अलविदा डॉ. नेविल स्मिथ: आगरा की स्मृतियों के आख़िरी प्रहरी

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. नेविल स्मिथ नहीं रहे। वे केवल वरिष्ठ पत्रकार नहीं, बल्कि एक आदर्श शिक्षक, मार्गदर्शक और आगरा से गहरा लगाव रखने वाले व्यक्तित्व थे। उन्होंने पांच दशकों तक ईमानदारी और समर्पण के साथ पत्रकारिता की तथा अनेक युवा पत्रकारों को मार्गदर्शन दिया। उनका जीवन आगरा, पत्रकारिता और शिक्षा के प्रति समर्पित रहा।

Jun 25, 2026 - 09:42
Jun 25, 2026 - 09:54
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अलविदा डॉ. नेविल स्मिथ: आगरा की स्मृतियों के आख़िरी प्रहरी
DOB 6/9/1939 DOD 24/6/2026

-बृज खंडेलवाल-

कुछ लोग समाचार लिखते हैं। कुछ लोग इतिहास लिखते हैं। लेकिन कुछ विरले लोग ऐसे होते हैं जो स्वयं इतिहास के जीवित दस्तावेज़ बन जाते हैं।

डॉ. नेविल स्मिथ ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उनके निधन के साथ आगरा ने केवल एक वरिष्ठ पत्रकार नहीं खोया है। उसने अपनी स्मृतियों का एक संरक्षक खो दिया है। एक ऐसा कहानीकार खो दिया है जिसने शहर की धड़कनों को शब्द दिए। एक ऐसा शिक्षक खो दिया है जिसने ज्ञान के साथ संस्कार भी बांटे। और मैंने खो दिया है अपना मार्गदर्शक, अपना गुरु, अपना शुभचिंतक। एक्स स्टूडेंट्स के नाते, सेंट पीटर्स कॉलेज, भी हमारे  भावनात्मक जुड़ाव का एक कारण रहा।

86 वर्ष की आयु में उनका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। यह ऐसा दुख है जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं।

डॉ. स्मिथ पत्रकारिता के उस स्वर्णिम दौर के प्रतिनिधि थे, जब खबर बिकती नहीं थी, लिखी जाती थी। जब पत्रकार सत्ता के गलियारों से नहीं, जनता की गलियों से अपनी पहचान बनाते थे। जब सच से समझौता करना सबसे बड़ा अपराध माना जाता था। उन्होंने जीवन भर इसी सिद्धांत का पालन किया।

प्रख्यात पत्रकार स्वर्गीय थॉमस स्मिथ के पुत्र होने के बावजूद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। पीटीआई और द स्टेट्समैन के लिए पांच दशकों से अधिक समय तक काम करते हुए उन्होंने अंग्रेज़ी पत्रकारिता में विश्वसनीयता और ईमानदारी का ऐसा मानदंड स्थापित किया, जो आज दुर्लभ होता जा रहा है।

आगरा को शायद ही किसी ने उतना जाना होगा, जितना डॉ. स्मिथ ने जाना। शहर की हर गली, हर मोहल्ला, हर स्मारक, हर चर्च, हर कब्रिस्तान, हर पुरानी इमारत और हर ऐतिहासिक कोने की कहानी उनके पास थी। वे चलते-फिरते विश्वकोश थे। आगरा की विरासत उनके लिए केवल अध्ययन का विषय नहीं थी, वह उनका प्रेम थी, उनका जुनून थी।

वे आगरा के आधुनिक इतिहास के सबसे विश्वसनीय इतिहासकार थे। पत्रकारिता से सक्रिय रूप से अलग होने के बाद भी उनकी ऊर्जा कम नहीं हुई। उम्र शरीर को थका सकती है, लेकिन जिज्ञासा को नहीं। साहारनपुर में बेटी के साथ रहने चले जाने के बाद भी उनका मन आगरा की गलियों में ही भटकता रहा।

पुराने टाइपराइटर पर लगातार काम करते हुए उन्होंने दो अमूल्य ग्रंथ तैयार किए—‘जर्नलिज्म इन आगरा’ और छह सौ से अधिक पृष्ठों में फैला ‘हिस्ट्री ऑफ आगरा’।

मैं अक्सर हैरान रह जाता था। इस उम्र में भी वे घंटों पुराने दस्तावेज़ खंगालते थे। किसी तथ्य की पुष्टि के लिए कई-कई लोगों से बात करते थे। फोन पर लंबी चर्चाएं करते थे। किसी तारीख, किसी नाम या किसी घटना की सत्यता को लेकर तब तक संतुष्ट नहीं होते थे, जब तक पूरी तरह आश्वस्त न हो जाएं। सच के प्रति ऐसी निष्ठा मैंने बहुत कम लोगों में देखी है।

उनके लिए पत्रकारिता जल्दबाजी का नहीं, जिम्मेदारी का काम थी। वे कहा करते थे कि खबर सबसे पहले देने से ज्यादा जरूरी है उसे सबसे सही रूप में देना। यही उनका धर्म था।

2014 में जब उन्होंने पीटीआई छोड़ा, तब परिस्थितियों ने मुझे आगरा में पीटीआई का दायित्व संभालने पर मजबूर कर दिया। मैं पहले से ही आईएएनएस के साथ पूर्णकालिक रूप से जुड़ा हुआ था। सच कहूं तो उनकी जगह लेने का विचार ही भय पैदा करता था।

उनके जैसे पत्रकार की जगह कोई नहीं ले सकता। हम केवल उनके पदचिह्नों पर चलने की कोशिश कर सकते हैं।

आरबीएस कॉलेज में अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष के रूप में भी वे उतने ही लोकप्रिय थे, जितने पत्रकार के रूप में। उनके विद्यार्थियों के लिए वे शिक्षक कम, अभिभावक अधिक थे। उनका व्यवहार स्नेहपूर्ण था, व्यक्तित्व विनम्र था और ज्ञान अथाह था।

उन्होंने कभी प्रसिद्धि का पीछा नहीं किया। उन्होंने कभी पुरस्कारों की चिंता नहीं की। उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनकी साख थी।

आज जब उनके निधन का समाचार सुनता हूं, तो लगता है जैसे आगरा के इतिहास का एक पूरा अध्याय बंद हो गया हो।

फोन पर घंटों चलने वाली चर्चाएं अब नहीं होंगी। किसी भूली-बिसरी घटना का संदर्भ पूछने के लिए अब वह आवाज़ नहीं मिलेगी।

टाइपराइटर की खटर-पटर थम गई है, लेकिन उनकी विरासत जीवित है। उनकी किताबों में। उनके लेखों में। उनके विद्यार्थियों में। उनके आदर्शों में। और उस आगरा में, जिसे उन्होंने जीवन भर प्यार किया।

डॉ. नेविल स्मिथ चले गए हैं, लेकिन उन्होंने अपने पीछे शब्दों का ऐसा खजाना छोड़ा है जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।

एक पत्रकार के रूप में मैं उन्हें सलाम करता हूं। एक शिष्य के रूप में उनके चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूं।

और एक मित्र के रूप में नम आंखों से कहता हूं— अलविदा सर। आपने आगरा की कहानी ईमानदारी से लिखी।

अब आप स्वयं उस इतिहास का हिस्सा बन गए हैं, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

डॉक्टर नेविल स्मिथः पत्रकारिता के एक युग का अंत

-हेमेंद्र चतुर्वेदी-

नब्बे का दशक, जून की गर्मी और दोपहर के ढाई बजे प्रेस वार्ता का समापन। सर्किट हाउस में खड़ी आलीशान गाड़ियों के बीच से निकलता वह पीले रंग का बजाज स्कूटर। लगभग साठ वर्ष की आयु का वह शरीर, मगर जल्दी इस बात की कि कैसे घटिया आजम खान स्थित घर पहुंचकर पुराने रेमिंग्टन टाइपराइटर पर तैयार की गई खबर को शाम चार बजे से पहले संजय प्लेस तारघर से फैक्स करना है और सेंट जॉन्स कॉलेज चौराहे स्थित पीटीआई कार्यालय से समाचार अग्रसारित करना है।

बिना मोबाइल और कंप्यूटर के उस दौर में पांच दशक तक समाचार जुटाना, उसकी राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त समाचार एजेंसी के लिए आवश्यक आधिकारिक पुष्टि करना और उसे प्रेषित करना कोई हंसी-खेल नहीं था। मगर डॉ. नेविल स्मिथ को यह सब करते देखना ऐसा लगता था, मानो यह उनके लिए बिल्कुल सहज हो।

विगत बुधवार की शाम ऐसे पत्रकार की जीवन यात्रा का अवसान हुआ, जिसने आगरा को नज़ीर अकबराबादी की मानिंद चाहा। डॉ. नेविल स्मिथ की कलम तो सहारनपुर में आकर थम गई, लेकिन अपने अज़ीज़ शहर आगरा से उनका रिश्ता अंतिम सांस तक बना रहा। 27 जून को उन्हें उनके महबूब शहर आगरा में भगवान टॉकीज चौराहे के निकट स्थित कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

डॉ. नेविल स्मिथ आगरा से दूर रहते हुए भी आगरा में ही बसते थे। यह शहर उन्होंने केवल देखा नहीं, बल्कि जिया था। सेंट पीटर्स और सेंट जॉन्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने राजा बलवंत सिंह डिग्री कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में अध्यापन किया और विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी पत्नी भी सेंट पैट्रिक्स स्कूल से शिक्षिका के रूप में सेवानिवृत्त हुईं।

घटिया आजम खान स्मिथ साहब के दिल में बसता था। मगर उसी घर में पिता टामस स्मिथ की विदाई के बाद उन्हें एक और गहरा सदमा तब सहना पड़ा, जब उनकी बेटी का निधन हो गया। उस दुख से स्मिथ सर जीवनभर पूरी तरह उबर नहीं पाए। बाद में कुछ समय उन्होंने आगरा में आवास विकास स्थित अपने नए मकान में भी बिताया।

यह मेरा सौभाग्य था कि बिना किसी डिग्री-डिप्लोमा के वर्ष 1992 में अंग्रेजी पत्रकारिता की शुरुआत करते समय मुझे डॉ. नेविल स्मिथ, टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वर्गीय नरेश बिहारी माथुर साहब और ब्रज खंडेलवाल जी जैसे वरिष्ठों का सान्निध्य मिला। मगर स्मिथ सर की बात निराली थी। वह पेशे से शिक्षक थे और उन्हें भली-भांति पता था कि सिखाया कैसे जाता है।

हर प्रेस वार्ता के दौरान मैं किसी नौसिखिया छात्र की तरह अपने शिक्षक स्मिथ सर की निगाहों से बचता था, क्योंकि उन्हें हमेशा शिकायत रहती थी कि कोई अच्छा सवाल क्यों नहीं पूछा। आगरा से जुड़ा कोई भी विषय हो, स्मिथ सर के पास उसका जवाब होता था, जानकारी होती थी और उसे विस्तार से बताने की अद्भुत तत्परता भी।

"अपना और अपने परिवार का भी ख्याल रखा करो। पत्रकारिता बड़ा अकृतज्ञ जॉब है।" पता नहीं क्यों, वह यह बात हमेशा कहा करते थे। इस वर्ष होली पर भी, हर त्योहार की तरह उनका फोन शुभकामनाएं देने के लिए आया था। बातचीत अक्सर उनके पुस्तक लेखन पर होती थी, जिसमें अंतिम समय तक वह स्वयं को व्यस्त रखे रहे। विषय वही रहता था—उनका अपना शहर, आगरा। वह उन लोगों का हाल भी पूछते थे, जिन्हें वह यहां जानते थे, और अक्सर मुस्कराते हुए कहते थे—"अरे, वह तो मेरा स्टूडेंट रहा है।"

स्मिथ सर हमेशा मदद के लिए तैयार रहते थे। मई महीने में, लगभग बीस दिन पहले भी, हिंदी पत्रकारिता दिवस पर उन्होंने अपने घर में रखी अलमारी और अपनी पुस्तकें ताज प्रेस क्लब को दान करने का संदेश भिजवाया था।

डॉ. नेविल स्मिथ अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर मेरे जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत उनके अनगिनत विद्यार्थियों के हृदय में वह हमेशा जीवित रहेंगे। उनका जाना आगरा की पत्रकारिता, विशेषकर अंग्रेजी पत्रकारिता के एक युग का अंत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और स्व. नेविल स्मिथ के स्टूडेंट रहे हैं।) 

SP_Singh AURGURU Editor