती।
आज, आपातकाल की स्मृति केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का एक स्थायी संदेश भी है। यह हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल संविधान की पुस्तकों में लिखे शब्दों से सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि नागरिकों की सजगता, स्वतंत्र संस्थाओं की मजबूती, निष्पक्ष न्याय व्यवस्था, स्वतंत्र मीडिया और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित जनशक्ति से सशक्त होता है।
नई पीढ़ी का दायित्व है कि वह आपातकाल के इतिहास को जाने, लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करे और संविधान की रक्षा के लिए सदैव सजग रहे। लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिन्होंने संघर्ष किया, जेल यात्राएं कीं और कठिन यातनाएं सहीं, उनके त्याग, तप और बलिदान को राष्ट्र सदैव श्रद्धापूर्वक स्मरण करता रहेगा।
1975 में लोकतंत्र और संविधान का गला घोंटने वाली कांग्रेस आज लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की बात करती है। यह विरोधाभास कांग्रेस के दोहरे चरित्र और राजनीतिक अवसरवाद को उजागर करता है। उस दौर के निर्णय और आज के राजनीतिक दावों के बीच का यह अंतर उसके बगुला भगत और मायावी स्वरूप को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।
(लेखक आगरा उत्तर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक और लोकतंत्र रक्षक सेनानी हैं। आपको इमरजेंसी के विरोध पर साढ़े चौदह वर्ष की उम्र में जेल में डाल दिया गया था।)